Jansatta Editorial page article and comment on role of women in labour economy – श्रम बाजार में महिलाएं

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आपदा किसी भी रूप में आए, उसका सर्वाधिक असर महिलाओं पर ही पड़ता है। उनकी आवश्यकताओं से लेकर स्वास्थ्य और सामाजिक व आर्थिक स्थिति तक प्रभावित होती है, विशेषकर उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता। देशकाल की सीमाओं से परे यह विश्वास अभी भी जड़ें जमाए बैठा है कि महिलाओं का मूल काम घरेलू दायित्वों का निर्वहन ही है। हालांकि समय के मानवाधिकारों के तथाकथित पैरोकारों ने आधी दुनिया को समानांतर स्थान देने की सतही भूमिका निभाई है। परंतु वास्तविकता यह है कि पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था इस मिथक को निरंतर स्थापित करने की चेष्टा करती रही है कि महिलाओं की शारीरिक और मानसिक क्षमताएं पुरुषों से सदैव ही कमतर रहीं हैं और इसी सोच के चलते उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

दुनिया के हर हिस्से में वे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं। सामान्य परिस्थितियों में महिलाओं के लिए रोजगार पाना एक बहुत बड़ी चुनौती है, परंतु आर्थिक संकट के समय उन्हें सर्वाधिक नकारात्मक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और फिर उनकी बहाली का लाभ भी उन्हें पुरुषों की तुलना में देर से मिलता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) के एक ताजा शोध में यह तथ्य सामने आया है कि कोरोना महामारी के कारण पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के रोजगार पर ज्यादा बुरा असर पड़ा है। अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसा क्यों? दरअसल, विश्व के सभी देशों में यह पूर्वाग्रह बड़ी मजबूती से उभर कर आया है कि आर्थिक संकट के समय नौकरी पर महिलाओं की तुलना में पुरुषों का अधिकार कहीं ज्यादा है।

समाज की यह सोच महिलाओं पर भावनात्मक दबाव बनाती है कि वे खुद ही श्रम बाजार से अलग हो जाएं। दरअसल, श्रम बाजार पर पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था का आधिपत्य कोई नवीन घटना नहीं है, अपितु यह तो वह व्यवस्थागत प्रयास है जिसे सदियों पूर्व सचेष्ट स्थापित किया गया था और जिसका स्पष्ट उद्देश्य था- अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण। स्त्रियों को स्वभावत: घरेलू सिद्ध करना या घर को ही उनका कार्य क्षेत्र बताना किसी स्वतंत्र सोच और वैज्ञानिक समाज का परिचायक नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण परंतु कटु सत्य यह है कि इस विचारधारा का निर्माण तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी स्थापित करता रहा है।

लियोनेल टाइगर और रोबिन फॉक्स ने अपनी पुस्तक ‘द इंपीरियल एनिमल’ में इस बात को उल्लेखित किया है कि प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि में लैंगिक श्रम विभाजन जैविक या वंशानुगत होता है। स्त्री पर पुरुष का आधिपत्य लिंगगत जैविक विशेषता है। मानव सभ्यता को जन्मना बता कर यथार्थ को नजरअंदाज करने की ऐसी पराकाष्ठाएं सदैव ही समाज को भ्रमित करती रही हैं। इन्हीं विचारधाराओं का परिणाम यह रहा कि आज भी श्रम विभाजन के लैंगिक आधार का समर्थन किया जाता है और इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि महिलाएं पुरुषों की अपेक्षाकृत जैविक रूप से दुर्बल हैं और इसीलिए कठिन कार्य करने में अक्षम हैं।

पर क्या यह सत्य है? कुछ समय पूर्व वैज्ञानिकों ने दक्षिणी अमेरिका की इंडीज पर्वतमाला में नौ हजार साल पुराने एक ऐसे स्थान का पता लगाया जहां महिला शिकारियों को दफनाया जाता था। इस खोज ने उन सभी विचारधाराओं को चुनौती दी है जिसमें न केवल महिलाओं को शारीरिक रूप से कमतर बताया जाता रहा है, बल्कि इसके साथ ही इस सत्य को भी नकार दिया है जिसमें कहा जाता है कि आरंभ में मानव को जब भी भोजन चाहिए होता था तब पुरुष शिकार करते थे और महिलाएं भोजन एकत्रित करती थी। साइंस एडवांसेस जनरल में प्रकाशित यह शोध उस अवधारणा के बिल्कुल उलट है जिसके हिसाब से माना जाता था कि उस समय के समाज का ढांचा एक ‘हंटर गैदरर सोसाइटी’ के रूप में गठित था।

शोधकर्ता इस अध्ययन के आधार पर यह कहते हैं कि लिंग आधारित काम के बंटवारे का कोई प्राकृतिक आधार नहीं है। वास्तविकता भी यही है कि श्रम विभाजन का लैंगिक विभेद किसी प्राकृतिक आधार के कारण नहीं, अपितु उस सामाजिक ताने-बाने की उपज है जहां मूल प्रश्न सत्ता पर नियंत्रण का है। इन सबसे अधिक पीड़ादायक तथ्य यह है कि महिलाओं की क्षमता पर प्रश्न उठाने वाली पितृसत्तात्मक व्यवस्था आवश्यकता अनुरूप महिलाओं के श्रम को विकल्प के रूप में इस्तेमाल करती है।

प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व यानी अठारहवीं सदी तक महिलाएं सिर्फ वस्त्र उद्योग से जुड़े व्यवसायों में ही संलग्न थीं, जहां उन्हें कम वेतन और जोखिम भरे हालात में काम करना पड़ता था। परंतु प्रथम विश्व युद्ध ने महिलाओं को पुरुषों के लिए पहले से चली आ रही आरक्षित भूमिका और व्यवसाय में स्थानांतरित करने का अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया, क्योंकि अधिकांश स्वस्थ पुरुष सेना या सैनिक कार्य में शामिल हो गए थे। इसलिए उनकी जगह युद्धकालीन स्थिति में अर्थव्यवस्था को संचालित करने के लिए कार्यबल की आवश्यकता थी। जिन महिलाओं को निरंतर यह पाठ पढ़ाया जाता था कि उनकी वास्तविक जगह घर के भीतर है, यकायक अपनी आवश्यकता के लिए उन्हीं महिलाओं को उनकी क्षमताओं का एहसास कराया गया।

परिवहन, अस्पताल, उद्योग यहां तक कि हथियारों की फैक्ट्रियों में भी महिलाओं ने काम किया। महिलाओं ने जिन स्थितियों में काम किया, वे कम खतरनाक नहीं थीं। विस्फोटक सामग्री बनाने वाले कारखाने विशेषरूप से खतरनाक थे। इन कारखानों के खतरनाक रसायनों से महिला श्रमिकों की त्वचा पीली होने के कारण उन्हें ‘कैनरी’ उपनाम दिया गया। महिलाओं की कम ताकत और विशेष स्वास्थ्य समस्याओं का उलाहना देने वाली व्यवस्था ने 1919 में ‘द सेक्स डिसक्वालीफिकेशन’ अधिनियम पारित कर दिया। यह अधिनियम इस प्रावधान को लेकर आया था कि लिंग भेद के कारण नौकरी से महिलाओं को बाहर करना अवैध होगा। परंतु ठीक उसी समय अपना मूल आचरण दिखाते हुए पुरुष सत्तात्मक केंंद्रित विचारधारा ने ‘द रेस्टोरेशन ऑफ प्री वॉर प्रैक्टिस एक्ट 1919’ पारित कर दिया।

इस अधिनियम के चलते अधिकांश महिला श्रमिकों को अपनी युद्ध कालीन भूमिकाएं छोड़ने के लिए विवश किया गया ताकि युद्ध से लौटने वाले पुरुषों के लिए रास्ता बनाया जा सके। यह विद्रूपता नहीं तो क्या है कि जो महिलाएं प्रथम विश्व युद्ध में बटालियन ऑफ डेथ का हिस्सा रहीं, उन पर मारक क्षमता, आक्रामकता और हिंसक प्रवृत्ति का अभाव होने जैसे आरोप लगाते हुए सेना में उनके दरवाजे किए जाने लगे। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में पुन: महिलाओं की जरूरत पड़ी। अमेरिकी सेना ने भी सैनिकों को लाने-ले जाने के लिए सत्ताईस महिला पायलटों की भर्ती की, तो सोवियत रूस में चार लाख महिलाओं को रेड आर्मी गर्ल्स के रूप में सेना में भर्ती किया गया, ताकि वे डॉक्टर और नर्स के अलावा लड़ाकू सैनिक के रूप में काम कर सकें।

दूसरे विश्व युद्ध में लगभग साठ लाख महिलाओं ने वे सारी भूमिकाएं निभाई जिन पर अब तक पुरुषों का एकछत्र साम्राज्य था। परंतु युद्ध समाप्ति के बाद महिलाओं पर फिर दबाव बनाया गया कि वे अपने पदों को छोड़ दें। नतीजा यह रहा कि लगभग तीन चौथाई से अधिक महिलाओं को अपना रोजगार छोड़ने को मजबूर होना पड़ा।

भारत में नोटबंदी के बाद उपलब्ध रोजगारों में जब कमी आई तो पुरुषों के लिए जगह बनी रहे, इसके लिए महिलाओं ने पहले रोजगार छोड़ा। पहले से कम रोजगार उपलब्धि की स्थिति में भी अधिक अनुभवी पुरुषों के रोजगार को बनाए रखने को प्राथमिकता दी गई। नोटबंदी के बाद उन परिवारों का प्रतिशत जिनमें दो या अधिक सदस्य रोजगार करते हैं, की हिस्सेदारी 34.8 फीसदी से घट कर 31.8 फीसदी पर पहुंच गई। यह विडंबना नहीं तो क्या है कि जो समाज महिलाओं के श्रम को मात्र वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में देखता है, सामान्य परिस्थितियों में उनको हाशिए पर धकेलने में जरा नहीं हिचकता। महिला श्रमबल का इतिहास और वर्तमान आज भी एक ही जगह खड़ा हुआ दिखाई देता है। तब भी और आज भी महिलाओं को अतिरिक्त श्रम के रूप में देखा जाता है और येनकेन प्रकारेण उनकी प्रतिभा और इच्छा को दरकिनार करते हुए श्रम बाजार से बाहर कर दिया जाता है।



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