राजधानी में भारत का इकलौता भव्य मंदिर,जहां एक साथ होते हैं 51 शक्तिपीठों के दर्शन

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– साधना, अराधना और मनोकामना का एक पावन तीर्थ है 51 शक्तिपीठ

अजय सिंह चौहान/भास्कर न्यूज़
नवरात्रि विशेष
लखनऊ। शक्ति और शाक्त परम्परा में 51 शक्ति पीठों का स्थान सर्वोपरि है।समस्त शक्तिपीठ जहां एक ओर देवी उपासकों, साधकों और श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केन्द्र हैं।

 

वहीं वे शाक्त मत सन्दर्भित नव चिंतन और अनुसंधान के संवाहक भी है,मां भगवती की सदप्रेरणा से शक्ति चिंतन, प्रवर्तन और अनुसंधान की समन्वित सार्थक त्रयी को आत्मसात करने वाले अग्रचेता पंडित स्व. रघुराज दीक्षित शक्ति सुगम एवं लोक कल्याणी साधना उपासना पद्धति के सूत्रधार व प्रणेता थे।

उन्होंने आदि गंगा गोमती प्रक्षेत्र के नन्दन वन बख़्शी का तालाब सीतापुर रोड के किनारे स्थित नवीकोट नन्दना लगभग 22 वर्ष पूर्व 51 शक्ति पीठ तीर्थ की स्थापना कर शक्ति एवं शाक्त परम्परा को नए आयाम दिए हैं।

 

उल्लेखनीय है कि आशीष सेवा यज्ञ न्यास के संस्थापक/अध्यक्ष स्व. रघुराज दीक्षित ‘मंजु’ ने बीकेटी में मन्दिर के लिए ज़मीन अपने इकलौते पुत्र आशीष दीक्षित की अकाल मृत्यु के पश्चात वर्ष 1998 में ख़रीदी थी। दो साल बाद 15 मार्च, 2000 को मन्दिर का भूमि पूजन हुआ। करीब पांच साल में मन्दिर का प्रथम तल बनकर तैयार हुआ। इस तल में प्राण प्रतिष्ठा 25 नवम्बर 2005 को सम्पन्न हुई। इसके बाद समय के साथ मन्दिर के तल पर तल बनते चले गए।

स्व.श्री दीक्षित का संकल्प देखते-देखते साक्षात रूप में दिखने लगा।बता दें कि इस मंदिर के निर्माण/विस्तार में समय-समय पर आसुरी शक्तियों ने बिघ्न बाधा खड़ी की।लेकिन स्व. दीक्षित उन आसुरी शक्तियों से निरन्तर टकराते रहे। इस लड़ाई में उनकी पत्नी पुष्पा दीक्षित ,इकलौती सुपुत्री तृप्ति तिवारी , दामाद वरद तिवारी व कुछ शुभचिंतक उनके सम्बल बने रहे।बता दें कि विश्व का इकलौता 51शक्तिपीठ मन्दिर

आज नंदनवन, सीतापुर रोड, बख़्शी का तालाब, लखनऊ में लाखों भक्तों के मन को सुकून दे रहा है। इस मन्दिर की भव्यता-दिव्यता स्व. दीक्षित की परिकल्पना, दूरदर्शिता व संकल्प शक्ति का अहसास करवाती है। पिछले बरस से मन्दिर की सारी व्यवस्था स्व. दीक्षित की इकलौती सुपुत्री तृप्ति तिवारी के कंधों पर आ गई है। वह अपने परिवार की अहम जिम्मेदारी निभाते हुए

अपनी माँ पुष्पा दीक्षित की भी देखभाल करती हैं। साथ ही, आशीष सेवा यज्ञ न्यास की सर्वेसर्वा होने के नाते न्यास के समस्त कार्यों को आगे बढ़ा रही हैं। इक्यावन शक्तिपीठ मन्दिर से जुड़ी तमाम योजनाएं अभी अधूरी हैं। तृप्ति तिवारी उन योजनाओं को अमली जामा पहनाने की जुगत में हैं। संघर्ष की प्रतिमूर्ति तृप्ति अपने पिता के सपनों को साकार करने के लिए कठिन तपस्या कर रही हैं।

स्व. दीक्षित एक दिसम्बर, 2020 को वह ब्रम्हलीन हो गए थे। उनका जन्म 25 सितम्बर, 1945 को हुआ था।बता दें कि पुराणों में वर्णित 51 शक्तिपीठ के दर्शन के लिए अब आपको देश-विदेश जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।नवीकोट नन्दना में ही आदिशक्ति का भव्य तीर्थ है, जहां आप एक साथ 51 शक्तिपीठों के दर्शन कर सकेंगे। 108 फिट उंचे इस मंदिर में शक्ति के उन तमाम स्वरूपों की साधना-अराधना का सौभाग्य प्राप्त होगा। जो अलग-अलग कामनाओं के लिए पूजी जाती हैं।

लिफ्ट से होंगे दर्शन
इक्यावन शक्तिपीठ की स्थापना आशीष सेवा यज्ञ न्यास द्वारा की गयी है। तकरीबन छह हजार वर्गफुट में बने इस दिव्य तीर्थ में श्रद्धालुओं की सुविधा का पूरा ख्याल रखा गया है। बहुमंजिली मंदिर में माता के दर्शन को लेकर बुजुर्ग लोगों को कोई दिक्कत न हो इसके लिए मंदिर में लिफ्ट की सुविधा भी है।

देश ही नहीं विदेश में भी है शक्तिपीठ

भारत की भूमि में तमाम ऐसे पावन तीर्थ हैं। जहां पर जाने या स्मरण मात्र से ही तन-मन में ऊर्जा का संचार होता है। शक्ति के उपासकों के लिए नवदुर्गा की साधना के साथ ही 51 शक्तिपीठ बहुत मायने रखते हैं। देवी पुराण में वर्णित ये 51 शक्तिपीठ वही पावन स्थान हैं।

जहां पर सती के अंग के टुकड़े, वस्त्र या आभूषण गिरे थे। मान्यता है, कि जहां पर देवी के ये अंग गिरे वह पावन शक्तिपीठ के रूप में स्थापित हुआ। शक्ति के पावन तीर्थ न सिर्फ देश में बल्कि पड़ोसी मुल्क में भी स्थित हैं। विभाजन के बाद भारत में कुल 41 शक्ति पीठ रह गए हैं, जबकि एक शक्तिपीठ पाकिस्तान में, चार बांग्लादेश में है। वहीं एक पीठ श्रीलंका में, एक तिब्बत में और तीन नेपाल में है।