Jansatta Editorial page article and comment on American shadow on Cuba – क्यूबा पर अमेरिकी छाया

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ब्रह्मदीप अलूने
मुक्केबाजी भले आक्रामक खेल हो, लेकिन उसका नियम यह है कि इसमें एक ही वजन के दो लोग अपनी मुट्ठी का प्रयोग कर लड़ते हैं। कैरेबियाई देश क्यूबा के मुक्केबाज इस नियम से भलीभांति परिचित रहे हैं। लेकिन वहां के शासकों ने अपने से कहीं ज्यादा ताकतवर अमेरिका को चुनौती देने से कभी गुरेज नहीं किया। क्यूबा में छह दशक बाद कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च पद की कमान अब कास्त्रो परिवार से अलग नए हाथों में आई है। यह न केवल क्यूबा, बल्कि अमेरिका के लिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका लंबे समय से क्यूबा में लोकतांत्रिक और उदार शासन व्यवस्था स्थापित करने के लिए छटपटा रहा है।

फिदेल कास्त्रो के शासन और जीवनकाल में साम्यवादी प्रभाव को खत्म करने के कूटनीतिक, राजनीतिक, खुफिया और आर्थिक प्रयासों में नाकाम रहने के बाद क्यूबा में राजनीतिक नेतृत्व में हालिया बदलाव पर अमेरिका की गहरी नजर है। इसके दूरगामी परिणाम सामरिक रूप से शक्ति संतुलन की नई संभावनाओं को जन्म दे सकते हैं। क्यूबा इस समय गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है। वहां के लोग अमेरिकी प्रतिबंधों से राहत चाहते हैं। बराक ओबामा ने अपने कार्यकाल में क्यूबा से संबंध सामान्य करने कि कोशिशें भी की थीं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें नकार दिया था और ओबामा के फैसले को पलटते हुए क्यूबा को फिर से आतंकवाद प्रायोजित करने वाले देशों की सूची में डाल दिया था। अब बाइडेन की अगुवाई में बेहतर रिश्तों की आस बनती दिखाई तो दे रही है, लेकिन क्यूबा का नया नेतृत्व इसके लिए किस सीमा तक तैयार होगा, यह देखना दिलचस्प रहेगा।

दरअसल, दुनिया की सबसे बड़ी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था संयुक्त राज्य अमेरिका की दक्षिण पूर्व सीमा से महज तीन सौ छियासठ किलोमीटर दूर स्थित साम्यवादी देश क्यूबा आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से अमेरिका से बहुत छोटा है। फिदेल कास्त्रो ने जब 1959 में साम्यवादी क्रांति लाकर सत्ता संभाली थी तो अमेरिका ने क्यूबा की वामपंथी सियासत को कड़ी चुनौती के रूप में देखते हुए उससे अपने राजनयिक संबंध तोड़ डाले थे। पूंजीवाद और साम्यवाद की घोर प्रतिद्वंद्विता के युग में तत्कालीन सोवियत संघ के लिए अमेरिका पर दबाव बढ़ाने का यह बढ़िया मौका हाथ लगा था और उसने क्यूबा को अपना रणनीतिक भागीदार बना कर अमेरिका और यूरोप के लिए सुरक्षा का नया संकट भी पैदा कर दिया था। फिदेल कास्त्रो को पूंजीवादी साम्राज्यवाद से इतनी चिढ़ थी कि उन्होंने अपने देश में आर्थिक रूप से शक्तिशाली अमेरिकी व्यापारियों और संस्थाओं को उखाड़ फेंकने के लिए सभी निजी उद्योग, बैंकों और व्यापार का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इस प्रकार इन सब पर सरकारी नियंत्रण हो स्थापित हो गया। कास्त्रो की इस क्रांतिकारी पहले से क्यूबा और अमेरिका के रिश्ते इस कदर बिगड़े कि कई दशकों तक दोनों देशों में तनातनी बनी रही। अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी इसका व्यापक असर पड़ा।

साठ के दशक में अमेरिका ने क्यूबा पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा कर दबाव बढ़ाने की कोशिश तो की, लेकिन तत्कालीन सोवियत संघ कि आर्थिक मदद के बूते फिदेल कास्त्रो ने पूंजीवादी ताकतों के सामने झुकने से इनकार कर दिया। कास्त्रो ने 1962 में सोवियत यूनियन को अपने देश में परमाणु मिसाइल लगाने की इजाजत देकर तीसरे विश्व युद्द की आशंका को बढ़ा दिया था। कास्त्रो ने अफ्रीका में अपने सैनिकों को भेजा और अंगोला सहित मोजांबिक के मार्क्सवादी छापामार लड़ाकों का समर्थन कर अमेरिका के लिए लगातार मुश्किलें बढ़ाईं। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद वैश्विक स्थितियां भी बदलीं, लेकिन फिदेल कास्त्रो का रुख अमेरिका को लेकर आक्रामक बना रहा।

फिदेल कास्त्रो यह बखूबी समझते थे कि मार्क्सवाद एक विचारधारा है, राजनीतिक सिद्धांत नहीं। कास्त्रो और उनके भाई राउल कास्त्रो ने क्यूबा में छह दशक के शासनकाल में साम्यवादी विचारधारा का वैश्विक प्रदर्शन तो किया, लेकिन जनता पर उसे थोपने की वैसी कोशिशें नहीं की जिसके माओ समर्थक थे। माओ ने एक निरंतर क्रांति का सिद्धांत देते हुए कहा था कि समाजवादी क्रांति के बाद जब आर्थिक क्षेत्र में समाजवाद स्थापित कर दिया जाता है, तब भी जन साधारण के मन में पूंजीवादी संस्कार बने रहते हैं। उन्हें मिटाने के लिए क्रांतिकारियों को निरंतर क्रियाशील रहना चाहिए, अन्यथा समाजवाद की नींव मजबूत नहीं हो पाएगी और क्रांति का काम अधूरा ही रहेगा।

हाल में क्यूबा में राउल कास्त्रो ने कहा कि वे अब क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व युवा पीढ़ी को सौंप रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी क्यूबा में एकमात्र दल है और लोगों की आशाओं का केंद्र भी। वह यह बखूबी जानती है कि अमेरिका से बेहतर रिश्तों का फायदा उसकी अर्थव्यवस्था को मिलेगा। देश में पर्यटन और रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी, जिससे देश में बढ़ती गरीबी और असमानता को रोकने में बड़ी मदद मिल सकती है। हालांकि अमेरिका को लेकर क्यूबा की साम्यवादी सरकार हमेशा आशंकित रही है। सन 1961 में क्यूबा के निर्वासितों ने सीआइए के समर्थन के बूते क्यूबा के एक द्वीप पर कब्जे की कोशिश की थी। इसके साथ ही ऐसे तथ्य भी सामने आए हैं, जिनके अनुसार सीआइए ने कई मर्तबा फिदेल कास्त्रो के खात्मे की कोशिशें की थी।

यह अविश्वास क्यूबा के नए नेतृत्व को परेशान कर सकता है और ऐसे में वे कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता को मजबूत रखने के लिए चीन और रूस की ओर देख सकते हैं। चीन और रूस से क्यूबा के मजबूत रिश्ते हैं और ये दोनों देश लातिन अमेरिकी देशों से संबंध बेहतर करने का कोई भी मौका नहीं खोना चाहते। लातिन अमेरिकी देशों में गरीबी और अस्थिरता रही है। कोरोना महामारी के कारण कई देश संकट में हैं। ऐसे में बाइडेन प्रशासन की पूरी कोशिश होगी कि वह क्यूबा के बदलते राजनीतिक परिदृश्य का फायदा उठाएं और चीन और रूस जैसे देशों को वहां से दूर रखें।

यह भी संभावना है कि क्यूबा चीन का वह मॉडल अपना सकता है जिसके अनुसार देश की राजनीति पर तो कम्युनिस्ट पार्टी का ही आधिपत्य होगा, लेकिन अर्थव्यवस्था को लेकर खुलापन ला सकता है और यह मुक्त बाजार व्यवस्था की ओर जा सकती है। क्यूबा की सरकार नियंत्रित अर्थव्यवस्था में अब एक बड़ा सुधार देखा गया है। सरकार ने एलान किया है कि वह केवल कुछ क्षेत्रों से संबंधित उद्योगों का संचालन करेगी, बाकी क्षेत्रों में निजी व्यवसायों को बढ़ावा दिया जाएगा। सरकार के इस कदम से क्यूबा में होने वाली लगभग सभी आर्थिक गतिविधियों में निजी भागीदारी का रास्ता खुल जाएगा और इसका फायदा पड़ोसी देश अमेरिका को मिल सकता है। हालांकि इसे लेकर अमेरिका की ओर से अभी तक कोई महत्त्वपूर्ण घोषणा नहीं हुई है।

क्यूबा में अमेरिका का प्रभाव बढ़ने का मतलब यह होगा कि इस देश में बहुदलीय लोकतंत्र और निजी निवेश की संभावनाएं तेजी से बनने लगेंगी। साथ ही, पूंजीवाद को बढ़ावा मिलेगा। क्यूबा का मध्यवर्ग ऐसी ही नीतियां चाहता है और अब वह इसका इजहार भी करने लगा है। क्यूबा के लोगों में फिदेल कास्त्रो और राउल कास्त्रो के प्रति गहरा सम्मान रहा है। लेकिन नए नेतृत्व के प्रति भी वह बना रहेगा, इसकी संभावना कम ही है। क्यूबा का नया नेतृत्व अमेरिका से संबंध बेहतर करके अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है। बाइडेन को लंबा राजनीतिक अनुभव है और वे जानते हैं कि शक्ति संतुलन किसी विशिष्ट राजनीतिक व्यवस्था का आवश्यक लक्षण नहीं है। लोकतांत्रिक और सर्वाधिकारवादी दोनों प्रकार के राज्य इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसलिए उन्हें क्यूबा के वर्तमान साम्यवादी नेतृत्व से बात करने में कोई परेशानी नहीं होगी। बहरहाल, क्यूबा को अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर करने की ओर तेजी से आगे बढ़ना है, वहीं अमेरिका अपने पड़ोस से साम्यवाद को संतुलित करना चाहता है। ऐसे में दोनों देशों के बीच रिश्तों की नई शुरुआत की मजबूत संभावनाएं बनती दिख रही हैं।




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