New treatment method of telemedicine is being adopted rapidly in most countries of the world – राजनीतिः चिकित्सा के वैकल्पिक माध्यम

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लालजी जायसवाल

इस वक्त स्वास्थ्य उद्योग बड़े पैमाने पर परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है, पर इस संकट के दौरान टेलीमेडिसिन, जिसे ई-स्वास्थ्य सुविधा का एक बेहतर विकल्प माना जाता है, की जरूरत महसूस की जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 1970 के दशक में पहली बार टेलीमेडिसिन शब्द सामने आया, जिसका मतलब है, फोन या वीडियो माध्यम का उपयोग कर इलाज करवाना। यानी कि हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स द्वारा इन्फॉर्मेशन और कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर बीमारी और चोट की पहचान कर इलाज और रोकथाम करना। आमतौर पर टेलीमेडिसिन के तीन स्तर माने होते हैं, ग्लूकोमीटर या ब्लड प्रेशर मॉनीटर से मिले रियल-टाइम डेटा के आधार पर वॉइस कॉल, वीडियो कॉल या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से रोग की पहचान करना। तालाबंदी की स्थिति में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अधिक से अधिक टेलीमेडिसिन मॉडल की ही सलाह दी है। कयास लगाया जा रहा है कि कोरोना वायरस का मानव से संबंध कुछ लंबे समय तक बना रहेगा। ऐसी स्थिति में टेलीमेडिसिन एक विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।

विश्व के अधिकतर देशों में टेलीमेडिसिन की नई उपचार पद्धति को तेजी से अपनाया जा रहा है, लेकिन उम्मीद की जा रही है कि अधिकतर देशों को ई-स्वास्थ्य प्रणाली अपनाने का खमियाजा भी उनके अस्पतालों को भुगतना पड़ेगा, लेकिन वहीं भारत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में, खासकर स्वास्थ्य संबंधी आधारभूत ढांचे में, अब भी खासी प्रगति नहीं कर सका है, भारत अपनी जीडीपी का लगभग डेढ़ फीसद ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है और इसी वजह से भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था सदा से जर्जर अवस्था में बनी हुई है, जिसकी पोल कोरोना महामारी के दौरान पूरी तरह खुल चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का मानना है कि एक हजार व्यक्तियों पर एक डॉक्टर की उपलब्धता होनी चाहिए। लेकिन भारत में पंद्रह सौ व्यक्तियों पर एक डॉक्टर की उपलब्धता देखी जाती है। ग्रामीण अंचलों की स्थिति तो और भी जर्जर अवस्था में है। भारत की जनसंख्या और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों के अनुसार अब भी देश में 4.5 लाख डॉक्टरों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। वहीं अगर अस्पतालों में प्रति एक हजार व्यक्तियों पर बिस्तरों की उपलब्धता देखी जाए तो भारत में 0.7 बिस्तर, अमेरिका में 2.9, चीन में 4.3 और जर्मनी ने 8.3 बिस्तर हैं। ऐसी स्थिति में टेलीमेडिसिन का फायदा अन्य देशों की तुलना में भारत को अधिक होने वाला है।

वैसे भी भारत अभी टेलीमेडिसिन के टॉप दस बाजारों में है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक टेलीमेडिसिन उद्योग चार सौ पांच अरब रुपए का हो जाएगा। देश में डिजिटल भारत अभियान चलाया जा रहा है, जिसके तहत इंटरनेट की उपलब्धता ग्रामीण स्तर तक प्रचुरता से होना आवश्यक है, इसलिए भारत नेट के तहत ब्रॉडबैंड कनेक्शन से ग्रामों को जोड़ने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, ताकि लोग ऑनलाइन भुगतान और ऑनलाइन चिकित्सा सुविधा का लाभ घर बैठे ले सकें। स्वास्थ्य पर खर्च की बात की जाए तो भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च आज भी अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है, भारत में स्वास्थ्य पर खर्च प्रति व्यक्ति 4704 रुपए है। चीन में 23875 रुपए और अमेरिका में 740175 रुपए (यानी 9740 डॉलर) है। भारत आज भी श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देशों की तुलना में स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च करता है। यही कारण है कि स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में भारत वैश्विक देशों की तुलना में एक सौ पैंतालिसवें पायदान पर है। लेकिन टेलीमेडिसिन की उभरती व्यवस्था से भारत अपनी स्वास्थ्य क्षेत्रों के साथ रैंकिग को भी मजबूत कर सकता है, क्योंकि टेलीमेडिसिन मॉडल अपनाने से अस्पताल में आने-जाने वाले मरीजों की संख्या आधी हो सकती है। इस प्रकार अस्पताल जाकर डॉक्टर से दिखाने के मुकाबले घर से ही फोन पर सलाह करने में तीस फीसद कम खर्च होगा।

एक अनुमान के मुताबिक टेलीमेडिसिन की वजह से साल 2025 तक तीन सौ पचहत्तर अरब रुपए तक की बचत हो सकती है, क्योंकि टेलीमेडिसिन से रोगियों का परिवहन खर्च और समय दोनों बच सकेगा। इससे स्वास्थ्य सुविधा की सुदूर क्षेत्रों तक पहुंच भी बन सकेगी और बिना चहलकदमी किए, घर बैठे उपचार भी हो सकेगा। ई-स्वास्थ्य यानी टेलीमेडिसिन से आपदा के दौरान चिकित्सा की सुविधा भी बाधित नहीं होगी। इस प्रकार टेलीमेडिसिन स्वास्थ्य क्षेत्र में किफायती दर पर क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है। यही वजह है कि आज स्थानीय और वैश्विक स्तर पर बिमारियों की निश्चित समय निगरानी में एक सक्षम विकल्प के रूप में टेलीमेडिसिन को देखा जा रहा है। यहां तक कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के स्वामित्व वाले नोफ्लोअट्स कंपनी ने हाल के दिनों में टेली-मेडिसिन के क्षेत्र में अपनी भूमिका में विस्तार करने की घोषणा भी कर दी है। जिसमें अगले तीन-चार महीनों में लगभग एक लाख डॉक्टरों को जोड़ने का लक्ष्य रखा है और इसी टेली-मेडिसिन सुविधा के जरिए मरीजों को चिकित्सीय परामर्श भी दिया जाएगा।

नोफ्लोअट्स के पास फिलहाल छह हजार डॉक्टरों की टीम है और उन्हीं के साथ में टेलीमेडिसिन सेवा की शुरुआत की जाएगी। इसमें ऑनलाइन वीडियो पर मरीजों को परामर्श दिया जाएगा, कंपनी ने धीरे-धीरे अन्य योजनाओं की तरफ बढ़ने की भी बात कही है, जैसे-ई-फार्मेसी, स्वास्थ्य जांच और स्वास्थ्य सेवा से संबंधित सेवाओं का भी धीरे-धीरे विस्तार किया जाएगा। लेकिन टेलीमेडिसिन की राह में कुछ समस्याएं भी दिख रही हैं, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। पहला, टेलीमेडिसिन के परिणामों के बारे में रोगियों में विश्वास की कमी है। दूसरा, स्वास्थ्यकर्मी ई-चिकित्सा यानी टेलीमेडिसिन से पूरी तरह अब भी परिचित नहीं हैं। तीसरा, भारत की चालीस फीसद जनसंख्या आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है, ऐसी स्थिति में इस वर्ग की तकनीकी अक्षमता साफ स्पष्ट होती है। चौथा, भारत में आज भी गावों तक इंटरनेट की प्रचुर उपलध्वता नहीं बन सकी है। बहरहाल, इन चुनौतियों का सामना आसानी से किया जा सकता है, इसके लिए कुछ सुधार की दरकार अवश्य होगी।
संपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को डिजिटल रूप में लाने का लक्ष्य हासिल करने के लिए तकनीकी और कानूनी ढांचे को मजबूत बनाना होगा। इसके लिए भारत के कानूनों में भी कुछ फेरबदल करने पड़ेंगे। लोगों में टेलीमेडिसिन के प्रति विश्वास जगाने के साथ उन्हें जागरूक करना होगा। भारत में बड़ी संख्या में स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, उनको प्रशिक्षित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए। प्राय: यह देखने में आता है कि बड़े से बड़े स्वास्थ्य अधिकारी भी वर्तमान टेक्नॉलाजी से कम परिचित हैं और वे कंप्यूटर आदि के प्रयोग से हिचकिचाते हैं। इसलिए वे आज भी कागज और फाइलों में ही काम कर रहे हैं, इसलिए चिकित्साकर्मियों को ई-चिकित्सा की बाबत प्रशिक्षण देना जरूरी होगा। साथ ही, गरीब जनसंख्या वाले तथा ग्रामीण पिछड़े क्षेत्रों में ऑनलाइन केंद्र खोलना होगा, जिससे गरीब, किसान तथा कम शिक्षित ग्रामीण वहां जाकर ऑनलाइन डॉक्टर से परामर्श कर सकें, क्योंकि अधिकतर गरीब, किसानों के पास आज भी स्मार्ट फोन की उपलध्वता नहीं बन सकी है, जिससे वे स्वयं ही टेली-उपचार करा सकें। इसलिए नजदीकी आनलाइन केंद्र स्थापित हो जाने से वे स्वयं वहां जाकर उपचार की बाबत संपर्क कर सकेंगे। नतीजा यह होगा कि इससे मिलने वाले अच्छे परिणामों को देख कर ग्रामीण स्वयं जागरूक होते चले जाएंगे और उनका टेलीमेडिसिन पर विश्वास भी बन जाएगा। इस प्रकार टेलीमेडिसिन स्वास्थ्य क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है, जिसकी एक झलक इस महामारी में देखी जा रही है। इसे चिकित्सा क्षेत्र में भविष्य में एक महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य सुधार के रूप में देखा जा रहा है।

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