Participation of common people in governance and power is first condition of good governance then decentralization is also essential tool to ensure this participation of people-विकेंद्रीकरण और सुशासन

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सुशील कुमार सिंह

शासन और सत्ता में आम जनमानस की भागीदारी सुशासन की पहली शर्त है तो जनता की इसी भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए विकेंद्रीकरण एक अनिवार्य उपकरण भी है। विकेंद्रीकरण को विश्वास, पारदर्शिता और दायित्वशीलता का निर्माण करने वाली सरकार के वैकल्पिक मॉडल के रूप में सुझाया गया है। जबकि सुशासन का तात्पर्य उक्त संदर्भों के साथ कहीं अधिक संवेदनशील और अंतिम व्यक्ति तक नीतियों के माध्यम से खुशियां और शांति प्रदान करने से हैं। वैश्विक पटकथा यह है कि बिना जन भागीदारी के किसी प्रकार के विकास की कल्पना जमीनी होना पूरी तरह संभव नहीं है। गौरतलब है कि विकेंद्रित शासन व्यवस्था सुशासन के अंतर-संबंध को परिलक्षित और परिभाषित भी करता है जहां स्पष्टता, न्याय और सुचिता का अनुपालन निहित है।

लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के अंतर्गत स्थानीय स्तर पर सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना और अपना विकास व न्याय स्वयं करने के लिए जो व्यवस्था अपनाई गई है, उसे पंचायती राज व्यवस्था का नाम दिया गया। इसके द्वारा जन-जन को सत्ता में भागीदारी का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। इस व्यवस्था से सत्ता का विकेंद्रीकरण होता है जो लोकतंत्र का महत्त्वपूर्ण सोपान भी है। कोरोना महामारी से भारत सहित पूरी दुनिया प्रभावित हुई है और इसके प्रभाव में सुशासन को भी चुनौतीपूर्ण बनना पड़ा है। इस आपदा को अवसर में बदलना तभी संभव है जब नियोजन और क्रियान्वयन से जनता का सीधा सरोकार हो और सुशासन की दृष्टि से व्यवस्था अधिक खुलापन लिए हो। विश्व बैंक के अनुसार सुशासन एक ऐसी सेवा से संबंधित है जो दक्ष है, ऐसी न्यायिक सेवा से संबंधित है जो विश्वसनीय है और ऐसे प्रशासन से संबंधित है जो जनता के प्रति जवाबदेह है। सामाजिक आत्मनिर्भरता से सामाजिक समस्या और उसके समाधान तक पहुंच विकेंद्रीकरण और सुशासन से ही संभव है। आत्मनिर्भर भारत को पूरी तरह कसौटी पर कसना है तो यही दोनों उपकरण सार्थक हथियार सिद्ध होंगे।

विकेंद्रीकरण को लोकतांत्रिकरण का उपकरण माना जाता है। भारत में तिहत्तरवां और चौहत्तरवां संविधान संशोधन इसका बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा नागरिक घोषणापत्र, सूचना का अधिकार और सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति अर्थात ई-शासन इत्यादि ने नागरिकों के सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया है। इसके परिणामस्वरूप प्रशासन और नागरिक अंतर-संबंध को बढ़ावा मिला। इनसे प्रशासन अधिक प्रभावी और जनोन्मुखी बना। विकेंद्रीकरण का अभिप्राय अधिकारों को वितरित कर देना है। संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच निहित कार्यों का बंटवारा विकेंद्रित भावना के साथ-साथ सुशासन की परिपाटी को भी एक समुच्चय देता है।

कोरोना कालखंड के अंतर्गत आपदा के भीषण स्वरूप को देखते हुए निर्णय कहां से और कितने लिए जाएं, इसकी भी एक जद्दोजहद देखी जा सकती है। पिछले साल आई पहली लहर के दौरान पूरे देश में पूर्णबंदी का फैसला एक केंद्रीय फैसला था। जबकि इस साल दूसरी लहर में ऐसे निर्णयों को राज्यों के माध्यम से संचालित करके विकेंद्रित स्वरूप का परिचय दिया गया। सुशासन इस बात का हमेशा मोहताज रहा है कि चीजें जितनी समीप से परोसी जाएंगी, उतनी ही संवेदनशीलता के साथ लोकहित साधा जा सकेगा। केंद्र का तात्पर्य एक ऐसा दिमाग है जो पूरे देश के लिए अपने हिस्से का मजबूत नियोजन देने के साथ निगरानी कर सकता है, मगर राज्य वे भुजाएं हैं जो सभी तक आवश्यकता की वस्तुएं वितरित कर सकती हैं और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के लिए इन भुजाओं का मजबूत होना अपरिहार्य है। यही सुशासन और विकेंद्रीकरण का परिलक्षण भी है।

दरअसल सुशासन एक ऐसी गतिशील अवधारणा है जिसके तहत सभी के लिए हितकारी कार्य होते हों। अर्थशास्त्र के भीतर कौटिल्य ने जिस शासकीय विचारधारा को प्रस्फुटित किया है, वह सुशासन की ही एक धारा है। इसमें विकेंद्रीकरण का निहित अर्थ भी शामिल है। हालांकि उस दौर में सत्ता केंद्रीकरण से युक्त थी, मगर परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण जनहित की ओर झुके थे। यह मानना चाहिए कि विकेंद्रीकरण से केंद्र सरकारें अस्तित्वहीन नहीं हो जातीं, बल्कि राज्यों के साथ मिल कर पूरक भूमिकाएं निभाती हैं। कोरोना आपदा की इस घड़ी में यह उदाहरण देखने को मिल सकता है कि केंद्र और राज्यों ने इससे निपटने के लिए कैसे राजनीतिक उतार-चढ़ाव से परे होकर केवल सुशासन की स्थापना में ही ताकत झोंकी। विकेंद्रीकरण मौजूदा सांस्कृतिक तत्वों के प्रसंग में भी किया जाना चाहिए। उसे बदलते हुए संबंधों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। जहां पारदर्शिता और खुलापन है और जहां सर्वोदय के साथ अंत्योदय है, वहीं सुशासन की बयार बहती है। इसमें पूरी तरह स्थिरता तभी संभव है जब कर्तव्य के साथ निर्णय और अधिकार इकाइयों में बांट दिया जाता है। बंटी हुई इकाइयां विकेंद्रीकरण का उदाहरण हैं जो जनता के समीप और जन सरोकार से ओत-प्रोत मानी जाती हैं।

गौरतलब है कि विकेंद्रीकरण सभी का नहीं हो सकता। लेकिन समसामयिक विकास को देखें तो भूमंडलीकरण ने पूरी दुनिया में शासन को रूपांतरित ही नहीं किया, बल्कि सवाल यह भी रहा कि इस रूपांतरण की प्रकृति और मात्रा क्या रही है? इसकी अभी ठीक से पड़ताल नहीं हुई है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया की एक अन्य विषेशता वैश्विक संविधानवाद और नागरिक समाज का भूमंडलीकरण भी रही है। बाल विकास, महिला विकास, मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को सुशासन के लिए एक संरचना की आवश्यकता रही है। ऐसी आवश्यकताएं केवल केंद्रीय व्यवस्था में स्थापित करना मुश्किल है। ऐसे में विकेंद्रीकरण समय की जरूरत बना।

अच्छे शासन की कल्पना वर्ष 1991 में उदारीकरण के बाद प्रस्फुटित हुई। तब से अनेक सरकारें आईं और गईं। साथ ही उदारीकरण का वृक्ष न केवल बड़ा हुआ, बल्कि भारी भी हो गया। पर साथ चलने वाला अच्छा शासन जनमानस के हिसाब से गणना में कहीं पीछे रह गया। साल 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम एक ऐसे विकेंद्रित विकास की पहल थी जो ग्रामीण विकास की अवधारणा से ओत-प्रोत था। मगर बुनियादी विकास के अभाव में उस समय गांवों तक इसकी पहुंच मुमकिन नहीं हो पाई। हालांकि इस हेतु 1953 में राष्ट्रीय प्रसार सेवा भी शुरू की गई।

मगर यह धरातल पर उतरने से पहले धराशायी हो गई। इसकी पड़ताल के लिए बलवंत राय मेहता समिति का बनी थी। इसी समिति की सिफारिश से यह साफ हुआ कि जिनका विकास करना है, उन्हें ही यह काम देना ठीक रहेगा। यहां से स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की लौ जली थी। इसका नतीजा राजस्थान के नागौर में पंचायती राज व्यवस्था का उदघाटन था। दशकों की यात्रा करते हुए यही व्यवस्था उदारीकरण के बाद 1992 में तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संविधान संशोधन के तौर पर मील का पत्थर बनी। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का ही यह संदर्भ है कि गांवों में छोटी इकाइयां बड़ी सरकार की तरह स्थापित हो गईं जो सुशासन को भी एक नया आयाम दे रही हैं। वैसे औपनिवेशिक सत्ता के दिनों में विकेंद्रीकरण की शुरुआत 1861 से दिखाई देती है।

गौरतलब है कि स्थायी सरकार और सुशासन एक दूसरे के पर्याय हैं। परंतु इस सच के साथ कि सुशासन केवल सोच के चलते नहीं, बल्कि धरातल पर स्पष्ट रूप से बिखरा होना चाहिए और इस बिखराव के लिए विकेंद्रीकरण को सशक्त करना होता है। विकेंद्रीकरण की अवधारणा कोई नई नहीं है, मगर साख और मूल्य की दृष्टि से इसे केंद्रीकरण की तुलना में अधिक महत्त्व मिला है। डेढ़ साल से देश के प्रत्येक नागरिक को कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी से बचाने का प्रयास जारी है। अब तीसरी लहर की बात भी हो रही है। यह इस बात का परीक्षण है कि हमने सुशासन को बनाए रखने में कितनी कामयाबी हासिल की और नागरिकों के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए उन तक पहुंचने के लिए कैसा रास्ता अपनाया।



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