jansatta-editorial-page-article-and-comment-on-Invisible barriers to gender equality-लैंगिक समानता की अदृश्य बाधाएं

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विकास की तमाम परिभाषाएं आर्थिक विकास के इर्द-गिर्द ही बुनी जाती हैं। पर क्या यह संभव है कि जब दुनिया की आधी आबादी हाशिए पर खड़ी हो, तो विकास का वास्तविक स्वरूप आकार ले सकेगा। हालांकि बीते दशकों में लैंगिक समानता के लिए विश्व भर की सरकारों ने अनेक नीतियां बनाई हैं, पर उनसे अपेक्षित परिणाम नहीं निकल पाए हैं। किसी भी सामाजिक समस्या का हल मात्र कानून बना देने से प्राप्त हो जाता, तो शायद आज दुनिया भर में समानता का प्रश्न खड़ा ही नहीं होता।

यह एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है कि क्यों आज भी लैंगिक असमानता अपनी जड़ें इतनी गहरी किए हुए है? स्पष्ट है कि यह सत्ता का संघर्ष है, जिसे किसी भी स्थिति में पितृसत्तात्मक समाज छोड़ने को तैयार नहीं है। सत्ता और प्रभुत्व आर्थिक संसाधनों के नियंत्रण से ही प्राप्त होते हैं। उन संसाधनों पर महिलाओं का नियंत्रण न हो, इसके लिए हर संभव प्रयास किए जाते रहे हैं, ताकि महिलाएं स्वयं स्वीकार कर लें कि उनकी जगह घर-परिवार के दायरे तक ही सीमित है।

महिलाओं को सामाजिक नियंत्रण की तमाम शक्तियों से वंचित रखने का प्रयास समाज ही करता है। एक सामाजिक प्रक्रिया के बतौर श्रम के लैंगिक विभाजन के फलस्वरूप महिलाएं भी सामाजिक लिंग रचनाओं को अपने मन मस्तिष्क में बिठा लेती हैं या यह उनके सोच का हिस्सा बन जाती हैं, जिससे समाज के संस्थागत और वैचारिक तंत्रों के जरिए महिलाओं के श्रम और उनकी उपयोगिता का योजनाबद्ध अवमूल्यन पितृसत्ता के तंत्र को मजबूत बनाता है।

यह वैचारिक तंत्र भाषा की मजबूत पकड़ के साथ स्वयं को जोड़ कर महिलाओं को उनके मूल्यहीन होने का एहसास दिलाता रहता है। आॅक्सफोर्ड रिसर्च इन इनसाइक्लोपीडिया आॅफ कम्युनिकेशन के अनुसार भाषा समाज में लैंगिक असमानता को बढ़ाने का सबसे सशक्त माध्यम है। हाल ही में ब्रिटेन की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी ने लैंगिक असमानता के शब्दों पर रोक लगाने की पहल की है। वह उन शब्दों को व्यवहार में लाने को प्राथमिकता दे रही है, जिससे लड़का और लड़की में भेद न झलके। यूनिवर्सिटी ने कहा कि बोलचाल और आधिकारिक कामों में मैनपावर की जगह वर्कफोर्स, मैनकाइंड की जगह ह्यूमनकाइंड, मैनमेड की जगह आर्टिफिशियल जैसे शब्दों का प्रयोग हो।

भाषा न केवल व्यक्तित्व निर्माण पर गहरा प्रभाव डालती है, बल्कि मानव व्यक्तित्व के प्रकटीकरण में अहम भूमिका भी निभाती है। भाषा में लैंगिक भेदभाव सिर्फ बोलचाल तक सीमित नहीं है। विश्व के विख्यात शब्दकोश में भी इसके उदाहरण देखने को मिले हैं, जो कि लैंगिक असमानता की उस अदृश्य दीवार को दशकों से खड़ा कर रहे हैं, जिसको तोड़ना सहज नहीं है। आॅक्सफोर्ड शब्दकोश में भी महिलाओं से भेदभाव साफ दिखाई देता है।

इसमें उदाहरण देकर महिलाओं को पुरुषों के अधीन बताया गया है। बीते साल मारिया बैड्रिस जियोनावार्डी ने शब्दकोश में हो रहे महिला-पुरुष भेदभाव पर छेड़ी अपनी मुहिम में महत्त्वपूर्ण जीत तब हासिल की, जब शब्दकोश में से उन शब्दों को हटाने का निर्णय किया गया, जो महिलाओं को पुरुषों से कमतर बताते थे। मसलन, महिलाएं हमेशा से नर्स या सेक्रेटरी की भूमिका में दिखती हैं।

वहीं पुरुषों के लिए ये शब्द थे ही नहीं। बीते वर्ष यूनेस्को बेसिक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट ने भी यह दावा किया था कि स्कूली पाठ्यक्रमों में आधी आबादी को कम आंका जाता और पुरुषों की तुलना में उनकी छवि हल्की रखी जाती रही है, जैसे पुरुषों को डॉक्टर तथा महिलाओं को नर्स के रूप में दिखाया जाता है। महिलाओं को केवल भोजन, फैशन या मनोरंजन से संबंधित विषयों में दिखाना, महिलाओं को स्वैच्छिक भूमिका में और पुरुषों को वेतन वाली नौकरियों में दिखाना लैंगिक असमानता को बढ़ावा देना है।

विद्यालय वातावरण और शिक्षण व्यवहार घोषित तौर पर लैंगिक असमानता को प्रोत्साहित तो नहीं करते, पर विद्यालय में छिपी हुई लैंगिक असमानता पाठ्यक्रम का हिस्सा बन जाती है। यह पाठ्यक्रम का वह स्वरूप है, जिसके तहत स्कूली तंत्र और समाज द्वारा मान्यता, मूल्य और सूचनाएं बच्चों को प्रभावित करती हैं। विद्यालय जीवन में औसतपन और पुरुषत्व को गढ़ने वाले विद्यालय के अंदर होने वाले व्यवहारों के प्रतिरूप लैंगिकता के छिपे पाठ्यक्रम के लिए पृष्ठभूमि का कार्य करते हैं। यह प्रतिरूप एक तरह के लैंगिक विषय, कायदे गढ़ते हैं।

यह आश्चर्यचकित करने वाला तथ्य है कि जिन क्षेत्रों से सार संभाल या देखभाल जैसे कार्यों का बोध होता है, वे महिलाओं से ही जोड़ कर देखे जाते रहे हैं, वहीं जब शारीरिक बल का बोध हो, तो वहां मैन (पुरुष) शब्द का प्रयोग किया गया है। विश्व भर में कृषि का आधे से अधिक काम करने वाली महिलाओं के अस्तित्व को ही नकार दिया गया है और जहां भी किसान शब्द का प्रयोग होता है, तो वह पुरुष का ही परिचायक होता है। वहीं पुरुषों के समकक्ष शारीरिक बल का प्रयोग करते हुए सड़कों से लेकर निर्माण कार्यों के बीच लगी महिलाओं के श्रम को मूल्यहीन मानते हुए साइन बोर्ड में ‘मैन एट वर्क’ पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था को बखूबी बयान करता है।

ज्ञान, सूचना, भाषा, चित्र आदि लैंगिक भेदयुक्त हों तो बाल्यकाल से ही बालक के मस्तिष्क पर वे अमिट हो जाते हैं, क्योंकि बाल सुलभ बुद्धि बिना किसी तर्क के उन तथ्यों को आत्मसात कर लेती है और उसे न केवल स्वीकारती, बल्कि अपने जीवन में भी अंगीकार करती है। यही कारण रहा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्राथमिक शिक्षा के दिशा-निर्देशों में लैंगिक समानता की सिफारिश की।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने कहा कि लैंगिक रूढ़ियों को प्ले-स्कूल के स्तर पर ही खत्म किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे जब बड़े हों, तो वे लिंग के आधार पर पक्षपात न करें। यह भी दिशा-निर्देश दिया गया कि शिक्षकों को ऐसी भाषा से बचना चाहिए, जो किसी एक लिंग या अन्य तक सीमित हो। उन्हें तटस्थ भाषा का प्रयोग करना चाहिए। भाषा का सबसे सशक्त स्वरूप तब उभर कर आता है, जब वह चलचित्र के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करती है, इसलिए विज्ञापनों के प्रभाव को कई शोध अध्ययनों ने स्वीकार किया है, क्योंकि वे एक लंबे समय तक व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

इंग्लैंड की एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ने विज्ञापनों के लिए नए कानून बनाए हैं, जिसके अनुसार विज्ञापनों में महिलाओं या पुरुषों को समाज में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार नहीं दिखाया जा सकता, जैसा कि समाज पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर मानता चला आ रहा है कि महिलाएं घर का काम करेंगी, बच्चे देखेंगी या फिर खाना बनाएंगी। इस अथॉरिटी के अनुसार परंपरागत भूमिका में दिखाने पर लोगों की समाज में मानसिकता में बदलाव मुश्किल है और महिलाएं अपने आप को भी इसी नजरिए से देखने लगती और नई भूमिका अपनाने में हिचकते हैं।

ऐसे विज्ञापनों को देख कर बच्चे भी महिलाओं और पुरुषों की भूमिका के बारे में वही परंपरागत राय बना लेते हैं। भाषा और विज्ञापनों की दुनिया लैंगिक असमानता की वे अदृश्य बाधाएं उत्पन्न करती है, जिन पर विशेष रूप से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। लैंगिक असमानता से निपटने के लिए जरूरी है कि समाज की विचारधारा को परिवर्तित किया जाए, उन पूर्वाग्रहों को खंडित किया जाए जो स्त्री और पुरुष को दो अलग दायरों में समेटने का सिर्फ इसलिए प्रयास करते हैं, जिससे पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अस्तित्व कायम रह सके। लैंगिक समानता की जारी यात्रा को और विस्तारित करने के लिए आवश्यक है कि महिलाओं को पेशेवर के तौर पर ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक रूप से सामने लाया जाए ।



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