Jansatta Editorial page article and comment on Instability in afghanistan and strife of next government – अफगानिस्तान में शांति दूर की कौड़ी

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अफगान शांति वार्ता की शुरुआत पिछले साल सितंबर में दोहा में हुई थी। इस वार्ता के नतीजे अभी तक को उत्साहजनक नहीं रहे हैं। शांति वार्ता में शामिल पक्षों के बीच आज भी विश्वास की कमी नजर आ रही है। कोई भी पक्ष लचीला रुख नहीं दिखा रहा है। बातचीत जहां से शुरू हुई थी, लगभग वहीं पर ही है। ऐसे में वार्ता में प्रगति की कल्पना करना बेमानी है। पिछले दिनों तालिबान और अफगान सरकार के प्रतिनिधि फिर से दोहा में मिले। वार्ता शुरू हुई है। लेकिन इसका क्या नतीजा निकलेगा, यह किसी को समझ नहीं आ रहा।
अफगानिस्तान की निर्वाचित सरकार और तालिबान के बीच सबसे बड़ा विवाद सत्ता में भागीदारी को लेकर बना हुआ है।

वर्तमान में अफगानिस्तान पर शासन कर रहे राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके समर्थक किसी भी कीमत पर तालिबान का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वहीं, तालिबान भी गनी और उनके समर्थकों के नेतृत्व को नहीं मान रहा। ऐसे में अफगानिस्तान का अगला राजनीतिक-प्रशासनिक ढांचा कैसा होगा, सरकार कैसी होगी, इस पर सहमति बनने के आसार दिख नहीं रहे हैं। हालांकि इस दौरान दोनों पक्षों के सामने तीन तरह के प्रस्ताव आए। एक प्रस्ताव यह कि मौजूदा सरकार के नेतृत्व में तालिबान सत्ता में शामिल हो जाए। दूसरा प्रस्ताव यह कि तालिबान के नेतृत्व में सरकार बने, जिसमें वर्तमान सरकार के लोग शामिल हों। और, तीसरा प्रस्ताव यह कि एक अंतरिम सरकार बनाई जाए। लेकिन राष्ट्रपति अशरफ गनी इन प्रस्तावों पर राजी नहीं हुए। बताया जाता है कि गनी चुनाव के लिए राजी हैं जिसमें आम जनता वोट देकर नई सरकार चुने। हालांकि तालिबान अंतरिम सरकार के गठन के प्रस्ताव पर राजी हैं, लेकिन वह सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं है।

दोहा में जारी बातचीत को लेकर न तो तालिबान को बहुत उम्मीदें हैं, न अफगान सरकार को। बीते छह महीने में कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन सब बेनतीजा रही। बहुत से लोग इसके लिए अशरफ गनी को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं, तो एक वर्ग हल नहीं निकलने के लिए तालिबान को जिम्मेदार बता रहा है। तालिबान अफगानिस्तान में पूरी तरह से इस्लामिक व्यवस्था वाला शासन चाहता है। इसी का अफगानिस्तान में जबर्दस्त विरोध हो रहा है। तालिबान के राज में अफगान महिलाओं पर जिस तरह के जुल्म ढहाए गए और पाबंदियां थोपी गई थीं, वह देश को एक तरह से आदिम जमाने में धकेलने जैसा था। इसी महीने काबुल में लड़कियों के एक स्कूल को निशाना बना कर किए गए आत्मघाती हमले में साठ से ज्यादा लोग मारे गए थे। यह हमला तालिबान का संदेश था कि लड़कियों को स्कूल भेजना बंद किया जाए। इसलिए अफगान महिलाएं अब किसी भी कीमत पर तालिबान की सत्ता के पक्ष में नहीं हैं। अफगान शांति वार्ता में भी महिला स्वतंत्रता और अधिकारों का मुद्दा प्रमुख रूप से उठता रहा है। वहीं तालिबान के वर्चस्व के खिलाफ उज्बेक, ताजिक और हजारा जनजातियां भी पूरी तरह से एकजुट हैं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अफगानिस्तान में आत्मघाती हमलों में अचानक से तेजी आई है। तालिबान का यह आक्रामक रुख संदेह पैदा करने वाला है। वह शांतिवार्ता भी कर रहा है और साथ ही अफगानिस्तान में लगातार हमले भी कर रहा है। एक ओर वह पाकिस्तान से भी सलाह-मशविरा कर रहा है, तो दूसरी ओर ईरान व रूस के साथ भी संपर्क में है। बीते दिनों तालिबान के कुछ वरिष्ठ कमांडरों ने रणनीति बनाने के लिए पाकिस्तान में अपने कमांडरों और आइएसआइ के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। दरअसल पाकिस्तानी हुक्मरान किसी भी कीमत पर काबुल को नियंत्रित करने के इस सुनहरी मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहते। बीच-बीच में तालिबान कमांडर अपने रूसी और ईरानी संपर्कों से भी सलाह ले रहे हैं, और इसका नतीजा भी सामने आता रहा है।

अब न तो तालिबान को अमेरिका पर कोई भरोसा रह गया है, न ही अमेरिका को तालिबान पर। अमेरिकी प्रशासन तालिबान को शक की निगाह से देख रहा है। क्योंकि तालिबान अभी भी अलकायदा के संपर्क में है और उसके बड़े आतंकियों को शरण दे रहा है। जबकि तालिबान और अमेरिका के बीच हुए समझौते में यह तय हुआ था कि तालिबान अलकायदा के आंतिकयों को शरण नहीं देगा। इसके बावजूद उसामा बिन लादेन के रिश्तेदार और कुछ खतरनाक अलकायदा आतंकी तालिबान की शरण में हैं। हालांकि तालिबान के वरिष्ठ कमांडरों ने अपने लोगों को आदेश जारी कर रखा है कि वे विदेशी आतंकियों को शरण न दें। लेकिन जमीन पर इस आदेश को नहीं मान तालिबान भीतर ही भीतर नई रणनीति तैयार करने में लगा है।

दोहा में चल रही शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान का नजरिया एकदम साफ और स्पष्ट है। पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ का तर्क है कि अफगानिस्तान उसका सबसे करीबी पड़ोसी है, इसलिए वह आर्थिक, राजनीतिक रुप से महत्त्वपूर्ण है। चूंकि अफगानिस्तान की सबसे मजबूत जनजाति पश्तूनों का पाकिस्तान में रहने वाले पश्तूनों के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता है, इसलिए पाकिस्तान किसी भी कीमत पर काबुल में अपने हितों की कुर्बानी नहीं दे सकता। पश्तूनों की बड़ी आबादी पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में है। ऐसे में काबुल में पाकिस्तान समर्थक सरकार का होना उसके हित में होगा।
पाकिस्तान हुक्मरान अमेरिकी कूटनीति को हमेशा शक की नजरों से देखते रहे हैं।

संभवत इसीलिए समय-समय पर वे अफगानिस्तान से जुड़े मामलों में अमेरिका को झटका भी देते रहे हैं। आइएसआइ के अधिकारियों का तर्क है कि अमेरिका का आज जो दुश्मन है, वह कल अमेरिका का दोस्त हो सकता है। अफगानिस्तान से लेकर पश्चिम एशिया तक की अमेरिकी कूटनीति पर अमेरिकी डीप स्टेट (एक समूह जो गुप्त रूप से राज्य की नीतियों को प्रभावित करता है, चाहे सत्ता पर कोई भी दल काबिज हो) कब्जा है। डेमोक्रेट हों या रिपल्बिकन, अफगानिस्तान से लेकर पश्चिम एशिया तक के मामलों में दोनों एक ही नीति अपनाते हैं। बेशक दोनों की भाषा और शब्दों का चयन बदलता रहता है, लेकिन उनकी कूटनीति में कोई फर्क नहीं होता। पाकिस्तान सत्ता प्रतिष्ठान का तर्क है कि बराक ओबामा की भाषा तो नरम थी, लेकिन उनके सहयोगियों की भाषा अफगानिस्तान को लेकर धमकाने वाली रही। वे अक्सर पाकिस्तान को धमकाने वाले अंदाज में बात करते थे।

उनका तर्क है कि अमेरिकी सत्ता इस इलाके के मुल्कों को आपस में लड़ाने के खेल में ही विश्वास करती आई है, ताकि इस पूरे क्षेत्र में अमेरिकी हित सधते रहें। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में स्थिति बदली। ट्रंप खुद ही धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल करने लगे। दरअसल, अफगानिस्तान में पाकिस्तान के अपने स्वतंत्र हित हैं। यही कारण है कि अफगानिस्तान में वह अपना खेल अमेरिकी प्रभाव से बाहर निकल कर करता है। पाकिस्तान वैसे तो अफगान शांति वार्ता में अमेरिका की मदद करने का दावा करता रहा है, लेकिन वह पूरी तरह से अमेरिका के इशारे पर चल रहा है, यह कहना गलत होगा।

निश्चित तौर पर दोहा में चल रही शांति वार्ता को लेकर अभी भी असमंजस है। बाइडेन प्रशासन क्या अफगानिस्तान की धरती से पूरी तरह से अपनी सेना हटा लेगा, इसको लेकर अभी भी सवाल उठ रहे हैं। क्या तालिबान के वर्चस्व को उत्तरी अफगानिस्तान में मजबूत उज्बेक और ताजिक स्वीकार कर लेंगे? क्या ईरान चाहेगा कि तालिबान पूरी तरह से काबुल पर कब्जा करके बैठ जाए? क्योंकि इस इलाके की भू-राजनीति में पाकिस्तान की मजबूती ईरान स्वीकार करने को आज भी तैयार नहीं है। ऐसे हालात में अफगानिस्तान में शांति अभी दूर की कौड़ी है।



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