Jansatta Editorial page article and comment on Latin american country venezuela crisis

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ब्रह्मदीप अलूने
कभी दुनिया में तेल की कीमतों का निर्धारण करने में बड़ी भूमिका निभाने वाला लातिन अमेरिकी देश वेनेजुएला गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। राजनीतिक सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखने की कोशिश और अमेरिकी विरोध के बूते वैश्विक जगत में आक्रामक पहचान बनाने की इस देश के नेतृत्व की नीति के दुष्परिणाम यहां के लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। करीब सवा तीन करोड़ की आबादी वाले वेनेजुएला के पास अपार खनिज संसाधन हैं, लेकिन इसके बावजूद लाखों लोग भूखे मर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य कार्यक्रम के अनुसार वेनेजुएला में हर तीन में से एक नागरिक के पास खाने के लिए भोजन नहीं है।

देश की मुद्रा इतनी ज्यादा गिर गई है कि दस लाख बोलिवर के नोट की भारत में कीमत महज छत्तीस रुपए के बराबर है। मुद्रा संकट बढ़ने से खाना मिलना बहुत महंगा हो गया है और लोग भूखे रहने को मजबूर हैं। सुपर बाजार पर सरकारी नियंत्रण स्थापित कर दिया गया है, जहां महंगा और दूषित खाना बेचा जा रहा है। देश के कई इलाके पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। रोजगार छिन गए हैं और लोग दूसरे देशों में भागने को मजबूर हो रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम पर है और कानून-व्यवस्था की स्थिति चौपट हो चुकी है। जेलों में खूनी संघर्ष की घटनाएं आम हो गई हैं। इन सबके बीच बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि देश की राजनीतिक अस्थिरता का संकट कैसे खत्म हो। वेनेजुएला के इस संकट के पीछे विकासशील देशों में संचालित लोकतांत्रिक परंपराओं की वह मान्यता भी काफी हद तक जिम्मेदार है जहां करिश्माई नेतृत्व को संपूर्ण सत्ता सौंप कर आम जनता खुशियां ढूंढ़ती है और राजनीतिक सत्ता पर जनता का यह अतिविश्वास अंतत: आत्मघाती बन जाता है।

1998 में देश के राष्ट्रपति बने ह्यूगो शावेज पर इस लोकतांत्रिक देश का मसीहा बनने की धुन सवार थी। उन्होंने लंबे समय तक देश की सत्ता पर काबिज रहने के लिए लोकलुभावन नीतियों का सहारा लिया। शावेज 1998 से लगातार डेढ़ दशक तक राष्ट्रपति रहे। जनता को सुख, शांति, वैभव और आराम की जिंदगी के सपने दिखा कर वे सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करते चले गए। दूसरी ओर अन्य संवैधानिक निकायों को कमजोर करके सत्ता पर एकाधिकार कायम करने के लिए जनता को मुफ्त में सुविधाएं दी गर्इं और ऐसी योजनाओं को बड़े पैमाने पर लागू किया गया।

लोगों को आधुनिक जीवन शैली में जीने के लिए पैसे दिए गए। इन सबसे आम जनमानस का ह्यूगो शावेज पर विश्वास बढ़ता गया। जनता का भरोसा जीत कर शावेज ने राजनीतिक सत्ता का इस प्रकार दोहन किया कि इससे संवैधानिक संस्थान राष्ट्रपति की कठपुतली बन कर रह गए। वेनेजुएला के लोग राजनीतिक सिद्धांत की इस सीख को नजरअंदाज कर गए कि राजनीतिक प्रभुत्व सदैव आर्थिक प्रभुत्व पर आधारित होता है और राजनीतिक करिश्माई सत्ता को संप्रभु बना देना राष्ट्र के भावी भविष्य को संकट में डाल सकता है। शावेज ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के सारे अधिकारों को अपने अधीन कर लिया। उनकी लोकप्रियता के आगे विपक्ष नाकाम रहा और उसके विरोध का कोई असर नहीं हुआ।

लोकतंत्र में करिश्माई सत्ता लोकप्रिय होती है, किंतु यह स्थिति आदर्श नहीं मानी जाती। मजबूत लोकतंत्र के लिए शासन व्यवस्था के सभी निकायों और विपक्ष का मजबूत होना जरूरी है। करिश्माई सत्ता के बारे में यह विश्वास किया जाता है कि कोई एक दल लोकतंत्र पर हावी हो जाता है और वह प्रतिस्पर्धी दलों को उभरने नहीं देता। यह दल करिश्माई नेतृत्व के बल पर लोगों के दिलों में जगह बना लेता है। इसके बाद वह देश को आधुनिकीकरण और विकास की दिशा में ले जाने का दावा करता है और इस तरह अपनी सत्ता की वैधता का आधार ढूंढ़ लेता है। वेनेजुएला में यही सब देखा गया और अब तेल की दुनिया का अग्रणी यह देश राजनीतिक अस्थिरता और बदहाली से बुरी तरह जूझ रहा है।

सन 2013 में शावेज का निधन हो गया। उनके सबसे करीबी निकोलस मादुरो देश के नए राष्ट्रपति बने। लेकिन उनके लिए चुनौतियां कुछ अलग प्रकार की थीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई और इसका गंभीर असर पहले से संकट से जूझ रही वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। मादुरो तब चाहते तो अमेरिका से रिश्तों को बेहतर कर अर्थव्यवस्था को संकट से उबार सकते थे, लेकिन उन्होंने शावेज की नीतियों को ही अपनाया और अमेरिकी विरोध जारी रखा। अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करते हुए मादुरो की नजर रूस और चीन पर टिकी थी। ये दोनों देश लातिन अमेरिका में अपना कूटनीतिक और सामरिक महत्त्व बनाए रखने के लिए वेनेजुएला को मदद देने आगे भी आए।

इन सबके बाद भी 2015 में वेनेजुएला में महंगाई दर एक सौ अस्सी फीसद तक बढ़ गई थी। मादुरो ने तब भी कोई सबक न लेते हुए अर्थव्यवस्था के लिए बेहद असंतुलनकारी कदम उठाए। 2016 में नोटबंदी की घोषणा करके उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। इससे आम जनजीवन बहुत प्रभावित हुआ और देश की अर्थ और आंतरिक व्यवस्था चरमरा गई। 2019 में देश के सामने राजनीतिक संकट और ज्यादा बढ़ गया। राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों में निकोलस मादुरो जीत तो गए, लेकिन उन पर वोटों में गड़बड़ी करने का आरोप लगा। चुनाव में मादुरो के सामने खुआन गोइदो थे। मादुरो को रूस और चीन का समर्थन हासिल है, जबकि गोइदो को अमेरिका, ब्रिटेन सहित यूरोपीय संघ का। इस समय मादुरो और गोइदो दोनों देश का राष्ट्रपति होने का दावा करते हैं। ऐसे में वेनेजुएला के राष्ट्रपति को इस समय स्पष्ट स्थिति नहीं है।

मादुरो ने शावेज की नीतियों पर चल कर देश को पूंजीवाद और साम्यवाद के द्वंद्व का केंद्र बना दिया है। पूरे देश में चीनी कंपनियों का जाल फैला है और चीन ने वेनेजुएला को कर्ज के जाल में उलझा लिया है। हालांकि चीन से वेनेजुएला के मजबूत संबंध शावेज के दौर से ही थे। शावेज देश की आर्थिक संपन्नता का उपयोग लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कर सकते थे, लेकिन उन्होंने वेनेजुएला को साम्यवाद का मजबूत स्तंभ बनाना ज्यादा जरूरी समझा। चीन और रूस जैसे साम्यवादी देशों की शह पर उन्होंने अमेरिकी कंपनियों एक्सॉन एवं कोनोको फिलिप्स को वेनेजुएला से अलविदा कहने को मजबूर कर दिया था। शावेज ने अल्पकालिक राजनीतिक हितों के लिए कोई ऐसी दीर्घकालीन नीति नहीं बनाई जिससे देश का आर्थिक ढांचा चरमराने से बचाया जा सके।

इसके साथ ही शावेज ने अपनी जनता को पंगु बना दिया था और वह मुफ्तखोर होकर सरकार पर निर्भर होती चली गई। इन सबसे शावेज सत्ता में तो बने रहे, लेकिन देश गहरे आर्थिक संकट में फंसता चला गया। इस समय वेनेजुएला की सरकार हजार मूल्य के नोटों से आगे बढ़ कर लाखों की मुद्रा वाले नोट छाप रही है। आर्थिक संकट के साथ राष्ट्रपति मादुरो को सत्ता से बेदखल करने के लिए गोइदो देशभर में आंदोलन चला रहे हैं।

राष्ट्रपति मादुरो वेनेजुएला में साम्यवादी विचारधारा को बनाए रखने के लिए कृत संकल्प नजर आ रहे हैं और यह स्थिति इस देश को अस्थिरता की ओर धकेल रही है। जर्मन वैज्ञानिक कार्ल मैन्हाइम ने अपनी किताब ‘आइडियोलॉजी एंड यूटोपिया’ में विचारधारा और कल्पनालोक में अंतर स्पष्ट करते हुए लिखा है कि विचारधारा मिथ्या चेतना को व्यक्त करती है और उसका ध्येय प्रचलित व्यवस्था को बनाए रखना है, जबकि कल्पनालोक परिवर्तन की शक्तियों पर बल देता है। इस समय वेनेजुएला यदि अपनी प्रचलित विचारधारा के साथ चला, तो वह आर्थिक और राजनीतिक संकट से उभर नहीं पाएगा।



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