Resources can be mobilized for war, so why not empower the mother, the world should understand the feelings of the mother: Mazukato | युद्ध के लिए संसाधन जुट सकता है तो मां को सशक्त बनाने के लिए क्यों नहीं, दुनिया मां की भावनाओं को समझे: मजुकाटो

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2 घंटे पहले

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प्रख्यात अर्थशास्त्री मरियाना मजुकाटो माताओं की मौजूदा सामाजिक स्थिति से चिंतित हैं।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इनोवेशन एंड पब्लिक पॉलिसी की संस्थापक डायरेक्टर और हाल ही में प्रकाशित ‘मिशन इकोनॉमीः ए मूनशॉटगाइड टू चेंजिंग कैपिटलिज्म’ की लेखक मरियाना मजुकाटो का मानना है कि समाज मां की तुलना में नेता, नौकर और मैनेजर को कहीं अधिक महत्व देता है, जिनके स्वार्थ के कारण इतनी बड़ी संख्या में मांओं को मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। हम हमारी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकते। कोविड के बाद मांओं पर जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ गई है। भास्कर के रितेश शुक्ल ने उनसेे मदर्स डे पर खास बातचीत की। पढ़ें संपादित अंश-

मैं चार बच्चों की मां हूं और सम्पन्न शहर में रहती हूं जहां मूलभूत सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं। लेकिन अर्थशास्त्र पढ़ने-पढ़ाने के दौरान मैं अक्सर सोचती हूं कि चंद्रमा तक पहुंचने वाली दुनिया मां की भावनाओं से इतनी दूर क्यों है? 2019 में दोगुने सुधार के बावजूद प्रति हजार पैदा हुए बच्चों में से 38 बच्चे (कुल 52 लाख) 5 वर्ष की उम्र पूरी करने से पहले ही मर गए। 1990 में ये संख्या प्रति हजार पर 93 थी।

शोध पत्रों में शासन-प्रशासन हर वर्ष अपनी पीठ थपथपाता रहा कि 1990 में सवा करोड़ बच्चे 5 साल से पहले मरे थे, जो 2019 में सुधर कर 52 लाख हो गए। लेकिन इनमें से अधिकतर बच्चे बचाए जा सकते थे। हर मौत दुखद होती है लेकिन फिर भी हम सबने भेदभाव किया है। हर साल लाखों बच्चों का मरना, हमारे लिए एक उबाऊ आंकड़ा मात्र रहा है। मां गरीब थी, बच्चा लाचार था और हम सब उदासीनता से संक्रमित थे।

मां निःस्वार्थ संरक्षण का प्रतीक है लेकिन उसके आंचल में ही पले-बढ़े लोग जब नेता, अधिकारी या बड़ी कंपनियों के कर्ता-धर्ता बन जाते हैं तब वे स्वार्थ और अहंकार से भर जाते हैं। नतीजा हमारे सामने है। कोविड जैसे संक्रमण के समय सारा तंत्र लड़खड़ा गया है। ऐसे में मांएं क्या करें? क्या वे आंदोलन करने के लिए सड़क पर उतर आएं? क्या हमने कभी सोचा है कि एक डॉक्टर, नर्स या शिक्षक की तुलना में एक हेज फंड मैनेजर ऐसा क्या कर रहा है कि उनकी आमदनी में जमीन-आसमान का फासला हो।’

समाजवाद, राष्ट्रवाद सब खोखले साबित हुए
मजुकाटो कहती हैं, ‘मांओं, नर्सों का ताली बजा कर धन्यवाद दे लेने मात्र से हम जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकते। चांद या मंगल पर पहुंचना हो, तो संसाधन एक झटके में जुट जाते हैं। लेकिन भोजन, पानी, दवाई, पढ़ाई, रोजगार की बात आती है तो भाषण से आगे बढ़ती ही नहीं। पूंजीवाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद सब खोखले साबित हो चुके हैं। कमी सिर्फ नैतिक संसाधन की है जो मां के पास प्रचुर मात्रा में मौजूद है। कोई लेने को तैयार है क्या?’

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