Varanasi Bhojpuriya Holi Special: बुरा न मनिहा इ बनारसी होली ह

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बनारसिय होली के आपन खास विशेषता ह.

Banarasiya Holi Special: फागुन क महीना में रंगभरी एकदशी के दिने से ही भांग ठंडई अउर पान क गिलौरी क संगत के साथे ढोल मंजिरा क ताल पर जब जोगिरा क सारा र र र र र पर लोग झूमे लगे लं त समूचा काशी झूमे लगेगा.

हास्य व्यंग्य क लोकप्रिय रचयिता बेढब बनारसी आपन एगो चर्चित व्यंग्य लेख बनारसी एक्का में लिखले रहलें कि जऔन चीज के आगा बनारसी शब्द जुड़ ओकरा बराबर क चीज ई धरती पर त नहिए मिलेला, भलेहू सवर्ग में मिलत होई. एमन कऔनो दू राय नइखे कि तीनों लोक में न्यारी भगवान बिसनाथ क प्यारी नगरी काशी माने बनारस में बनन रचल बसल कऔनो भी चीज क मुकाबला दुनिया भर में कहंउओ नाही हो सकेला. चाहे उ परब त्योहार होखे, चाहे कला संस्कृति अउर लोकाचार हो बा खानपान. ई सबिका में बनारसीपन क कऔने जवाब नाही ह. फागुन क महीना में होली क हुड़दंग पर ही बात कइल जाओ त इहवां क होली में रंग अउर मस्ती क अइसन बयार बहे ला कि छोट बड़ बूढ़ सबहि एक्के रंग में रंगा जाला.

फागुन क महीना में रंगभरी एकदशी के दिने से ही भांग ठंडई अउर पान क गिलौरी क संगत के साथे ढोल मंजिरा क ताल पर जब जोगिरा क सारा र र र र र पर लोग झूमे लगे लं त समूचा काशी झूमे लगेगा. ऊपर से हवा में उड़त रंग गुलाल अबीर क गुबार लोगों क माथा पर एगो अलगे तरह क निशा छवा देला. इहे निशा में चूर लोग बड़ बूढ़ क लिहाज भुला के गारी भरल गीत गवनई पर उतर आवे लं. वइसे त होली के दिना देशभर में हुल्लड़बाजी, मौज मस्ती, हंसी ठिठोली क महौल रहेला ला. लेकिन भांग ठंडई के साथे हुल्लड़बाजी के अलावे बनारसी होली क एगो दूगो अउरों खासियत ह. एमन से एगो खासियत ह इहवां होली परब पर हर साल एगो खास किसिम क पत्रिका क छपल. मंथन नाम क इ पत्रिका में गारी गलौज क संपुट के साथे देश विदेश क नेतवन पर व्यंग्य बाण छोड़ल जाला. बुरा न माना होली ह क आड़े में नेतवन के अलावे शहर समाज के लोगन के भी नाही बक्सल जाला.

होली पर छपे वाला मंथन पत्रिका पचासों साल से छपत ह. अखबारी कागज पर छपे वाला मंथन के फ्री में बांटल जाला. साथे एपर इहो लिखल रहेला कि एके बेचत केहू भी पावल जाई त ओकर मातृवंदना कइल जाइ. होली के आसे पासे छप के बंटे वाला मंथन के बनारसी खूब चाव से चटकारा लेके पढ़े लं. इ पत्रिका कब से छपत ह इ ठीक ठीक बतावे वाला त बनारसी साहित्य समाज से जुड़ल केहू भी ना मिलल लेकिन एसे जुड़ल साठ साल पहिले क एगो किस्सा जरूर ह जेसे पता चलेला कि कम से कम इ साठ साल से त जरूरे छपत ह. उत्तर प्रदेश में 1956 से 1960 तक डॉ. संपूर्णानंद मुख्यमंत्री रहलें. उहे दौर में एक साल होली पर मंथन पत्रिका छपल अउर ओके गोरखपुर क गीता प्रेस से छपे वाला धार्मिक पत्रिका कल्याण क लिफाफा में भर के कई सांसदन के नाम से संसद क पता पर दिल्ली भेज देहल गइल. मंथन में नेतवन क ‘कल्याण’ वंदना से मचल हड़कंप.

एकरा बाद अश्लीलता के खिलाफ धारा में मंथन क संपादक मंडल के सदस्यन अउर मुद्रक प्रकाशक के नाम पर वारंट भी जारी हो गइल. बाद में मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद क बीचबचाव से मामला वापस होइल. उनकर कहनाम रहे कि इ पत्रिका होली क माहौल में हंसी ठिठोली खातिर छापल जाला से एकर उहे माहौल में चटकारा लेबे के चाहि ना कि एपर खुनसइला क जरूरत ह. ओ समय मंथन क संपादक मंडल में भैया जी बनारसी, धर्मशील चतुर्वेदी अउर चकाचक बनारसी जइसन बनारस क साहित्कार, पत्रकार अउर हास्य व्यंग्यकार जुड़ल रहलें. साठ साल पहिले क इ रोचक घटना के बादो इ लोग मंथन क संपादक मंडल में बनल रहलें. आज क संपादक मंडल में सांड़ बनारसी जइसन नाम के अलावे काशी क कई गणमान्य लोगन क नाम जुड़ल ह. जिनकर आर्थिक सहयोग से आजो मंथन पत्रिका छपत ह.काशी क होली क दोसर खासियत ह इहां होवे वाला कवि सम्मेलन लंठ महासम्मेलन. लंठ महासम्मेलन में हास्य व्यंग्य क कवि हंसी ठिठोली वाली कविता गारी क संपुट के साथे तमाम नेतवन गणमान्य लोगन क लानत मलामत करें. पहिलवा इ लंठ महासम्मेलन अस्सी चौराहा पर होवे. एसल जुड़ल भी कई गो किस्सा ह. अश्लीलता के नाम पर कई बार एके रोके क परयास होइल लेकिन इ कब्बो ना रुकल हर साल होत रहे. पहिला परयास इमरजेंसी के दौरान होइल जब परशासन एके होबे क परमिशन ना देलस लेकिन बिना तंबू कनात लगौले अस्सी पर अड़ी लगावे वाला लोग एके खाली लाउडस्पीकर लगाके परशासन पर आपन भड़ास होली गायन के सहारे निकलन. दूसर परयास इमरजेंसी क बाद तब होइल जब ईमानदार आईएएस अधिकारी भूरेलाल इहवां डीएम बन के अइलें. उ अस्सी पर होवे वाला लंठ महासम्मेलन पर रोक लगा देलें. उनकर कहनाम रहे कि अस्सी मोहल्ला में ए तरह क अश्लील सम्मेलन न होई काहे कि अस्सी मोहल्ला में रहे वाला कई परिवारन क एकरे खिलाफ हउअन. लेकिन उनकरो बात ना मान के एकर आयोजन बिना तंबू कनात के अस्सी चौराहा पर होइल अउर भूरेलाल क नाम क कसीदा पढ़ल गइल.

कहल जाला कि अस्सी मोहल्ला क परिवारन के विरोध के चलिता ही लंठ महासम्मेलन एक दू साल अस्सी घाट पर होइल फिर एके गंगा पार ले जाइल गइल. गंगा पार भीड़ ना जुटला के चलिते इ सम्मेलन मैदागिन क टाऊन हाल में होवे लागल. तबसे लेके आजो इ हर साल टाऊन हाल में ही होला. लेकिन उहे बुरा न मनिहा बनारसी ठसक के साथे.







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