Jansatta Editorial page article and comment on Science and scientific outlook – विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

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नवनीत शर्मा
महामारी के इस दौर में मानव अस्तित्व को प्राथमिक चुनौती के पश्चात सर्वाधिक खतरा ज्ञान, उसकी अवधारणाओं, संकल्पनाओं और विमर्श को है। किसे ज्ञान समझा जाए और किस ज्ञान के अनुरूप क्या कर्म वांछनीय अथवा अनुकरणीय है? हाथ धोने से लेकर अमुक समिधा कैसे महामारी से बचा सकती है, इस तक का ज्ञान आज सामाजिक विमर्श में मौजूद है। इनमें से किसे वस्तुनिष्ठ माना जाए और किसे आस्था अथवा परिस्थिति जन्य ज्ञान, यह एक अलग बहस को जन्म देता है। विज्ञान जनित ज्ञान की सहायता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह हमें किसी भी ‘सूचना’ को ज्ञान की कसौटी पर कसने में सहायता करे। किसे विशुद्ध ज्ञान समझा जाए और किसे आस्था या विश्वास का उपागम, इसका फैसला करने की दृष्टि प्रदान करे। विज्ञान ज्ञान संरचना की पद्धति है, जिसके तहत किसी भी निर्णय या नतीजे पर पहुंचने के पहले उसका वस्तुनिष्ठ विश्लेषण और तथ्यपरक मूल्यांकन अपरिहार्य है। विज्ञान किसी स्थापित ‘कथ्य’ को सिर्फ इसलिए सत्य की संज्ञा नहीं देता क्योंकि वह सर्वविदित है या किसी व्यक्ति विशेष के व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है, इसे भी सत्य नहीं मानता। विज्ञान में तर्कसंगत तथ्य ही ज्ञान है जो आगमन-निगमन की सान पर खरा उतरता है।

विज्ञान जनित ज्ञान अपनी वैधता अपने को दोहराए जाने और सुगठित होने से प्राप्त करता है। सुगठित से अभिप्राय यह है कि इस तरह की ज्ञान रचना में घुमा कर कान पकड़ने को अवैज्ञानिक माना जाता है और दोहराए जाने से तात्पर्य यह है कि यह ज्ञान, ज्ञाता, उसके लिंग, प्रजाति, यौनिकता, वर्ण, जाति, भाषा, आयु, भौगोलिक और राजनैतिक स्थापना से विमुक्त यदि अमुक प्रक्रिया से अवलोकन करेगा और निश्चित चरणों का अनुपालन करे तो अवश्य ही ‘यही’ ज्ञान पुन: उत्पादित करेगा। उदाहरण के लिए, यदि विद्युत प्रवाह सुचारु है तो बटन किसने दबाया के बोध से मुक्त बल्ब कमरे को रोशनी से जगमगा देगा, अगर शरीर का तापमान एक निश्चित सीमा से परे है तो उक्त तमाम सामाजिक विभेदों के पश्चात भी उसे बुखार ही माना जाएगा और उसके उपचार के लिए वैयक्तिकता से परे सबके लिए बुखार-निवारक दवा ही दी जाएगी। इसके कारगर होने के प्रमाण वस्तुनिष्ठ और तथ्यपरक मूल्यांकन से उपजे हैं, यह हमें इस चयन और कर्म के लिए सहायता करते हैं।

विज्ञान जनित ज्ञान की प्रमुख चारित्रिकता में इसका सार्वभौमिक होना भी है, पर साथ ही यह ज्ञान सर्वकालिक होने का दावा नहीं करता। इसकी विशिष्टता यही है कि यह निरंतर प्रयोगधर्मी अवलोकन और अनुभव के आधार पर स्वयं को बदलने में कोताही नहीं करता। यह उन तमाम प्रयोगों और सिद्धांतों का स्वागत करता है जो सरलतम और स्पष्टतम समाधान प्रस्तुत करते हैं। यही उन्मुक्तता इसे चिर स्थिर नहीं होने देती और नूतनता से परिपूर्ण कर परिवर्तनगामी बनाती है। ज्ञान निर्मिती की इस पद्धति से मानव और समाज को मूलत: यही सीखना है कि कोई भी ज्ञान अंतिम नहीं है। प्रत्येक ज्ञान परीक्षण उपरांत ही मान्य है और साथ ही सबसे प्रबलतम सीख यह कि सभी मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं और संशय करना कतिपय कर्म नहीं है। प्रश्न करने की मनोवृति और जिज्ञासा ही मनुष्य में मनुजता का भाव लाती है, विज्ञान जनित ज्ञान ही हमें सत्य, मिथ्या, यथार्थ, तर्क, आस्था और हेत्वाभास में अंतर करना सिखाता है।

विज्ञान ही हमें प्राकृतिक आपदाओं से बचने और सजग होने का संबल देता है। यही हमें शोषणमुक्त समतामूलक समाज का रास्ता दिखाता देता है। विज्ञान ही है जो मनुष्यों में भेद किए बिना उन्हें एक सजीव प्राणी मात्र मानता है। यह तमाम भेद धर्म, वर्ण, जाति, लिंग, भाषा, राजनैतिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मतभेदों से उबर कर मात्र मनुष्य होने की प्रेरणा देता है। विज्ञान एक भिन्न भाषायी विमर्श भी बुनता है जिसमें पानी, वारि जल, नीर, आब को इनके सामाजिक विभिन्नताओं के बावजूद ‘एचटूओ’ ही समझता है। यह समता और समानता के अभिरुपण के अलावा सभी चुनौतियों का वस्तुनिष्ठ रूप से मुकाबला करने का अदम्य साहस देता है, चाहे फिर वह अस्पृश्यता, वर्णभेद, लिंगभेद हो या मलेरिया, कालाअजार अथवा कोरोना।

इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि लगभग सत्तर सालों के निरंतर शिक्षायी प्रयासों और सम्मानजनक साक्षरता दर प्राप्त कर लेने के बावजूद और शिक्षा के मौलिक अधिकार का हिस्सा बनने के एक दशक बाद भी यह दृष्टिकोण क्यों जनमानस में विलुप्त है? इसकी पड़ताल के लिए हमें विज्ञान के पाठ्यक्रम, शिक्षण-अधिगम और मूल्यांकन के तरीकों की विवेचना करनी होगी। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या अन्य विषय जैसे साहित्य, कला, गणित, सामाजिक अध्ययन इत्यादि कहीं इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण के निर्माण में कोई बाधा तो नहीं पहुंचाते और विज्ञान शिक्षकों की निर्माण प्रक्रिया में हम कहां चूक रहे हैं।

इस प्रश्न का उत्तर कि क्या विद्यालय अथवा शिक्षण-अधिगम विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न कर सकता है, को तीन चरणों में देखा जा सकता है। पहला यह कि विज्ञान को प्राथमिक स्तर पर किस तरह समझा अथवा सिखाया जाता है। दूसरा, उच्च शिक्षण और शिक्षण के आने वाले क्रम में विद्यार्थियों को विज्ञान से कैसे जुड़ने की अपेक्षा की जाती है, और तीसरा यह कि किस प्रकार अन्य विषयों और उनके शिक्षण अधिगमों का उपयोग और प्रयास एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण व मानसिकता को आकार देते हैं। प्रारंभिक स्तर पर भारतीय ज्ञान व्यवस्था अथवा विद्यालयी व्यवस्था शिक्षार्थी पर ऐसा विश्वास ही नहीं रखती कि उसका स्वयं का कोई ज्ञान हो सकता है। अधिकतर शिक्षा उपक्रम और प्रक्रियाएं अनुदेशात्मक हैं जो विषय को रटे जाने को बढ़ावा देती हैं। इस पद्धति में अवलोकन और विश्लेषण का कोई स्थान नहीं है।

अपने शैक्षणिक ढांचे में अभी हमें ‘समस्या समाधान’ के तरीकों को सम्मिलित करना शेष है। विज्ञान का एक विषय के रूप में परिचय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अप्रत्याशित रूप से विज्ञान के इतिहास से सीखे जाने के लिए छोड़ दिया गया है, जिसमें खोज और खोजकर्ता के सही मिलान, महान वैज्ञानिकों की जीवनी, प्रमुख आविष्कार किस वर्ष में हुए और पृथ्वी गोलाकार है, ये कॉपरनिकस ने बताया, आदि को रटने के सहारे किया जाना है। दूसरे चरण में, विद्यार्थियों को ‘प्रयोगशाला’ में ले जाया जाता है, जिसके अनुसार विज्ञान जैसा जटिल विषय केवल प्रयोगशाला में ही गढ़ा जा सकता है। अब तक विज्ञान और उसके लिए अंग्रेजी में प्रवीणता को भी स्थापित कर दिया जाता है।

विज्ञान-शिक्षण और पाठ्यक्रम ‘ज्ञान-निर्माण’ के तरीकों पर यह उम्मीद से परे है कि हम दैनिक जीवन और विज्ञान के सामंजस्य को बूझ सकें। हम सामान्य विज्ञान का व्यवहार करते हुए यह उम्मीद रखते हैं कि चमत्कारिक रूप से कक्षा कक्ष में ‘वैज्ञानिक क्रांति’ होगी। विज्ञान शिक्षा में बुनियादी ढांचे और प्रयोगशालाओं के अभाव को नजरअंदाज कर दिया जाता है या इसे विज्ञान शिक्षण के लिए गैरजरूरी मान लिया जाता है। मनुष्य पैदाइशी ‘जिज्ञासु’ प्रवृत्ति का होता है। बाल स्वभाव की उत्कंठा इसकी परिचायक है। वह जानना चाहता है कि पंछी कैसे उड़ते हैं, फूल क्यों खिलते हैं, पृथ्वी गोल कैसे है आदि। परंतु ये सारे प्रश्न तो पाठ्यक्रम से बाहर और मूल्यांकन से परे हैं। इनको जानना ‘व्यर्थ’ है। फिर यह भय भी रहता है कि यदि विद्यार्थी को आज ऐसे सवाल पूछने की इजाजत दे दी जाए तो भविष्य में वह जटिल सामाजिक-राजनैतिक प्रश्न करेगा और इस क्रम में यथास्थिति को चुनौती देगा।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए राज्य, सरकार और समाज को इसको अपना सरोकार बनाना होगा। दाभोलकर, कलबुर्गी और होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम जैसे सरोकारों को पुनर्जीवित करना होगा और साथ ही विज्ञान शिक्षण की प्रविधि, पाठ्यक्रम और मूल्यांकन के तौर-तरीकों में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा। यह भारतीय परिदृश्य में जटिल इसलिए है, क्योंकि तमाम समझ-बूझ के बावजूद ‘ग्रहण’ लगने पर उसे राहु-केतु का प्रभाव मान लेने की सामाजिक दीक्षा हम पर हावी है। महामारी के इस दौर में हम नियमित रूप से कोई ‘चमत्कार’ होने की अपेक्षा कर रहे हैं, पर यह चमत्कार मानवीय जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के तहत परिवर्तन लाने, निरंतर हाथ धोते रहने और दो गज की दूरी बरतने से ही संभव होगा।



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