jansatta-editorial-page-article-and-comment-on-Policy of dealing with Maoists-माओवादियों से निपटने की नीति

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ब्रह्मदीप अलूने

छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर के जंगलों में पिछले हफ्ते माओवादी हमले में सुरक्षाबलों के बाईस जवानों के मारे जाने से इन क्षेत्रों में माओवाद का प्रभाव कमजोर पड़ने के सरकारी दावों की हकीकत सामने आ गई है। साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बनी इस विकराल समस्या से निपटने की नीति भी सवालों के घेरे में हैं।

दरअसल नेपाल से शुरू होकर देश के कई राज्यों की भौगोलिक जटिलताओं से गुजरने वाला रास्ता, जिसे लाल गलियारा कहते हैं, माओवादियों के लिए कई कारणों से सुरक्षित पनाहगाह है। सीमाई इलाकों की सामाजिक और आर्थिक विषमताएं जहां विद्रोह पनपने का मजबूत आधार बनती हैं, वहीं जातीय संरचना, पिछड़ापन, गरीबी, अशिक्षा और सामंतवाद से संतप्त समूहों को लामबंद करके वैधानिक व्यवस्था को चुनौती मिलने की आशंकाएं भी बढ़ जाती हैं।

पिछड़े इलाकों में विकास के लिए माओवादियों से बातचीत की जरूरत है। वे इन इलाकों में विकास को अवरुद्ध कर अपनी समानांतर सत्ता स्थापित किए हुए हैं। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समर्थन इसे और घातक बना देता है। आदिवासी युवाओं के पिछड़ेपन के कारण उनके दिग्भ्रमित होने और हिंसा का रास्ता अपनाने की आशंका बढ़ जाती है। माओवाद के इस अभियान को महज जंगल या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता। नक्सलवादी होने का आरोप कई बार ऐसे लोग भी झेलने को मजबूर होते हैं जो शांतिप्रिय जीवन जीना चाहते हैं।

वे जंगल में रह कर माओवादियों की समानांतर सत्ता के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाते, अत: उन्हें मजबूरी में नक्सलवादी समूहों का हिस्सा बनने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे लोगों को नक्सलवादियों के चंगुल से मुक्त करवाने की नीतियां प्रभावी नहीं हो सकी हैं। आदिवासी इलाकों में गरीबी और रोजगार का बड़ा संकट रहा है। यह स्थिति माओवादी शक्तियों को मजबूत करने के मददगार साबित हुई हैं।

माओवाद से निपटने की नीतियों में आमतौर पर सुरक्षात्मक कदमों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। नक्सली समूहों में स्थानीय लोग शामिल होते हैं, इसलिए इसके लिए सैन्य विकल्प को ज्यादा तरजीह देना समस्या को बढ़ाता रहा है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) इन कार्रवाइयों में अग्रणी भूमिका में होती है।

स्थानीय परिस्थितियों, भाषा, रीति-रिवाज और नक्सलियों की पहचान न कर पाने की कमियां न केवल आंतरिक संघर्ष को बढ़ा रही हैं, बल्कि इससे लगातार बड़ी संख्या में सुरक्षाबल भी हताहत हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ में हाल के नक्सल विरोधी अभियान में कई ऐसी रणनीतिक खामियां सामने आई हैं जिसकी कीमत कई जवानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। राज्य के दक्षिणी जिलों बीजापुर, नारायणपुर और दंतेवाड़ा के करीब चार हजार किलोमीटर क्षेत्र में घने जंगल हैं। सुकमा की सरहद आंध्र प्रदेश और ओड़ीशा से मिलती है।

यह माओवादियों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आवागमन का सुगम रास्ता है। नक्सली इलाकों को लेकर यह साफ है कि सुरक्षाबलों से ज्यादा बेहतर तैयारी और जंगलों की जानकारी नक्सलियों को होती है। खुफिया एजेंसियों के पास कई माओवादी नेताओं की कोई जानकारी तक नहीं है।

उन्हें यह भी नहीं पता कि उनके नेता और सदस्य कौन हैं और किन इलाकों में रहते हैं। ऐसे में सुरक्षाबल तभी हमला करते हैं जब जंगल में किसी के पास हथियार हो, अन्यथा सुरक्षा बलों को सामान्य नागरिकों के मारे जाने का डर बना रहता है। यहां यह तथ्य भी उभर कर आता है कि विभिन्न एजेंसियों के साझा अभियान को अंजाम तक पहुंचाना आसान नहीं होता। अलग-अलग बलों की अपनी कमांड होती है और माओवादी हमले से अप्रत्याशित परिस्थितियां उत्पन्न होने पर उनमें तालमेल का अभाव साफ झलकता है।

देश में आतंकवाद से निपटने के लिए एकल केंद्र स्थापित करने और एनआइए जैसी जांच एजेंसी का प्रावधान तो किया गया है, लेकिन नक्सलियों से निपटने के लिए अभी तक ऐसी कोई रणनीति नहीं बन सकी है। एसटीएफ, सीआरपीएफ, डीआरजी और कोबरा बटालियन के साझा खोजी अभियान के पहले गुप्तचर एजेंसियां नाकाम रहीं।

जिस गांव में पहले से ही ताले लगे थे और नक्सली घरों के अंदर छिपे थे, इस योजना का पता न कर पाना सुरक्षाबलों के लिए जानलेवा साबित हुआ। मार्च से लेकर मई तक खेती का समय नहीं होता, इसीलिए नक्सली काडर की भर्ती का यह मुफीद समय माना जाता है।

ऐसी जानकारियां भी सामने आई हैं कि नक्सलियों के बड़े नेता कार्यक्रमों के जरिए युवाओं को अपने अभियान से जोड़ते हैं। सुरक्षा एजेंसियां इस दौरान बड़े अभियानों की योजना बनाती हैं जिससे ज्यादा संख्या में माओवादियों को पकड़ा जा सके, लेकिन भयावह हकीकत यह है कि इन्हीं महीनों में ही नक्सली सुरक्षाबलों को बड़ा नुकसान पहुंचाने में कामयाब हो जाते हैं।

सीआरपीएफ भारत का सबसे बड़ा सशस्त्र पुलिस बल है। यह बल केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रति जवाबदेह होता है। जंगल में सीआरपीएफ के जवान नक्सलियों के लिए खुले लक्ष्य होते है, जबकि जंगल में रहने वालों की पहचान करने और नक्सलियों को पहचानने के लिए स्थानीय पुलिस बेहतर तरीके से काम कर सकती है।

नक्सल विरोधी अग्रिम मोर्चे के बल- डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) में अधिकतर स्थानीय युवा भर्ती किए जाते हैं, जिनमें नक्सली संगठनों को छोड़ कर मुख्यधारा में लौटने वाले युवा होते हैं। उन्हें स्थानीय होने का फायदा मिलता है। वे स्थानीय लोगों में आसानी से घुल-मिल सकते हैं और पूर्व नक्सली होने की वजह से उनके तौर-तरीकों के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं। माओवादी इलाकों में डीआरजी जैसे स्थानीय बलों को ज्यादा तरजीह देने और उन पर निर्भरता बढ़ाने की जरूरत है।

वर्ष 1967 में ही आॅल इंडिया कमेटी आॅन कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरी का गठन किया गया था। इसमें पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, केरल और जम्मू कश्मीर के नेता शामिल हुए थे और उन्होंने संगठन को मजबूत करने, सशस्त्र संघर्ष चलाने और गैर-संसदीय मार्ग अपनाने का निर्णय लिया था।

इससे यह साफ था कि वंचितों, गरीबों और शोषितों के हितों के नाम पर स्थापित संगठन ने लोकतंत्र की वैधानिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए हिंसक और अलोकतांत्रिक रास्ता चुना। लोकतांत्रिक देश में जहां व्यवस्था परिवर्तन के लिए व्यापक संवैधानिक उपाय हैं, वहां आश्चर्यजनक रूप से माओवाद को मजबूत करने में बड़ी भूमिका स्थानीय राजनीति की भी रही है।

यह देखा गया है कि राजनीतिक दल स्थानीय स्तर पर सत्ता हासिल करने के लिए नक्सलियों का समर्थन हासिल करने से भी परहेज नहीं करते और यह समस्या को ज्यादा गंभीर बनाता है। बिहार के लंबे समय तक नक्सलग्रस्त संदेश प्रखंड का मॉडल पूरे देश में अपनाने की जरूरत है। इस इलाके में नक्सलियों का प्रभाव खत्म करने के लिए पंचायत चुनावों का सहारा लिया गया, जिसमें अधिकतर मुखिया माओवादी चुने गए।

लेकिन समय के साथ विकेंद्रीकरण का फायदा जनता को मिला और लोगों का मोह माओवादियों से भंग हो गया। इस समय यह इलाका माओवाद के प्रभाव से मुक्त है। इससे साफ है कि राज्य सरकारों को स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था को मजबूत करने और छत्तीसगढ़ सहित देश के माओवाद ग्रस्त इलाकों में राजनीतिक दलों को अपना काडर बढ़ाने की जरूरत है। इससे लोकतांत्रिक सहभागिता बढ़ेगी और माओवादी शक्तियों की समांतर सत्ता को कमजोर किया जा सकेगा।

दरअसल केंद्र और राज्य में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें होने का असर नक्सलवाद से निपटने की रणनीति और तौर-तरीकों को प्रभावित करता है। छत्तीसगढ़ के माओवादी मांग करते रहे हैं कि बस्तर से सुरक्षाबलों के शिविर हटाए जाएं और माओवादी नेताओं को रिहा कर दिया जाए। राज्य सरकार कहती है कि माओवादी पहले हथियार छोड़ें, तभी बातचीत होगी। राज्य सरकारों को इस संबंध में दोहरी रणनीति पर काम करने की जरूरत है। बातचीत के विकल्प खोलने से नक्सलियों की पहचान करने में सुगमता हो सकती है।

वास्तव में नक्सलवाद से निपटने के लिए स्थानीय पुलिस, स्थानीय शासन, स्थानीय लोग, स्थानीय परिवेश और स्थानीय राजनीति में समन्वय स्थापित करने और स्थानीय व्यवस्थाओं को बेहतर करने की ज्यादा जरूरत है।



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