Jansatta Editorial page article and comment on Peace crisis in afghanistan – नए संकट में अफगानिस्तान

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संजीव पांडेय
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान को अधर में छोड़ दिया है। उसके और नाटो देशों की सैनिकों की वापसी जारी है। इस बीच अफगानिस्तान में घट रही घटनाएं अफगानी जनता के साथ-साथ एशियाई मुल्कों को भी परेशान कर रही हैं। विदेशी सैनिकों की वापसी के साथ ही तालिबान ने हमले तेज कर दिए हैं। कई इलाकों को अफगान सेना से छीन लिया है। इससे तालिबान की रणनीति अब स्पष्ट हो गई है। तालिबान ने काफी चालाकी से दोहा शांति वार्ता को धीमा रखा था। वह अमेरिकी सैनिकों की वापसी का इंतजार कर रहा था। दोहा में बातचीत अभी रुकी हुई है। पर तालिबान की इस बढ़ती ताकत से पाकिस्तान खुश है। हालांकि चीन और ईरान परेशान हैं। इसीलिए अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया में ईरान और चीन सक्रिय हो गए हैं क्योंकि दोनों मुल्कों को अलग-अलग कारणों से पाकिस्तान नियंत्रित तालिबान पर भरोसा नहीं है।

अफगानिस्तान के मौजूदा हालात 2001 से अलग हैं। बीस साल पहले अफगानिस्तान में अमेरिका और सहयोगी नाटो देशों का जो जोश देखते बनते था, वह हताशा में बदल चुका है। अफगानिस्तान में दो दशक से फंसे अमेरिका की स्थिति हर तरह से कमजोर हो गई है। दो दशकों में बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक मारे गए। अफगानिस्तान के अभियान पर अब तक के सैन्य खर्च ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचाया। अमेरिका यह अच्छी तरह से समझ चुका है कि अफगानिस्तान की जमीन पर भी उसका वही हाल हो रहा है जो वियतनाम और इराक में हुआ। और आखिरकार इन देशों से भी उसे अपना बोरिया-बिस्तर समेटना ही पड़ा। इसीलिए अमेरिका अफगानिस्तान से बच कर भाग निकला।

आज अफगान सरकार लाचार नजर आ रही है। अफगान फौज कमजोर पड़ चुकी है। अब तक उसे अमेरिकी सैनिकों की ओर से ताकत मिली हुई थी। अत्याधुनिक हथियार थे और साथ ही अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी से मनोबल भी बना हुआ था। यह मनोबल अब टूट चुका है। तालिबान के खिलाफ लड़ने के बजाय अफगान सैनिक जान बचाने के लिए दूसरे देशों में भाग रहे हैं या फिर तालिबान के साथ ही मिल जा रहे हैं। इससे तालिबान लड़ाकों की ताकत बढ़ रही है। तालिबान का दावा है कि उसने देश के एक तिहाई जिलों पर पूरी तरह से नियंत्रण कर लिया है। इसलिए अब आने वाले दिनों में तालिबान और अफगान सैनिकों के बीच जंग और तेज होगी। इस खतरे से कोई इनकार नहीं करेगा कि अब तालिबान के आत्मघाती हमले बढ़ेंगे और इस हिंसा में बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक मारे जाएंगे। इन हालात में अफगानिस्तान में लंबा गृह युद्ध भी छिड़ सकता है।

अगर इसमें पड़ोसी मुल्कों ने हस्तक्षेप किया तो तालिबान की भी मुश्किलें ज्यादा बढ़ेंगी। कई जगहों पर स्थानीय अफगान आबादी ने तालिबान के खिलाफ हथियार उठा लिए हैं। वे अफगानिस्तान की सरकारी सेना को सहयोग दे रहे हैं। हालांकि तालिबान अभी भी रणनीतिक तौर पर चालाकियां बरत रहा है। उसे कई पड़ोसी देशों के अफगानिस्तान से जुड़े हितों की जानकारी है। इसलिए उसने चालाकी से कहा है कि वह जल्द ही लिखित शांति योजना अफगान सरकार को देगा। लेकिन तालिबान के तमाम दावों पर अफगान सरकार को कोई भरोसा नहीं है।

अफगानिस्तान में भविष्य की समस्या सिर्फ गृह युद्ध तक ही सीमित नहीं है। अगर संघर्ष बढ़ा तो इस मुल्क की माली हालत और बिगड़ती चली जाएगी। अफगान वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि तालिबान के हमलों में तेजी की वजह से सरकार के राजस्व संग्रह को भारी नुकसान पहुंचा है। सीमा शुल्क की वसूली में कमी आई है। तालिबान ने अफगानिस्तान में दूसरे दर्जे वाले कुछ सीमा शुल्क केंद्रों पर अफगान सरकार के नियंत्रण को कमजोर कर दिया है। इस समय सीमा शुल्क संग्रहण पचास करोड़ अफगानी के बजाय पंद्रह करोड़ अफगानी प्रतिदिन रह गया है, यानी इसमें दो तिहाई रोजाना की गिरावट आई है। हालांकि एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि तालिबान के हमले को सिर्फ बहाना बनाया गया है। दरअसल सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों ने भ्रष्टाचार को बढ़ाया है। अधिकारी तालिबान का बहाना बना खुद पैसा बटोर रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अफगानिस्तान सरकार की आय कैसे बढ़ेगी, देश को चलाने के लिए पैसे आएंगे कहां से? जाहिर ऐसे हालात में अगर गृह युद्ध बढ़ा तो अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था ढह जाएगी।

सरकार की आमद कैसे बढ़े और देश का विकास कैसे हो, इस पर कोई ठोस योजना बना पाने में अमेरिका ने कोई काम नहीं किया। यह उसकी प्राथमिकता में कभी रहा भी नहीं। अमेरिकी नीति ऐसे देशों को फंसाए रखने की ही रही है। तभी अमेरिकी हित पूरे होते हैं। पिछले दो दशक से काबुल पर राज करने वाले अफगान नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। हालांकि आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के नाम पर पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान को खासी आर्थिक मदद दी। अफगानिस्तान में विकास कार्य तेज करने की कोशिशें भी की गईं। अफगानिस्तान सरकार को सैन्य सहयोग राशि भी दी गई। लेकिन इन सबका कोई लाभ दिखा नहीं। आज तालिबान लड़ाके अफगान सेना पर भारी पड़ रहे है। ऐसे में भविष्य में अफगानिस्तान को कहां से आर्थिक मदद मिलेगी, यह समय बताएगा।
अफगानिस्तान को लेकर ईरान काफी सक्रिय है। उसने कुछ बातें स्पष्ट कर दी हैं। ईरान का कहना है कि तालिबान अफगानिस्तान का अकेला चेहरा नहीं है। अफगानिस्तान में तमाम जनजातियों की समावेशी सरकार बननी चाहिए।

ईरान किसी भी कीमत पर उज्बेक, ताजिक और हजारा जनजातियों को कमजोर नहीं होने देगा। हालांकि ईरान और तालिबान के बीच पिछले कुछ सालों में बेहतर संबंध विकसित हो गए हैं। लेकिन काबुल पर तालिबान के एकछत्र कब्जे को ईरान कतई पसंद नहीं करेगा। यही कारण है कि ईरान अब सीधा हस्तक्षेप शुरू कर चुका है। पिछले दिनों ईरान ने तेहरान में तालिबान के वरिष्ठ नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानकजाई और अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति युनूस कानूनी की वार्ता करवाई। इस वार्ता में ईरान ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि वह काबुल में ईरान सारी जातियों की सम्मिलित सरकार चाहता है। ईरान कई कारणों से अफगानिस्तान को लेकर गंभीर है। ईरान की लंबी सीमा अफगानिस्तान से लगती है। इस सीमा पर वे राज्य हैं जहां तालिबान मजबूत है। ये अफगानी राज्य ईरान के लिए सामरिक और आर्थिक महत्त्व वाले हैं क्योंकि इन राज्यों से ही पाकिस्तान के क्वेटा से तुकेर्मेनिस्तान तक जाने वाला आर्थिक गलियारा गुजरता है। ईरान को पता है कि अगर काबुल पर तालिबान का एकछत्र राज्य हुआ तो इस इलाके में पाकिस्तान का सीधा प्रभाव बढ़ेगा और इससे ईरान के हित प्रभावित होंगे।

चीन भी अफगानिस्तान में सक्रिय हो गया है। वह अपने हित देख रहा है। चीन के स्वायत क्षेत्र शिनजियांग में सक्रिय उइगर अलगाववादियों के तालिबान और अलकायदा से करीबी संबंध है। चीन की सीमा भी अफगानिस्तान से मिलती है। इसलिए चीन को आशंका है कि अगर तालिबान काबुल को नियंत्रित करने में सफल हो गया तो उइगुर अलगाववादियों का मनोबल बढ़ेगा। चीन अफगानिस्तान में सैन्य अड्डा बनाने पर भी विचार कर रहा है। इसके अलावा वह अफगानिस्तान में आर्थिक निवेश और तेज करने की योजना बना रहा है। दरअसल तालिबान चीन की सबसे महत्त्वपूर्ण परियोजना बेल्ट एवं रोड इनीशिएटिव में भी बाधा बन सकता है। ऐसे हालात में अफगान सरकार, तालिबान और अपने हितों को देख कर विदेशी मुल्क अफगानिस्तान को कहां पहुंचाएंगे, यह वक्त ही बताएगा।



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