Indo-Pak economic relations again clouded with crisis – फिर अधर में भारत-पाक आर्थिक संबंध

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विवेक ओझा
हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों की पुनर्बहाली के निर्णय को ठंडे बस्ते में डालते हुए स्पष्ट किया कि वह भारत से चीनी और कपास के आयात पर प्रतिबंध तब तक जारी रखेगा जब तक कि वह अनुच्छेद 370 संबंधी अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं करता। पाकिस्तान आज जिस प्रकार की आर्थिक बदहाली, पाबंदियां और प्रतिबंध झेल रहा है उसे देखते हुए लग रहा था कि वह अपनी आम जनता के हित में भारत के साथ संबंधों में उदार रुख अपनाएगा, लेकिन उसके भारत के साथ व्यापार न करने के निर्णय से साफ होता है कि सरकार भारत विरोधी चरमपंथियों और जेहादियों के दबाव में आ गई है।

पाकिस्तान का यह निर्णय सत्तर के दशक के जुल्फिकार अली भुट्टो की तरफ ध्यान ले जाता है, जब 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के सूत्रधार भुट्टो ने आपरेशन जिब्राल्टर और आपरेशन ग्रैंड स्लैम के विफल रहने पर भारत को आक्रांता देश घोषित करते हुए उसके साथ एक हजार वर्षों तक युद्ध करने की बात कह डाली थी। कालांतर में भारत ने दक्षिण एशिया में परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र बनाने के पाकिस्तानी प्रस्ताव को ठुकराते हुए 1974 में राजस्थान के जैसलमेर में अपना पहला परमाणु परीक्षण कर दिया था। पाकिस्तान का परमाणु हथियार कार्यक्रम 1972 में शुरू हुआ था। जुल्फिकार अली भुट्टो परमाणु हथियार संपन्न देश होने के पक्षधर थे। उन्होंने ऐलान किया था कि अगर भारत बम बनाता है, तो हमें भले घास या पत्तियां खानी पड़ें, भले हम भूखे रहें, लेकिन अपने लिए परमाणु बम बनाएंगे। आज भी इमरान खान में भुट्टो की वही मानसिकता नजर आ रही है। नागरिकों का कल्याण पाकिस्तान के लिए द्वितीयक महत्त्व का हो गया है और अपनी भारत-विरोधी मानसिकता को बनाए रखना प्राथमिक।

गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान के मध्य राजनीतिक स्तर पर विवादों के चलते आर्थिक संबंध भी मजबूत नहीं रहे हैं। द्विपक्षीय आर्थिक संबंध कामचलाऊ स्तर पर ही रहे हैं। भारत ने विश्व व्यापार संगठन के संस्थापक सदस्य के रूप में पाकिस्तान को सर्वाधिक इष्ट राष्ट्र यानी मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वर्ष 1996 में डब्ल्यूटीओ के गठन के बाद ही दे दिया था, जिसका मतलब है कि भारत अपने द्विपक्षीय व्यापार में पाकिस्तान के साथ किसी अन्य व्यापारिक साझीदार के सापेक्ष कोई भेदभाव नहीं करेगा। इस मुक्त व्यापार सिद्धांत के आधार पर भारत को भी ऐसा ही दर्जा दिया जाना जरूरी और अपेक्षित था, लेकिन पाकिस्तान ने चीन को तो यह दर्जा दिया, पर भारत को नहीं। 2011 में पाकिस्तानी मंत्रिमंडल ने फैसला किया था कि भारत को यह दर्जा दिया जाएगा, लेकिन पाकिस्तानी सरकार फिर अपने निर्णय से पलट गई।

पाकिस्तान और भारत के बीच वस्तुओं और सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार फिलहाल मात्र 2.6 अरब डॉलर है। विश्व बैंक की 2018 की रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच अगर व्यापारिक अवरोधों को समाप्त करने का प्रयास किया जाए तो यह अड़तीस अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। उल्लेखनीय है कि बाघा अटारी मार्ग से पाकिस्तान भारत के साथ एक सौ अड़तीस वस्तुओं का व्यापार करता है। इस मार्ग से कई और वस्तुओं का व्यापार संभव हो सकता है। दोनों देशों के मध्य सीमित स्तर पर व्यापार होने का मुख्य कारण व्यापार की संवेदनशील सूची का होना है। भारत ने कुल छह सौ चौदह पाकिस्तानी वस्तुओं को ऐसी सूची में रखा है, यानी वह पाकिस्तान को इन वस्तुओं के व्यापार में कोई रियायत नहीं देगा और इन सब पर नियमबद्ध ढंग से शुल्क वसूले जाएंगे। वहीं पाकिस्तान ने अपने व्यापार की संवेदनशील सूची में कुल नौ सौ छत्तीस भारतीय वस्तुओं को रखा है। इस सूची में दोनों देश जितनी कम वस्तुओं को रखेंगे, द्विपक्षीय व्यापार को उतना ही बढ़ावा मिलेगा।

भारत और पाकिस्तान के बीच सीमित मात्रा में व्यापार होने की दूसरी बड़ी वजह व्यापार की नकारात्मक सूची (नेगेटिव लिस्ट) का होना है। इस सूची में जिन वस्तुओं को रखा जाता है, उनका दूसरे देश के साथ व्यापार ही नहीं किया जाता। पाकिस्तान ने कुल बारह सौ नौ भारतीय वस्तुओं को नकारात्मक सूची में डाल रखा है। इसमें टेक्सटाइल, फार्मास्युटिकल, प्लास्टिक और आटो पार्ट्स विशेष रूप से शामिल हैं।

2013-14 में भारत ने पाकिस्तान को 2.2 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं-सेवाओं का निर्यात किया था, 2014-15 में 1.85 अरब, 2015-16 में 2.1 अरब, 2016-17 में 1.83 अरब, 2017-18 में 1.92 अरब और 2018-19 में 2.06 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार था। इन्हीं अवधि में भारत ने क्रमश: 0.426 अरब, 0.497 अरब, 0.441 अरब, 0.456 अरब, 0.488 अरब और 0.495 अरब डॉलर का आयात पाकिस्तान से किया। अगर भारत और पाकिस्तान के आर्थिक संबंध अन्य राष्ट्रों की तरह सामान्य स्थिति में रहें, तो इसका लाभ समूचे दक्षिण एशिया की आर्थिक प्रगति, क्षेत्रीय और आर्थिक एकीकरण के लिए मिल सकता है।

वहीं दूसरी तरफ श्रीलंका और पाकिस्तान की सेनाओं ने हाल में साझा युद्धाभ्यास का आयोजन किया। आतंकवाद के खिलाफ एक्स-शेक हैंड युद्धाभ्यास को श्रीलंका के उत्तरी मध्य प्रांत में सलियापुरा में आयोजित किया गया। ऐसा माना गया कि पाकिस्तान ने भारत को हिंद महासागर की सुरक्षा के प्रति असहज करने के लिए श्रीलंका के साथ नजदीकियां बढ़ानी शुरू की हैं। पाकिस्तान के उच्चायोग ने स्पष्ट किया है कि इस संयुक्त अभ्यास में पाकिस्तानी सेना के छह अधिकारियों और पैंतीस अन्य कर्मियों तथा श्रीलंका सेना के चार अधिकारियों और चालीस अन्य कर्मियों ने हिस्सा लिया। इस अभ्यास का उद्देश्य द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को मजबूत करना और आतंकवाद के खिलाफ दोनों सेनाओं के समृद्ध अनुभवों को एक-दूसरे के साथ साझा करना था।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के खिलाफ भी पाकिस्तान ने श्रीलंका का समर्थन किया। कुछ दिनों पहले ही संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका के खिलाफ लाए गए मानवाधिकार हनन के प्रस्ताव के खिलाफ पाकिस्तान ने वोट दिया था, जबकि भारत इस मतदान में अनुपस्थित रहा। पाकिस्तान ने उस अतीत को खंगालना शुरू किया है, जिसमें वह श्रीलंका को सहयोग कर उसके नजदीक आने की कोशिशें करता रहा है।

1971 के युद्ध के समय जब भारत ने पाकिस्तानी विमानों के लिए अपना हवाई मार्ग बंद कर दिया था, तब पाकिस्तानी विमान तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) की उड़ान के दौरान श्रीलंका में तेल भरने के लिए रुकते थे। हालांकि, बाद में भारत ने अपने एयरक्राफ्ट कैरियर को बंगाल की खाड़ी में तैनात कर पाकिस्तान के लिए इस हवाई रास्ते को भी बंद कर दिया था। इसके अलावा पाकिस्तान ने श्रीलंका के गृहयुद्ध में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। आतंकी संगठन लिट्टे के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान ने श्रीलंका की सेना को कई हथियारों की आपूर्ति की थी। माना जाता है कि पाकिस्तान और चीन के उच्च तकनीकी सैन्य उपकरण और खुफिया सहायता के जरिए ही श्रीलंकाई सेना लिट्टे का खात्मा करने में सफल हो पाई थी।

1970 के दशक में श्रीलंका की सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन के अति गंभीर आरोप लगे थे, जिसके कारण कई देशों ने श्रीलंका को हथियारों की आपूर्ति रोक दी थी। इस तरह पाकिस्तान आज भी श्रीलंका के सबसे प्रमुख शुभचिंतकों की सूची में आने का लगातार प्रयास कर रहा है। चूंकि 2016 में इस्लामाबाद में होने वाले सार्क सम्मेलन का बहिष्कार करने वाले देशों में श्रीलंका भी शामिल था, अत: पाकिस्तान को अपने बचाव में कई मुद्दों पर दक्षिण एशिया क्षेत्र के स्तर और वैश्विक स्तर पर भी श्रीलंका की मदद दरकार है।



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