Jansatta Editorial page article and comment on Fear, Society and Challenges – भय, समाज और चुनौतियां

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ज्योति सिडाना
कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य संबंधी संकट तो उत्पन्न किया ही है, युवाओं को मानसिक रूप से भयभीत भी कर डाला है। नौजवानों को भविष्य और अस्तित्व का संकट परेशान कर रहा है। ऐसा नहीं है कि अब से पहले समाज में ऐसी स्थिति नहीं आई, लेकिन तब लोगों में इस तरह का, खासतौर से मौत को लेकर भय नहीं था। फिर इस महामारी के आने के बाद ऐसा क्या हुआ कि लोग जीवन की सच्चाई जानते हुए भी डरने लगे हैं। इस पक्ष को हाल में देश के विभिन्न हिस्सों में घटी कुछ घटनाओं से और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।

कुछ दिन पहले इंदौर में कोरोना से पति की मौत होने पर पत्नी ने भी अस्पताल की नौवीं मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली। एक अन्य घटना में एक प्रोफेसर पति की निजी अस्पताल में कोरोना से मृत्यु होने पर उसकी प्रोफेसर पत्नी ने भी घर पर अपनी जान दे दी। कोटा शहर में एक बुजुर्ग दंपति ने अपने कोरोना संक्रमित होने पर ट्रेन के आगे कूद कर सिर्फ इसलिए जान दे दी कि कहीं उनके कारण परिवार में पोते और अन्य सदस्यों को संक्रमण न लग जाए। ऐसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि सामान्यत: परिवार में किसी एक सदस्य की मृत्यु के बाद दूसरे सदस्य उसकी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते थे, न कि उसके साथ स्वयं को भी समाप्त कर लेते थे। यह भी एक तथ्य है कि किसी निकटतम रिश्तेदार की मृत्यु हो जाने पर व्यक्ति में भावनात्मक बिखराव की स्थिति उत्पन्न होती है, परंतु वह अन्य जीवित सदस्यों को देख कर मजबूत होता है। फिर आखिर क्यों लोग इस तरह के कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं?

यह विज्ञान का युग है, जहां मनुष्य भावनाओं से ऊपर उठ कर तर्क को महत्त्व देता है। तो फिर क्यों इस संकट काल में मनुष्य तार्किकता खोता जा रहा है? आखिर क्यों वह इतना भयभीत नजर आ रहा है? संभवत: भय के कारण ही वह सही निर्णय ले पाने में अपने को असमर्थ पाने लगा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज जिस तरह का मंजर व्याप्त है, उसमें हर इंसान डर के साये में जीने को मजबूर है, क्योंकि कोई भी दर्दनाक और आकस्मिक मौत नहीं मरना चाहता। यह जानते हुए भी कि जिसने जन्म लिया है, उसका अंत भी एक न एक दिन निश्चित है, फिर प्रकृति के इस अटल सत्य से इंसान क्यों भाग रहा है, यह सवाल आज समाजशास्त्रियों के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है। इसलिए ऐसे प्रयासों पर चिंतन-मनन जरूरी हो गया है जिससे इस आपदा से दुनिया को बचाया जा सके। विज्ञान भी मानता है कि इस धरती पर केवल मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जिसके पास विकसित मस्तिष्क है और उसने अनेक आविष्कारों और नवाचारों को विकसित करके कई बार इसे सिद्ध भी किया है।

दूसरी तरफ एक विरोधाभास भी समाज में देखने को मिल रहा है। कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने लोगों के भय में भी लाभ का लोभ नहीं छोड़ा, बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि भय का बाजार खड़ा कर डाला। दवाओं, टीकों, ऑक्सीजन हर चीज की कालाबाजारी हो रही है। यहां तक कि कफन और श्मशान को भी नहीं छोड़ा। ये सब देख कर मन में यह सवाल उठता है कि संकट की इस घड़ी में भी कुछ लोग इतने स्वार्थी कैसे हो सकते हैं कि मौत का सौदा करने से भी नहीं चूक रहे। भय का बाजार लोगों को डराने के लिए कम था कि मौत का बाजार भी खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं, कोरोना मरीजों की देखभाल के लिए अस्पताल या घर में उनकी तीमारदारी के लिए कुछ लोगों को किराए पर लाया जा रहा है, क्योंकि उनके अपने खून के रिश्तों ने उनसे मुह मोड़ लिया। उन्हें इस बात का डर लगा रहा कि कहीं संक्रमित न हो जाएं और मौत का सामना न करना पड़ जाए। इसलिए चार सौ से आठ सौ रुपए रोजाना पर इस तरह के तीमारदारों की सेवा लेने से पहले किसी ने यह नहीं सोचा कि क्या इन जरूरतमंदों की जान की भी कोई कीमत है? ये भी अपनी और परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं, क्योंकि इनके पास कोई विकल्प नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग खुद को जिंदा रखने के लिए अपनों से दूर हो रहे हैं और कुछ अपनों का जीवन बचाए रखने के लिए खुद को जोखिम में डाल रहे हैं।

समाज शास्त्री अलरिच बैक ने 1986 में अपनी पुस्तक रिस्क सोसाइटी में संकेत दिया था कि भविष्य में तकनीकी विकास तेज होने के कारण पर्यावरणीय खतरे और असुरक्षा बढेगी। आज वही हो भी रहा है। बैक का तर्क था कि आधुनिकता के दौर में बड़े पैमाने पर अनजान और अदृश्य वैश्विक चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं, और ये नए युग की निमार्ता होंगी। आधुनिकता ने मानव समाज के सामने अनेक प्रकार के खतरे पैदा कर दिए हैं। ये खतरे स्थान, समय और सामाजिक भेदभाव की हमारी सभी अवधारणाओं से परे हैं। जो खतरा कल हमसे बहुत दूर था, वह आज और भविष्य में सामने खड़ा मिलेगा। आज कोरोना महामारी और इससे बने हालात इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। बैक मानते हैं कि जोखिम भरे समाज से निपटने के लिए इसकी मूल प्रेरणा शक्ति यानी भय की भावना के विषय में विचार करना होगा। उनका तर्क है कि यदि हम भय के कारणों को दूर नहीं कर सकते हैं, तो हम भय का सामना कैसे कर सकते हैं? देखा जाए तो प्राकृतिक जोखिम तो मनुष्य समाज के उद्भव के समय से ही हैं। लेकिन एटमी ताकत, रासायनिक और आणविक हथियारों का उत्पादन जैसे जोखिम नए हैं।

तकनीकी के इस युग में केवल वस्तुओं, सेवाओं और सूचनाओं का ही वैश्वीकरण नहीं हुआ है, अपितु जोखिमों और संकटों का भी वैश्वीकरण हुआ है। इसलिए बैक अपनी पुस्तक में आने वाले समय में वर्गीय असमानताओं को नकारते हैं। संभवत: यही कारण है कि इस महामारी ने अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जाति, धर्म किसी में भी कोई अंतर नहीं किया। विकसित, विकासशील, अविकसित सभी देश इसकी चपेट में है और इस संकट से लड़ रहे हैं। इस बात को कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि मौजूदा दौर वर्गहीन पूंजीवाद का है जिसमें सामाजिक असमानता तेजी से व्यक्तिगत होती जा रही है और व्यक्तिवादिता इतनी हावी हो चुकी है, जिसमें हमारी बुनियादी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रियाएं लगातार नए जोखिम पैदा करती हैं, जिसे बैक ‘निर्मित अनिश्चितता’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
आज आवश्यकता है एक सकारात्मक वातावरण बनाने की, लोगों द्वारा अपने और दूसरों में विश्वास को पुनर्जीवित करने की, यह उम्मीद जगाने कि कोई भी संकट या भय मनुष्य के हौसलों से बड़ा नहीं हो सकता। प्रकृति को हराना असंभव जरूर है, पर मनुष्य ने स्वयं जिस संकट को उत्पन्न किया है, उससे निजात पाना असंभव नहीं है। सकारात्मक सोच और भय को हरा कर ही हम संबंधों व समाज के बिखराव को रोक पाएंगे। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो इस सोच के साथ दूसरों की सहायता के लिए आगे आए हैं, परंतु एक व्यापक स्तर पर इस तरह की मुहिम होनी चाहिए।



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