सत्संग से दूर होते हैं मनोविकार-मुक्तिनाथानन्द

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भास्कर न्यूज

लखनऊ।कोरोना काल से जारी सत्संग में प्रातः कालीन सत् प्रसंग रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने सोमवार को अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि अगर हमारी इंद्रियाँ अपने नियंत्रण में न रहे तब हम इन्द्रियासक्ति के शिकार बन जाते हैं एवं क्रमशः हमारी बुद्धिभ्रष्ट हो जाती है एवं हमारा जीवन निंदनीय बन जाता है। श्री रामकृष्ण दो कहानियाँ के माध्यम से अपने भक्तगणों को सुनाया। उन्होंने कहा “देखो न,स्त्रियों में कितनी मोहनी शक्ति है तिस पर अविद्या रुपिणी स्त्रियाँ पुरुषों को मानो एक बेवकूफ जड़ पदार्थ बना देती हैं।

 

जब देखता हूँ, स्त्री-पुरुष एक साथ बैठे हुए हैं तब सोचता हूँ,अहा! यह बिल्कुल हो गए! हारु इतना अच्छा लड़का है,परंतु वह प्रेतनी के हाथों पड़ा है! लाख कहो ‘अरे मेरे हारु तुम कहाँ गए! हारु तुम कहाँ गए!’कहाँ है हारू! लोगों ने देखा चलकर हारु वट के नीचे चुपचाप बैठा हुआ है; न वह रुप है, न वह तेज, न वह आनंद वट की प्रेतनी हारु पर सवार है!” अर्थात इसी तरह इंसान अपना रूप,तेज,ऊर्जा,आनंद सब इन्द्रियासक्ति का शिकार बनकर खो बैठता है।श्री रामकृष्ण ने पुनः कहा,”बीवी अगर कहे, ‘जरा चले तो जाओ,’ बस अब उठकर खड़े हो गए!

 

अगर कहा, ‘बैठो,’तो कहने भर की देर होती है, आप बैठ गए! अर्थात बीवी का गुलाम बन कर अपनी स्वाधीनता खो बैठना निंदनीय हैं और इसका कारण है हमारी इन्द्रियासक्ति।एक दूसरी कहानी से श्री रामकृष्ण ने बताया,”एक उम्मीदवार बड़े बाबू के पास जाते-जाते हैरान हो गया। काम किसी तरह न मिला, बाबू ऑफिस के बड़े बाबू थे। वे कहते थे!अभी जगह खाली नहीं है मिलते रहना।’ इस तरह बहुत समय कट गया उम्मीदवार हताश हो गया। वह अपने एक मित्र से अपना दुःख रो रहा था। मित्र ने कहा, ‘तू भी अक्ल का दुश्मन ही है!- अरे उसके पास क्यों दौड़-धूप कर रहा! गुलाबजान के पास जा उससे सिफारिश करा,तेरा काम हो जाएगा।

 

 

‘उम्मीदवार बोला,’ऐसी बात है! तो मैं अभी जाता हूँ।’ गुलाबजान बड़े बाबू की रखैल है। उम्मीदवार उससे मिला, कहा,’माँ तुम्हारे किए बिना न होगा- मैं बड़ी विपत्ति में पड़ गया हूँ। ब्राह्मण का बच्चा हूँ,कहाँ मारा-मारा फिरु? माँ, बहुत दिनों से कामकाज कुछ नहीं मिला, लड़के बच्चे भूखो मर रहे हैं, तुम्हारे एक बार कहने से ही मेरा मनोरथ सिद्ध हो जाएगा।’गुलाबजान ने उस ब्राह्मण से पूछा, ‘बेटा किससे कहना होगा?’उम्मीदवार ने कहा,’बड़े बाबू से जरा आप कह दे तो मुझे जरूर काम मिल जाए।’गुलाबजान ने कहा,’मैं आज ही बड़े बाबू से कहकर सब ठीक करा दूँगी।

 

‘दूसरे दिन ही सुबह उम्मीदवार के पास एक आदमी जाकर हाजिर हुआ। उसने कहा,’आप आज ही से बड़े बाबू के ऑफिस जाया कीजिए।’ बड़े बाबू ने साहब से कहा,’ये बड़े ही योग्य हैं, इन्हें काम पर मैंने रख लिया है, ऑफिस का काम ये बड़ी तत्परता से कर सकेंगे।”श्री रामकृष्ण ने उपसंहार में बताया,”इसी कामिनी और कांचन पर सब लोग लट्टू हैं।परंतु मुझे यह बिल्कुल नहीं सुहाता। सच कहता हूँ, रामदुहाई, ईश्वर को छोड़कर मैं और कुछ नहीं जानता।” अर्थात श्री रामकृष्ण कहते हैं कि संसार में अनासक्त होकर रहने के लिए ईश्वर की शरण में जाकर उन्हीं के चरणों में प्रार्थना करते हुए हमें रहना पड़ेगा।

 

स्वामी ने कहा,अतएव संसार आसक्ति से दूर रहने के लिए ईश्वर में अनुरक्ति पैदा करना पड़ेगा। जिसके लिए ईश्वर के चरणों में व्याकुल होकर प्रार्थना करना पड़ेगा ताकि ईश्वर ही हमारे जीवन का एकमात्र अवलंबन रहें एवं हम विषयासक्ति से अपने को हटाकर मन को ईश्वर के प्रति केंद्रित कर सकें एवं इस जीवन में ही ईश्वर लाभ करते हुए जीवन सफल कर सकें।