internal and external problems before country keep on changing They affect the progress projects of the nation- पंथनिरपेक्षता के परिप्रेक्ष्य

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देश के समक्ष आतंरिक और बाह्य समस्याएं बदलती रहती हैं। ये राष्ट्र की प्रगति की परियोजनाओं को प्रभावित करती हैं। इस समय देश महामारी की दूसरी लहर को पहली राष्ट्रीय प्राथमिकता मान कर उससे निजात पाने की कोशिश कर रहा है। मनुष्य हर समस्या का समाधान निकालता रहा है और इस बार भी सफलता की दहलीज पर पहुंच चुका है। कोरोना के पहले अनेक महामारियों पर मनुष्य की विजय इसका सशक्त उदाहरण है। कोरोना त्रासदी का पूर्ण निर्मूलन हर नागरिक के सहयोग से ही संभव होगा, अन्यथा उसके पुन: प्रसार की संभावनाएं मनुष्य-मात्र को सदा आशंका से ग्रसित रखेंगी। पिछले कुछ महीनों में देखा गया कि कुछ तत्त्व लोगों के मन में टीके के प्रति अविश्वास फैलाने का प्रयास कर रहे थे। उपलब्धता में कमी के कारण भी टीकाकरण अपेक्षित गति प्राप्त नहीं कर सका। इस बीच संचार माध्यम अनेक प्रश्नों की विवेचना करते रहे हैं। सांप्रदायिकता का कोण लाने का प्रयास भी किया गया।

संभवत: हर बार की तरह इस बार भी मूल प्रश्न पर गहन विचार-विश्लेषण में पीछे ही रह जाएगा कि ‘भारत के संदर्भ में पंथ निरपेक्षता का सही स्वरूप और अर्थ क्या है, क्या होना चाहिए और इसे साकार स्वरूप कैसे दिया जा सकेगा’! राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति द्वारा इसे समझे बिना ‘साथ मिल कर रहना और प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होना’ सदा बाधित ही रहेगा। देश के मूर्धन्य विद्वत-वर्ग को वर्तमान स्थिति को प्राचीन भारत की उस संस्कृति के आभास में देखना होगा, जो हर प्रकार की वैचारिक, पांथिक और व्यावहारिक विविधता की स्वीकार्यता के कारण ही विश्व सभ्यताओं के विकास में अपना विशिष्ट स्थान बना सकी थी।

आज भी हर ज्ञान-चर्चा, सम्मलेन, बहस में कोई न कोई गौरव-पूर्ण ढंग से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदर्भ ले ही आता है। साथ ही लोगों के मन में यह प्रश्न उभरता है कि वैचारिकता में इतना सशक्त दर्शन व्यवहार में क्यों लचर रह जाता है? सम-सामयिक संदर्भ में इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह उभरता है कि वे लोग जो इसे उद्दृत तो करते रहते हैं, अपने स्वयं के व्यवहार ही नहीं, सामजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में भी इसको आचरण-स्तर पर बढ़ाने के लिए उत्सुक दिखाई क्यों नहीं देते हैं। वे जाति, पंथ, क्षेत्रीयता जैसा कुछ न कुछ ऐसा ढूंढ़ ही लेते हैं, जिसके आधार पर लोगों को वर्गों और समूहों में बांटा जा सके! इसमें सबसे अधिक दुरुपयोग ‘पंथ निरपेक्षता’ का हुआ है और होता जा रहा है।

वैश्विक स्तर पर राष्ट्रों के आपसी संबंध अत्यंत जटिल होते जा रहे हैं। इस समय आधिकारिक रूप से साम्राज्यवाद समाप्त हो चुका है, रंगभेद किसी भी देश में स्वीकार्य नहीं है, जाति प्रथा आधारित भेदभाव और छुआछूत की प्रथा अपराध मानी जाती है। मोटे तौर पर सभी देश प्रजातंत्र व्यवस्था के मूल सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं और संयुक्त राष्ट्र के पटल पर प्रजातंत्र के समानता, समता, समावेश की अवधारणा को स्वीकार करते हैं। कुछ अपवादों को छोड़ कर, सभी देश अपने मूल निवासियों के साथ-साथ प्रवासियों को भी अपने-अपने पंथ/मत को मानने और उससे जुड़े पूजा-पाठ व अनुष्ठान करने की अनुमति देते हैं।

मगर कुछ देश ऐसे भी हैं जो अपने यहां अन्य मतावलंबियों को काम करने की अनुमति तो देते हैं, क्योंकि उनके यहां मजदूर और कामगार नहीं हैं, मगर वहां रहते हुए प्रवासी अपने मत / पंथ से जुड़ा कोई भी अनुष्ठान नहीं कर सकते हैं, अपनी धार्मिक पुस्तकें भी नहीं रख सकते हैं। इसमें सबसे पहले सउदी अरब का नाम आता है, जिसके तेल भंडार उसकी किसी भी संभावित आलोचना से उसे बिना प्रयास के ही बचा लेते हैं। ऐसे देश भी संयुक्त राष्ट्र के सदस्य हैं, उस संस्था के ही अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में भी शामिल हैं, और अन्य देशों में मानवाधिकारों के हनन पर हवा का रुख देख कर बयान भी देते रहते हैं। ऐसे हर विरोधाभास को अब ‘सामान्य’ मान लिया गया है। जब तक ऐसी स्थितियां वैश्विक स्तर पर बनी रहेंगी, उनका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ता रहेगा। भारत को अपना देश संभालना है, साथ ही यह उत्तरदायित्व भी लेना है कि जो पश्चिमी राष्ट्र पहली बार पांथिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के साथ रहने की नव-निर्मित स्थिति को झेल नहीं पा रहे हैं, उन्हें रास्ता कैसे दिखाया जाए!

भारत में पंथनिरपेक्षता को सही स्वरूप देने के लिए इस सत्य को बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार करना होगा कि देश का विभाजन पूरी तरह सांप्रदायिक आधार पर हिंदू-मुललिम वैमनस्य को फैला कर ही हुआ था। वह विषाणु समाप्त नहीं हुआ है। वह अपने मूल रूप में तो विद्यमान है ही, छद्म रूपों में भी देश में कहीं न कहीं उभरता रहता है। उस त्रासदी के बाद भी हम सबक नहीं ले पाए! टीएस इलियट का वह प्रसिद्ध कथन याद आना ही चाहिए-‘हमारे पास अनुभव था, लेकिन हम अर्थ नहीं समझ सके।’ संविधान निमार्ताओं ने सेकुलर शब्द को भारत की सर्व-स्वीकार्य परंपरागत संस्कृति का भाग माना और इसी कारण उसे संविधान में सम्मिलित करना आवश्यक नहीं माना। 1976 में संविधान संशोधन द्वारा इसे आमुख में लाया गया, मगर ऐसा उस संसद द्वारा किया गया, जो अपनी साख खो चुकी थी। यह तो गहन अध्ययन का विषय बनना चाहिए कि इसके संविधान में शामिल होने के बाद देश में पंथनिरपेक्षता बढ़ी या घटी, या क्या सब धर्मों की समानता की स्वीकार्यता बढ़ी? ऐसे किसी भी अध्ययन और विश्लेषण के लिए अनेक तथ्यों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सदर्भों में समझना होगा।

मानव जाति की सभ्यता और प्रगति की विकास यात्रा में विविधताओं, भिन्नताओं और अहमन्यताओं से जनित ग्रंथि के कारण कितने ही युद्ध हुए, बल-पूर्वक धर्म परिवर्तन हुए और अनगिनत लोगों की जानें जाती रहीं। मनुष्य की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि वह अपने को दूसरों से श्रेष्ठ स्थापित करने में कभी देरी नहीं करता है। वह यहीं पर नहीं रुकता, वह उसे अन्य द्वारा स्वीकार कराने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। उचित-अनुचित का भेद भूल जाता है। यह समय-समय पर उजागर होता रहा है कि समस्याएं चाहे प्राकृतिक हों या मानव जनित, समाधान आपसी भाईचारे और सहयोग से ही निकलता है। विश्व शांति और सदभावना के मार्ग में ‘रिलिजन’ के दुरुपयोग से जो भयावह अवरोध खड़े कर दिए जाते रहे हैं, उनको उचित ढंग से और समुचित विषय-वस्तु से परिपूर्ण गुणवत्ता वाली शिक्षा द्वारा ही दूर किया जा सकता है।

शांति की स्थापना, उसके प्रचार-प्रसार की महती आवश्यकता हर मत, पंथ, धर्म में वर्णित है। मगर विश्व में आज भी हिंसा, युद्ध, अविश्वास, आतंकवाद, हथियारों की होड़ के पीछे सबसे बड़ा कारण ‘रिलिजन’ से जुड़ा माना जाता है, भले इसे खुल कर कहने को कूटनीति में उचित न माना जाता हो! पिछले छह-सात दशकों में जैसे-जैसे प्रजातंत्र आगे बढ़ा, राजनीतिक दलों और नेताओं की यह समझ बढ़ती गई कि पंथ वह सबसे अधिक सरलता से उपलब्ध तत्त्व है, जिसके आधार पर लोगों में वैमनस्य फैलाया और उससे राजनीतिक लाभ उठाया जा सकता है। भारत जैसे बहुधर्मी देश में इसकी पूरी संभावनाएं स्वतंत्रता के समय ही पहचान ली गईं थीं। इस समय अगर देश एक साहसपूर्ण निर्णय ले कि शिक्षा के मौलिक अधिकार अधिनियम के अंतर्गत हर बच्चे को राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ना अनिवार्य होगा। सब धर्मों, पंथों में निहित शांति, अहिंसा, धर्म और प्रेम मूल्य पारस्परिक आदर उत्पन्न करेंगे और बच्चे यह जानेंगे कि सभी धर्म समान रूप से आदरणीय हैं। हर व्यक्ति को अपने धर्म को सही ढंग से स्वीकार करना चाहिए। इस एक संविधान सम्मत निर्णय से अनेक समस्याएं सुलझाने में सहायता अवश्य मिलेगी।




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