increasing population dwindling resources- बढ़ती आबादी घटते संसाधन

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आबादी बढ़ने के साथ घटते संसाधन और बढ़ती बेरोजगारी देश में कई आसन्न समस्याओं को जन्म दे रही है।

अखिलेश आर्येंदु

आबादी बढ़ने के साथ घटते संसाधन और बढ़ती बेरोजगारी देश में कई आसन्न समस्याओं को जन्म दे रही है। इससे विकास की राह में बाधाएं आ रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की तमाम परिवार नियोजन योजनाओं, अभियानों और स्वयंसेवी संगठनों की सशक्त भूमिका के बावजूद भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। जाहिर है, परिवार नियोजन के सरकारी अभियान पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं।

दुनिया की बढ़ती आबादी को लेकर आ रही रिपोर्टें चौंकाने वाली हैं। संयुक्त राष्ट्र की रपट के मुताबिक 2050 तक एशिया महाद्वीप की आबादी पांच अरब हो जाएगी और सदी के अंत तक दुनिया की आबादी बारह अरब तक पहुंच जाएगी। दिलचस्प आंकड़ा तो यह है कि 2024 तक चीन और भारत की आबादी बराबर हो जाएगी और 2027 में भारत चीन को पछाड़ कर दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। पर बढ़ती आबादी को लेकर कुछ राहत दिलाने वाले आंकड़े भी हैं, जिनके मुताबिक पिछले कुछ दशकों में आबादी की रफ्तार में कुछ कमी आई है, खासकर 1971-81 के मध्य वार्षिक वृद्धि दर 2.5 फीसद थी, जो 2011-16 के दौरान घट कर 1.3 फीसद रह गई।

बेतहाशा बढ़ती आबादी का असर खाने-पीने के सामान और दवाइयों, यातायात के साधन, बिजली, और आवास जैसी जरूरी चीजों तथा संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है। इसके अलावा पर्यावरण, भुखमरी, बेरोजगारी और लोगों की सेहत पर असर को भी साफतौर पर देखा जा सकता है। गौरतलब है कि सबको बेहतर तालीम, स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार, आवास और संतुलित आहार न मिलने की बड़ी वजह बढ़ती आबादी को ही माना जा रहा है। इसके अलावा कुपोषण, गरीबी और असंतुलित विकास भी बढ़ती आबादी की देन हैं।

केंद्र और राज्य सरकारें जनता को बेहतर सेहत, तालीम, रोजगार और संतुलित आहार मुहैया कराने की बात आजादी के बाद से ही करती आई हैं, लेकिन पिछले साढ़े सात दशक में देश की आधी से ज्यादा आबादी को न तो बेहतर तालीम मिल पा रही है और न ही बेहतर सेहत।बढ़ती आबादी को लेकर कुछ दिलचस्प आंकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आए हैं। इसके मुताबिक संपत्ति और धन के आधार पर कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में भिन्नता देखने को मिलती है।

भारत में यह आंकड़ा सबसे गरीब समूह में 3.2 बच्चे प्रति महिला, मध्य समूह में 2.5 बच्चे प्रति महिला और उच्च समूह में 1.5 बच्चे प्रति महिला है। इससे पता चलता है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में आबादी की बढ़ोत्तरी ज्यादा है। आज की तारीख में भारत की आबादी में युवाओं की आबादी पच्चीस करोड़ से ऊपर है, यानी देश का हर पांचवा व्यक्ति युवा है। ऐसे में इतनी बड़ी आबादी को रोजगार, अच्छा स्वास्थ्य, संतुलित आहार, शिक्षा और आवास मुहैया कराना भारत जैसे विकासशील देश के लिए बड़ी चुनौती तो है ही।

दरअसल, आजादी के बाद से ही लोकतांत्रिक देश होने की वजह से आबादी को काबू में रखने के लिए भारत ने उन तरीकों और उपायों से परहेज किया जो चीन और कुछ दूसरे देश अपनाते रहे और अपनी आबादी पर नियंत्रण पा लिया। बेहतर जिंदगी जीने का सबका मौलिक अधिकार है, लेकिन जिससे बेहतर जिंदगी जीने में बाधा पहुंचती हो, तो उस पक्ष पर भी विचार करना जरूरी हो जाता है।

गौरतलब है कि आबादी की समस्या दूसरी तमाम समस्याओं से अलग तरह की है। यह व्यक्तिगत मामला है। मजहब, जाति, खेती और मजदूरी में सहूलियत या दूसरे कारणों से आबादी बढ़ाने की सोच को नए सिरे से समझना होगा। एक सामाजिक सर्वेक्षण के मुताबिक निम्न आय वर्ग में मजहब, जाति या काम में सहूलियत के लिए ज्यादा बच्चे पैदा करने की सोच देखी जाती है। इसलिए इनकी आय बढ़ाने के लिए सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर ईमानदार पहल की जरूरत है। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपेक्षा कम बच्चे पैदा कर उन्हें बेहतर तालीम और बेहतर सेहत देना बच्चे और परिवार दोनों के हित में है।

बढ़ती आबादी के साथ कई चिंताएं जुड़ी हैं। आबादी बढ़ने के साथ घटते संसाधन और बढ़ती बेरोजगारी देश में कई आसन्न समस्याओं को जन्म दे रही है। इससे विकास की राह में बाधाएं आ रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की तमाम परिवार नियोजन योजनाओं, अभियानों और स्वयंसेवी संगठनों की सशक्त भूमिका के बावजूद भारत में जनसंख्या वृद्धि की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। जाहिर है, परिवार नियोजन के सरकारी अभियान पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं। हालांकि आबादी बढ़ने की रफ्तार कम जरूर पड़ी है, लेकिन जन्मदर की अपेक्षा मृत्युदर कम होने के कारण महज 2001 से 2010 के दौरान 18.14 करोड़ की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।

पिछले पांच सालों में लगभग औसत जनसंख्या बढ़ने का यही हाल रहा है। यह वृद्धि पिछली जनगणना के आंकड़ों की तुलना में 17.64 फीसद अधिक है। अब भी भारत की जनसंख्या 1.3 फीसद सालाना दर से बढ़ रही है जो कि चीन के 0.6 से ढाई गुना अधिक है। विशेषज्ञों के मुताबिक पानी, जमीन, खाद्यान्न, कोयला, पेट्रोलियम पदार्थ और अन्य आवश्यक संसाधनों में लगातार कमी आ रही है। इस वक्त बड़ी समस्या पीने के पानी और शुद्ध खाद्यान्न की भी है। भारत में दालों की उपलब्धता की समस्या लगातार बनी रहती है। हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि पानी, दूध और दलहन की बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ठेका दिया जा रहा है।

इसका नतीजा यह है कि अरबों की विदेशी मुद्रा भारत से बाहर जा रही है। आज भी देश के ज्यादातर इलाकों, खासकर ग्रामीण इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पीने लायक पानी की व्यवस्था नहीं हो पाई है। इससे गांवों से लगातार पलायन हो रहा है और शहरी आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। एक आंकड़े के मुताबिक यदि गांवों से शहरों की ओर पलायन नहीं रुका तो 2030 तक शहरों की आबादी बढ़ कर चालीस फीसद से ज्यादा हो जाएगी। इससे शहरों में जनसंख्या का भार और नई-नई समस्याएं सामने आएंगी। पलायन और शहरी जीवन के स्वरूप में तेजी से होने वाले बदलावों के कारण सामाजिक ताने-बाने पर भी बुरा असर पड़ा है। अपराध बढ़ रहे हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार समाज में बढ़ रहे अपराध, बीमारियां और विघटन की तमाम समस्याएं बढ़ती जनसंख्या के नतीजे ही हैं।भारत में बढ़ती आबादी की समस्या आबादी का स्थिरीकरण न होना है। स्थिरीकरण का मतलब, साल भर में जन्म लेने वाले वालों की संख्या तकरीबन उतनी ही होनी चाहिए, जितने लोगों की मौत होती है। यानी जन्मदर और मृत्युदर में असंतुलन बड़ी समस्या बन गई है। वैज्ञानिक अनुमानों के मुताबिक अगर टीएफआर दर 2020 में 2.1 फीसद हो गई होती तो उसके पैंतीस साल बाद 2055 में आबादी का स्थिरीकरण हो जाता। लेकिन कोरोना के फैलाव की वजह से इस पर काम नहीं हो पाया। गौरतलब है कि अभी देश की कुल प्रजनन दर 2.3 है। इसे 2020 तक 2.1 तक लाने का लक्ष्य रखा गया था। इस हिसाब से एक जोड़े के केवल दो से ज्यादा बच्चे नहीं होने चाहिए। सरकार ने 2010 तक प्रजनन दर 2.1 तक लाने की योजना बनाई थी, लेकिन इस पर अमल नहीं हो पाया। इसलिए दस साल का समय और निर्धारित किया गया।

सर्वेक्षण बताते हैं कि गांवों की अपेक्षा शहरों में छोटा परिवार सुखी परिवार की समझ और जरूरत ज्यादा है। गांवों में कृषि के लिए दो-चार लोगों से काम नहीं चलता। मजदूरी बढ़ने के कारण मजूदरों से ही सारा काम कराने का मतलब घाटे की खेती करना है। इसलिए संयुक्त परिवार और बड़े परिवार की जरूरत यहां आज भी बनी हुई है। इस समस्या का जब तक माकूल हल नहीं हो जाता, गांवों में परिवार नियोजन की सफलता संदिग्ध ही लगती है। सरकार को कुछ ऐसी योजनाएं और तरीके निकालने चाहिए जिससे खेती और बागवानी पर मानव श्रम-शक्ति के कारण उस पर असर न पड़े और लोगों को परिवार नियोजन कराने के बाद परेशानी भी पैदा न हो।

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