plastic waste management-प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन का प्रश्न

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अगर शहरी कचरे का निस्तारण सही तरीके से हो, तो यह काम आसान हो सकता है।

अतुल कनक

अगर शहरी कचरे का निस्तारण सही तरीके से हो, तो यह काम आसान हो सकता है। अप्रैल, 2016 में जब भारत में शहरी कचरे के निस्तारण से संबंधित कानून बना था, तो उसमें यह भी प्रावधान था कि प्लास्टिक उत्पादक छह महीने की अवधि में प्लास्टिक के पुनर्चक्रण से संबंधित संयंत्रों की भी स्थापना करेंगे। बहरहाल, अब तक ऐसा कितने उत्पादकों ने किया होगा, सब जानते हैं। फिर प्लास्टिक के पुनर्चक्रीकरण में कुछ तकनीकी समस्याएं भी हैं।

किसी चीज का बढ़ता हुआ उपयोग उसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। मगर अर्थशास्त्री ग्रेशम का यह नियम भी ध्यान रखना चाहिए कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। भारत में प्लास्टिक का उपयोग बेतहाशा बढ़ने के पहले सामाजिक और सामुदायिक अवसरों पर जिन बर्तनों का उपयोग किया जाता था, वे अपशिष्ट नियंत्रण की चिंता पैदा नहीं करते थे। केवल उनका प्रबंधन करना होता था। लेकिन प्लास्टिक के साथ ऐसा नहीं है। एक अनुमान के अनुसार हर साल अस्सी लाख टन हानिकारक प्लास्टिक समुद्र में फेंक दिया जाता है, जो न केवल पारिस्थितिकी को परोक्ष रूप से नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि समुद्री जीव-जंतुओं के लिए भी जान का दुश्मन बन गया है।

इसके अलावा प्लास्टिक से होने वाला ‘माइक्रोस्कोपिक’ प्रदूषण मिट्टी, हवा, पानी और भोजन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। लाने-ले जाने और पैकिंग में आसानी के कारण दुनिया भर में खाद्य पदार्थों को प्लास्टिक पैकिंग में देने की परंपरा बढ़ी है और यह पैकिंग उपयोगकर्ता के स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों से खिलवाड़ कर रही है। शायद यही कारण है कि अब दुनिया के विभिन्न देशों में इस आशय की मांग उठने लगी है कि अपने उत्पादों को प्लास्टिक पैकिंग में बेचने वाले उत्पादकों से उसका अतिरिक्त शुल्क वसूल किया जाए।
लगभग तैंतीस देशों में प्लास्टिक की विशिष्ट थैलियों पर प्रतिबंध है, लेकिन प्रतिबंध के नियमों की पालना सुनिश्चित करने वाली एजेंसियों के ढुलमुल रवैए के कारण कानून अपना काम नहीं कर पा रहा है। फिर कुछ देशों में उत्पादकों ने प्रतिबंधित प्लास्टिक के स्थान पर विशिष्ट प्रकार से बने प्लास्टिक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।

इस तरह वे कानून की पकड़ से तो बच गए हैं, लेकिन प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर प्लास्टिक ही उपयोग कर रहे हैं। विकसित देशों में बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने कहा कि सामान्य प्लास्टिक के स्थान पर पेड़ों से तैयार किया जाने वाला ‘जैविक प्लास्टिक’ अधिक पर्यावरण अनुकूल हो सकता है। लेकिन अध्ययनों में पाया गया कि कुछ मायनों में तो जैविक प्लास्टिक का प्रबंधन कृत्रिम प्लास्टिक से भी अधिक दुरूह और हानिकारक हो सकता है। पर्यावरण के लिए इसके अपने खतरे हैं ही।

प्लास्टिक, उत्पादों को पानी और नमी से बचाता है, वह हल्का होता है, अधिक टिकाऊ और कई विकल्पों की तुलना में अधिक सस्ता होता है। शायद यही कारण है कि बुद्धिजीवियों का एक वर्ग कहता है कि प्लास्टिक स्वयं में एक समस्या नहीं है, बल्कि उसका दुरुपयोग और उसके यथोचित प्रबंधन का अभाव एक समस्या है। अगर आबादी द्वारा फेंके जाने वाले कचरे का निस्तारण सही तरीके से हो और पुनर्चक्रण के लिए उपयोगी प्लास्टिक को छांट कर उसे उचित क्षेत्र तक पहुंचा दिया जाए तो प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन की चिंता से कुछ हद तक पार पाया जा सकता है। मगर दुनिया इस मामले में बहुत गंभीर दिखाई नहीं देती। इस मामले में भारत के आंकड़े आश्चर्यजनक रूप से अनेक तकनीक संपन्न देशों की तुलना में प्रभावशाली हैं।

पॉलीथिलीन टेराफ्थलेट नामक प्लास्टिक का उपयोग शीतल पेय बनाने वाली बोतलों के निर्माण में होता है और भारत में इन बोतलों के प्लास्टिक को नब्बे प्रतिशत की दर से पुनर्चक्रीकरण के माध्यम से काम में ले लिया जाता है, जबकि जापान जैसे देशों में यह दर 72.1 प्रतिशत और यूरोप में 48.3 प्रतिशत है। दरअसल, भारत में कबाड़ी और कचरा बीनने वालों को इन बोतलों की छंटाई से कुछ आय हो जाती है और वे गली गली में घूम कर शीतल पेय की बोतलों को एकत्र कर लेते हैं। वहां से ये बोतलें एक असंगठित तंत्र द्वारा पुनर्चक्रीकरण (रिसाइकिलिंग) के लिए पहुंच जाती हैं। इनसे पालिएस्टर और डेनिम जैसे उत्पाद बनते हैं। इस दृष्टि से, साधारण से दिखने वाले कचरा बीनने वाले और कबाड़ का व्यापार करने वाले, दरअसल कथित संभ्रांत लोगों की तुलना में पर्यावरण संरक्षण में अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अगर शहरी कचरे का निस्तारण सही तरीके से हो, तो यह काम आसान हो सकता है। अप्रैल, 2016 में जब भारत में शहरी कचरे के निस्तारण से संबंधित कानून बना था, तो उसमें यह भी प्रावधान था कि प्लास्टिक उत्पादक छह महीने की अवधि में प्लास्टिक के पुनर्चक्रण से संबंधित संयंत्रों की भी स्थापना करेंगे। बहरहाल, अब तक ऐसा कितने उत्पादकों ने किया होगा, सब जानते हैं। फिर प्लास्टिक के पुनर्चक्रीकरण में कुछ तकनीकी समस्याएं भी हैं। मसलन, प्लास्टिक पैकिंग में काम आने वाले तरह-तरह के प्लास्टिक। इन विविध किस्म के प्लास्टिक का उपयोग उत्पाद को अलग-अलग स्तर पर सुरक्षा देने के लिए होता है। इन सबका निस्तारण एक ही तरीके से नहीं हो सकता। थर्मोप्लास्ट को पिघला कर उसकी विशेष किस्म की र्इंटें बनाई जाती हैं, जिनका उपयोग सीमेंट संयंत्रों में र्इंधन के तौर पर होता है। लेकिन प्लास्टिक का जलाया जाना तो हानिकारक गैंसों का उत्सर्जन करेगा ही। इन र्इंटों के उपयोग को अगर हानिरहित करना हो, तो उनका उपयोग एक हजार डिग्री सेल्सियस तापमान पर करना होता है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में ही सन 2017 में पैंसठ लाख टन प्लास्टिक कचरे का उत्पादन हुआ। समुचित चेतना, दृढ़ इच्छाशक्ति और पर्याप्त साधनों के बिना इतनी बड़ी मात्रा में इस प्लास्टिक का निस्तारण संभव नहीं है।

मदुरै के आर. वासुदेवन ने इस संबंध में देश और दुनिया को एक राह दिखाई है। 2001 में उन्होंने प्लास्टिक कचरे की मदद से सड़कें बनाने की एक परियोजना पर काम शुरू किया और 2006 में अपने इस काम का पेटेंट भी प्राप्त कर लिया। आर. वासुदेवन की सड़कें एक साथ दो समस्याओं का समाधान करती हैं। वे न केवल प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन का रास्ता बताती हैं, बल्कि सड़कों पर बार-बार पड़ने वाले गड््ढों की समस्या से भी आम आदमी और तंत्र को नजिात दिलाती हैं, क्योंकि ये सड़कें जल प्रतिरोधक होती हैं और बनाए जाने के बरसों बाद भी उन पर गड््ढे नहीं पड़ते। इस दृष्टि से वे परंपरागत कोलतार (बिटुमनी) या गिट्टी-सीमेंट से बनी सड़कों की तुलना में बहुत मजबूत पाई गई हैं। तमिलनाडु, हिमाचल, मध्यप्रदेश और केरल में ही नहीं, निकटवर्ती देश भूटान में भी उनकी तकनीक का उपयोग कर अनेक सड़कों का निर्माण कराया गया है और इन सड़कों को गुणवत्ता की दृष्टि से बहुत टिकाऊ पाया गया है। मगर बार-बार सड़क निर्माण और सड़क मरम्मत के काम पाने वाले ठेकेदार और उनके हितैषी अफसरों के अड़ंगे के कारण यह प्रयोग अब भी देश में बहुत लोकप्रिय नहीं हो पाया है। पर यह प्रयोग देश और दुनिया को प्लास्टिक कचरे के निस्तारण की चिंता से मुक्ति दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।

भारत में प्लास्टिक के प्रबंधन को लेकर प्रयास तो कई हुए हैं, लेकिन प्लास्टिक द्वारा पैदा होने वाले पर्यावरण संकट की तुलना में ये प्रयास पर्याप्त साबित नहीं हो रहे। 2016 में ही प्लास्टिक कैरी बैग की न्यूनतम मोटाई चालीस माइक्रॉन से बढ़ा कर पचास माईक्रॉन कर दी गई थी। तत्कालीन पर्यावरण राज्यमंत्री प्रकाश जावडेकर ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि देश में हर दिन पैदा होने वाले प्लास्टिक कचरे में से छह हजार टन कचरा ऐसा होता है, जिसे एकत्र कर पाना ही संभव नहीं होता। केंद्र और कई राज्य सरकारों ने सिर्फ एक बार काम आने वाले यानी ‘सिंगल यूज’ प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने सहित प्लास्टिक प्रबंधन के नियमों को कड़ा करने में भी रुचि दिखाई है। देखना यह है कि प्लास्टिक कचरे के जगह-जगह लगे ढेर समय रहते निस्तारित हो पाते हैं या मानवता के लिए चुनौती बने रहते हैं।

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