Jansatta Editorial page article and comment on Prisoner crowd and justice system – कैदियों की भीड़ और न्याय तंत्र

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सुधीर कुमार
भारत की जेल व्यवस्था कैदियों की भीड़ को सीमित करने, जेल कर्मचारियों की कमी दूर करने और पर्याप्त संसाधन जुटाने जैसी समस्याओं से जूझ रही है। देश में कैदियों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उस अनुपात में जेलों की संख्या बढ़ने के बजाय घटती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की भारत जेल सांख्यिकी-2019 रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में देश में जहां जेलों की संख्या एक हजार चार सौ बारह थी, वहीं 2019 में यह घट कर एक हजार तीन सौ पचास रह गई। विशाल आबादी वाले देश में पर्याप्त संख्या में जेलें न होने के कारण जेलों में क्षमता से अधिक कैदी रखे जाते हैं। 2019 में भारतीय जेलों में चार लाख अठहत्तर हजार कैदी थे, जो जेलों की वास्तविक क्षमता से साढ़े अठारह फीसद अधिक है।

दूसरी समस्या यह भी है कि जेलों में सजायाफ्ता कैदियों के मुकाबले विचाराधीन कैदियों की संख्या भी कम नहीं है। मौजूदा समय में कुल कैदियों में से उनहत्तर फीसद कैदी विचाराधीन श्रेणी के हैं। देश की जेलों में भीड़ बढ़ने की यह एक बड़ी वजह है। हालांकि जेलों में बढ़ती भीड़ के अन्य कारणों में पर्याप्त जेलों का अभाव, जेलों की उच्च आवासन दर, अदालतों में लंबित मामलों के ढेर, न्यायाधीशों की कमी, न्याय तंत्र की सुस्ती और बढ़ते अपराध भी हैं। जेलों में बढ़ती भीड़ कैदियों के व्यावसायिक प्रशिक्षण, शिक्षण और सृजनात्मक कार्यों और पुनर्वास कार्यक्रमों में बाधा पहुंचाती है। कैदियों की निजता की रक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और अब महामारी से बचाव के लिए भी जेलों में भीड़ प्रबंधन की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।

भारत दुनिया के उन एक सौ अठारह देशों में शामिल है, जहां पर्याप्त संख्या में जेलें न होने की वजह से जेलों में आवासन दर उच्च बनी हुई है। वर्ष 2019 में भारतीय जेलों की आवासन दर एक सौ अठारह फीसद थी। इस मामले में हम जापान (सत्तावन फीसद), नीदरलैंड (चौहत्तर फीसद), जर्मनी (उनयासी फीसद) और रूस (अस्सी फीसद) जैसे देशों से काफी पीछे हैं। वर्तमान में देश के उन्नीस राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में कैदियों की आवासन दर सौ फीसद से भी अधिक है। दिल्ली की जेलों में यह दर पूरे देश में सबसे ज्यादा एक सौ पचहत्तर फीसद है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में जेल आवासन दर एक सौ अड़सठ फीसद, उत्तराखंड में एक सौ उनसठ फीसद, मेघालय में एक सौ सत्तावन फीसद और मध्यप्रदेश में एक सौ पचपन फीसद तक है।

भारतीय जेलें सिर्फ कैदियों की भीड़ से ही नहीं, कर्मचारियों की कमी से भी जूझ रही हैं। देशभर में जेल कर्मचारियों के स्वीकृत सत्तासी हजार पांच सौ निन्यानवे पदों में से छब्बीस हजार आठ सौ बारह पद खाली पड़े हैं। वहीं, जेलों में कैदियों की स्वास्थ्य देखभाल के लिए नियुक्त होने वाले स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या भी लगभग दो हजार ही है, यानी एक चिकित्साकर्मी पर लगभग ढाई सौ कैदियों की स्वास्थ्य जांच का भार है। इस मामले में सबसे बुरी स्थिति पश्चिम बंगाल की है, जहां एक स्वास्थ्यकर्मी को औसतन नौ सौ तेईस कैदियों की सेहत का हाल लेना पड़ता है।

पर्याप्त चिकित्सा के अभाव में बड़ी संख्या में कैदी शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार पड़ते हैं। गंभीर बीमारी की हालत और बेहतर चिकित्सा के अभाव में वे अक्सर दम तोड़ देते हैं। 2019 में विभिन्न बीमारियों से देशभर के जेलों में लगभग डेढ़ हजार कैदियों की मौत हुई, जिनमें चार सौ छह कैदी दिल की बीमारी के कारण, एक सौ नब्बे फेफड़े की बीमारियों से, इकसठ कैदी गुर्दे की बीमारी से, तियालीस कैदी एड्स से, इक्यासी कैदी टीबी से, अठहत्तर कैदी कैंसर से और छप्पन कैदी मस्तिष्काघात से मरे थे। जाहिर है, कैदियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

जेलों में कैदियों की भीड़ बढ़ना कोई नई समस्या नहीं है। लेकिन जेलों में कोरोना संक्रमण के खतरे के कारण कैदियों की भीड़ कम करने का दबाव है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में कैदियों की भीड़ कम करने के लिए सरकार को निर्देश देते हुए कहा कि जिन कैदियों को पिछले साल महामारी के मद्देनजर पैरोल दी गई थी, उन्हें फिर से यह सुविधा दी जाए। गौरतलब है कि पिछले साल उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद कुल अड़सठ हजार कैदियों को पैरोल पर रिहा किया गया था। हालांकि जेलों में दबाव को कम करने का यह एक तात्कालिक उपाय है, लेकिन धीरे-धीरे सरकार को ‘जेल सुधार’ की ओर भी कदम बढ़ाने की जरूरत है, ताकि कैदियों की संख्या को सीमित करने का मकसद पूरा हो जाए।

इस मामले में हम नीदरलैंड से सीख सकते हैं, जिसकी न्याय व्यवस्था की दुनियाभर में तारीफ होती है। प्रति एक लाख की आबादी पर वहां कैदियों की संख्या केवल इकसठ है। अपराधियों के प्रति बर्ताव का तरीका बदलने, मानवतापूर्ण व्यवहार करने और कैदियों को समाज के लिए उपयोगी बनाने पर जोर देने के चलते वहां अपराध दर में इतनी कमी आ गई है कि वहां जेलों को बंद कर उन्हें शरणस्थली और होटल आदि में तब्दील किया जा रहा है। 2014 के बाद वहां तेईस जेलों को बंद किया जा चुका है।

देश में जेल सुधार की बुनियाद न्याय व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण से जुड़ी है। भारतीय न्याय तंत्र खुद ही न्यायाधीशों की कमी को दूर करने और लंबित मामलों के निपटारे की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है। जब तक पर्याप्त जजों की नियुक्तियां नहीं की जाएंगी, तब तक त्वरित न्याय की आस पूरी नहीं होगी। जब समय पर न्याय नहीं होगा, तो जेलें विचाराधीन कैदियों से भरी रहेंगी। न्यायाधीशों की कमी से जूझ रही अदालतों में लंबित मामले दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। आंकड़ों में अभी तीनों स्तर की अदालतों में करीबन साढ़े चार करोड़ मामले लंबित हैं।

सर्वोच्च न्यायालय में अड़सठ हजार मामले लंबित हैं। जबकि देश के सभी पच्चीस उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या सत्तावन लाख के आसपास है। इसी तरह जिला एवं सत्र न्यायालयों में तीन करोड़ इक्यासी लाख मामले लंबित हैं। ऐसे में न्याय प्रक्रिया से जुड़े लोगों के मस्तक पर चिंता की लकीरें उभरना स्वाभाविक ही है। 2018 में नीति आयोग ने अदालतों में मामलों के निष्पादन की रफ्तार के आधार पर अनुमान लगा कर बताया था कि लंबित मामलों का निपटारा करने में करीब सवा तीन सौ साल से अधिक लग सकते हैं।

अदालतों में लंबे समय से न्यायाधीशों की भी भारी कमी बनी हुई है। देश के सभी पच्चीस उच्च न्यायालयों में चार सौ से ज्यादा जजों के पद खाली हैं। जबकि जिला एवं सत्र न्यायालयों में पांच हजार से अधिक जजों की कमी है। उच्चतम न्यायालय में चार न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। फिर, आबादी के हिसाब से देश में जजों की संख्या भी अपर्याप्त है। देश में प्रति दस लाख की आबादी पर केवल उन्नीस जज कार्यरत हैं। जबकि अमेरिका में प्रति दस लाख की आबादी पर एक सौ सात, कनाडा में पचहत्तर, ब्रिटेन में इक्यावन और आस्ट्रेलिया में बयालीस जज हैं।

किसी भी शासन व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालन में न्याय तंत्र की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है। निष्पक्ष न्याय उपलब्ध कराने के लिए यहां इकहरी न्यायापालिका की व्यवस्था है, जबकि अनुच्छेद-14 के तहत कानून के समक्ष समानता के आदर्श की स्थापना की गई है। न्यायपालिका लोकतंत्र का एक मजबूत स्तंभ है। सुस्त न्यायिक व्यवस्था से लोकतांत्रिक मूल्यों को आघात पहुंचता है। अत: देश में सुलभ, सस्ता और त्वरित न्याय की व्यवस्था बहाल की जानी चाहिए, जिससे भारतीय लोकतंत्र और न्यायतंत्र पर नागरिकों का भरोसा कायम रह सके।



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