Jansatta Editorial page article and comment on Child trafficking became never ending problem – नासूर बनती बाल तस्करी

51

योगेश कुमार गोयल
संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने हाल ही में अपनी एक रिपोर्ट ‘विश्व रोजगार और सामाजिक परिदृश्य: रुझान 2021’ जारी की है, जिसमें कहा गया है कि इस महामारी ने करोड़ों लोगों की नौकरियां छीन ली हैं और इस संकट से 2019 के मुकाबले 10.8 करोड़ अतिरिक्त श्रमिक अब गरीब या बेहद गरीब की श्रेणी में आ गए हैं। वर्ष 2022 तक पूरी दुनिया में बेरोजगारों की संख्या बढ़ कर साढ़े बीस करोड़ हो जाएगी, जिसके चलते गरीबों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यह महामारी नहीं आई होती तो तीन करोड़ नई नौकरियां पैदा हो सकती थीं, लेकिन महामारी के कारण अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों महिलाओं, युवाओं, बच्चों पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ा है और समाज में असमानता की खाई बढ़ी है। महामारी की वजह से अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे दो अरब श्रमिक जबर्दस्त तरीके से प्रभावित हुए हैं। विश्व बैंक भी अपने अध्ययनों में ऐसे ही तथ्य प्रकट कर चुका है।

वैश्विक मंदी के कारण असमानता की खाई और गरीबी बढ़ने का सीधा असर दुनिया भर में सबसे ज्यादा मासूम बच्चों पर पड़ता है और ऐसे में बाल तस्करी की घटनाओं में काफी वृद्धि होती है। पिछले साल और इस वर्ष हुई बंदी के दौरान ऐसी घटनाओं में काफी बढ़ोतरी देखी गई। चिंताजनक स्थिति यही है कि बाल तस्करी की समस्या देश में नासूर बन रही है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान माता-पिता की मौत हो जाने से अनाथ हुए हजारों बच्चों पर बाल तस्करी का सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है। अनाथ बच्चों को गोद लेने की आड़ में बाल तस्करी की आशंका बढ़ गई है।

विभिन्न सोशल मीडिया पोस्टों में कुछ लोग महामारी में अपने माता-पिता को खो चुके बच्चों का विवरण देते हुए उन्हें गोद लेने की गुहार लगा रहे हैं। हालांकि किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 80 और 81 के तहत ऐसे पोस्ट साझा करना अवैध है और अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रियाओं के बाहर बच्चों को गोद देने या प्राप्त करने पर रोक लगाता है। पुलिस अधिकारियों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का इस संबंध में स्पष्ट तौर पर कहना है कि यह एक प्रकार से बाल तस्करी करने वालों की चाल हो सकती है।

वैसे तो पूरी दुनिया में बालश्रम की समस्या एक गंभीर चुनौती है, बाल तस्करी की समस्या भी अब बड़ी चिंता का सबब बन रही है। आईएलओ के मुताबिक दुनिया में सोलह करोड़ से ज्यादा बच्चे बाल मजदूरी को अभिशप्त हैं, जिनमें सात करोड़ से भी ज्यादा बहुत बदतर परिस्थितियों में खतरनाक कार्य कर रहे हैं। इनमें लाखों बच्चे ऐसे हैं, जो बाल तस्करी के शिकार हैं और कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न वैश्विक मंदी के चलते यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 1997 में एशिया में गहराए आर्थिक संकट का दौर हो या 2009 की वैश्विक महामंदी का, ऐसे अवसरों पर साफतौर पर देखा गया कि किस प्रकार वैश्विक स्तर पर बाल तस्करी के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई। कोरोना महामारी के दौरान दुनिया भर में चाइल्ड पोर्नोग्राफी की मांग भी काफी बढ़ी है।

दरअसल, चाइल्ड पोर्नोग्राफी के शौकीन लोग मासूम बच्चों के साथ यौनाचार करते हैं और इसके लिए गरीब परिवारों के बच्चों की खरीद-फरोख्त होती है। बच्चों के यौन शोषण तथा बाल तस्करी के खिलाफ कार्यरत संगठन ‘इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड’ की एक रिपोर्ट में बताया जा चुका है कि भारत में महामारी के दौरान ऑनलाइन चाइल्ड पोर्नोग्राफी की मांग में जबर्दस्त वृद्धि हुई है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल बंदी के दौरान बच्चों के साथ हिंसक यौन शोषण वाली सामग्री की मांग में दो सौ फीसद तक की बढ़ोतरी हुई थी।

भारत में बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत 2007 में ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ की स्थापना की गई थी। वेश्यावृत्ति के लिए महिलाओं और बच्चों की तस्करी रोकने के लिए भारत ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) समझौता तथा ‘बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन’ पर हस्ताक्षर किए हैं। भारत ‘यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन ऑन ट्रांसनेशनल ऑर्गनाइज्ड क्राइम’ पर भी हस्ताक्षर कर चुका है, जिसमें विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की अवैध तस्करी को रोकने, कम करने और दंडित करने संबंधी उपाय शामिल हैं। इसके बावजूद बाल तस्करी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2018 की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश भर में सभी तस्करी पीड़ितों में से इक्यावन फीसद बच्चे थे, जिनमें से अस्सी फीसद से अधिक लड़कियां थीं। कोरोना महामारी के बाद से तो बाल तस्करी के मामले में हालात बदतर हो गए हैं। वैसे बाल तस्करी के मामले देश के लगभग सभी राज्यों से सामने आते रहे हैं पर पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड और असम सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में हैं, जहां घरेलू कार्यों तथा यौन शोषण हेतु महिलाओं की तथा बंधुआ मजदूरी के लिए बच्चों की तस्करी सबसे ज्यादा होती है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिसंबर, 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान मानव तस्करी के मामलों में वृद्धि के मद्देनजर विभिन्न राज्यों और मंत्रालयों को परामर्श जारी किए थे। आयोग के अनुसार महिला और बाल विकास मंत्रालय को महामारी के दौरान सत्ताईस लाख शिकायतें फोन कॉल द्वारा प्राप्त हुईं, जिनमें से 1.92 लाख मामलों में कार्रवाई की गई। इन कार्रवाईयों में करीब 32,700 मानव तस्करी के थे, इसके अलावा बाल विवाह, यौन शोषण, भावनात्मक शोषण, जबरन भीख मंगवाना और साइबर अपराधों के मामले भी शामिल थे।

सभ्य समाज के लिए सबसे शर्मनाक स्थिति यही है कि बालश्रम पर अंकुश लगाने के लिए देश में दर्जनों कानून होने के बावजूद भारत में करोड़ों बच्चे पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने की उम्र में खतरनाक काम-धंधों से जुड़े हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक लगभग पूरे देश में कालीन, दियासलाई, रत्न पॉलिश, ज्वैलरी, पीतल, कांच, बीड़ी उद्योग, हस्तशिल्प, पत्थर खुदाई, चाय बागान, बाल वेश्यावृत्ति आदि कार्यों में करोड़ों बच्चे लिप्त हैं।

एक ओर जहां श्रम कार्यों में लिप्त बच्चों का बचपन श्रम की भट्ठी में झुलस रहा है, वहीं कम उम्र में खतरनाक कार्यों में लिप्त होने के कारण ऐसे अनेक बच्चों को श्वांस रोग, टीबी, दमा, रीढ़ की हड्डी की बीमारी, नेत्र रोग, सर्दी-खांसी, सिलिकोसिस, चर्म-रोग, स्नायु संबंधी जटिलता, अत्यधिक उत्तेजना, ऐंठन, तपेदिक जैसी बीमारियां होने का खतरा रहता है। कुल बाल मजदूरों में से करीब अस्सी फीसद बच्चे गांवों से हैं और खेती-बाड़ी जैसे कार्यों से लेकर खतरनाक उद्योगों, यहां तक कि वेश्यावृत्ति जैसे शर्मनाक पेशों में भी धकेले गए हैं।

यूनीसेफ का मानना है कि विश्व भर में बच्चों को श्रम कार्य में इसलिए लगाया जाता है, ताकि उनका शोषण आसानी से किया जा सकता है, जबकि बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी कहते रहे हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त संसाधनों, सामूहिक कार्यों और वंचित बच्चों के प्रति पर्याप्त सहानुभूति से ही बालश्रम और बाल तस्करी जैसी समस्याओं को समाप्त किया जा सकता है। दरअसल, गरीबी बालश्रम का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण कारण है, जिससे लोग अपने अबोध बच्चों को भी कठिन कार्यों में धकेलने, उन्हें बेचने को विवश हो जाते हैं।

श्रम विशेषज्ञों का मानना है कि बालश्रम केवल गरीबी की देन नहीं, इसका संबंध समुचित शिक्षा के अभाव से भी है। बढ़ती जनसंख्या, निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, खाद्य असुरक्षा, सस्ता श्रम, मौजूदा कानूनों का दृढ़ता से लागू न होना आदि बालश्रम और बाल तस्करी के प्रमुख कारण हैं। इससे जहां बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, बाल अपराध बढ़ते हैं, वहीं भिक्षावृत्ति, मानव अंगों के कारोबार तथा यौन शोषण के लिए उनकी गैरकानूनी खरीद-फरोख्त होती है।



सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई


Source link