In present era technology and human life cannot be separated from each other or say both are two sides of the same coin.-तकनीक की चुनौती और समाज

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ज्योति सिडाना

वर्तमान युग में प्रौद्योगिकी और मानव जीवन को एक दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता, या कहें कि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज जीवन का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जहां प्रौद्योगिकी का उपयोग न होता हो। प्रौद्योगिकी के बिना मनुष्य अपने को पंगु समझने लगे हैं। मानवीय ज्ञान से ही प्रौद्योगिकी का उदभव और विकास संभव हुआ है। लेकिन अब यही प्रौद्योगिकी ज्ञान पर हावी होती जा रही है। प्रौद्योगिकी के विकास के आगे ज्ञान की सीमा रेखाएं नजर आने लगी हैं। जबकि यह एक यथार्थ है कि बिना ज्ञान के प्रौद्योगिकी का विकास संभव नहीं है, इसलिए यह मान लेना कि प्रौद्योगिकी के द्वारा मानव मस्तिष्क को नियंत्रित किया जा सकता है, एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है।

अमेरिका के मशहूर उद्योगपति एलन मस्क ने अपनी कंपनी नयूरालिंक में एक ऐसी चिप (एन-1 सेंसर) बनाने का दावा किया है जिससे मनुष्य के दिमाग को नियंत्रित किया जा सकता है, मस्तिष्क के खराब हिस्सों को ठीक किया जा सकता है, संगीत सुनने के लिए भविष्य में किसी डिवाइस या स्पीकर की जरूरत नहीं पड़ेगी, संगीत मस्तिष्क में ही बजने लगेगा और मनुष्य के सुख- दु:ख जैसे मनोभावों को भी नियंत्रित किया जा सकेगा। या कहें यह चिप मनुष्य के दिमाग के लिए रिमोट कंट्रोल का काम करेगी।

यहां तक कि मनुष्य की सोच को और उसके दिमाग के डेटा को भी यह चिप आसानी से पढ़ सकेगी। इससे पूर्व कनाडा के वैज्ञानिकों ने भी इसी तरह का एक शोध किया था, जिसमें मनुष्य के मस्तिष्क में दर्ज स्मृतियों को न केवल मिटाया जा सकता है, बल्कि उसमें बदलाव करना भी संभव है। इसे आॅप्टोजेनेटिक कहा जाता है। यानी मनुष्य के दिमाग से बुरी यादों को मिटाया जा सकता है और अच्छी यादो को जोड़ा जा सकता है। सोचने वाली बात यह है कि मानव मस्तिष्क आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक अबूझ पहेली बना हुआ है।

मस्तिष्क के सभी कार्यों को अभी तक भी पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है। हालांकि इस तरह के दावे भी कम नहीं हैं कि मानव मस्तिष्क को नियंत्रित किया जा सकता है। पर सच कहें तो ऐसा करना प्रकृति के साथ खिलवाड़ ही है। यह कुछ ऐसा ही है जैसे आप आॅनलाइन अच्छी यादों का आर्डर दें और बुरी यादों को कचरे के डिब्बे में डाल दें। मानव और मशीन में अंतर को मिटाने की यह कोशिश कहीं मानव जीवन को किसी बड़े जोखिम में न डाल दे, इसलिए इस पर चिंतन किया जाना जरुरी है।

सुख या दुख सामाजिक जीवन के अभिन्न अंग हैं। किसी भी एक को समाप्त करने पर दूसरे का अस्तित्व या महत्त्व खत्म हो जाता है। सुख और दुख दोनों साथ-साथ होते हैं। यहां सवाल यह उठता है कि दुख देने वाला कौन है। व्यक्ति या व्यवस्था? दुख और पीड़ा हमेशा व्यवस्था से उत्पन्न होते हैं, न कि व्यक्ति के कारण। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में जितने भी अविष्कार हो रहे हैं, वे कहीं न कहीं मनुष्य के भीतर से सुख-दुख की अनुभूति को खत्म कर रहे हैं। हालांकि दुनियाभर में तमाम व्यवस्थाओं को यह अनुकूल भी लगने लगा है।

अनुभूति ही मनुष्य को विरोध और आंदोलन करना व व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा होना सिखाती है। यह तकनीकी विकास या पूंजीवादी विकास का सबसे विद्रूप चेहरा होगा कि मनुष्य के सामाजिक-सांस्कृतिक और भावनात्मक पक्षों को खत्म करने की सोच रहे हैं और उन्हें मशीन द्वारा नियंत्रित करने की कोशिशें कर रहे हैं।

यानी अब प्रौद्योगिकी मनुष्य के मस्तिष्क में यह तय करेगी कि कौनसे पक्ष अच्छे हैं और कौनसे बुरे? यह एक तथ्य है कि मनुष्य अपने सुख का मूल्यांकन तभी कर सकता है जब उसने दुख की अनुभूति की हो या दुख का अनुभव तब कर सकता है जब उसे सुख की अनुभूति हुई हो, अन्यथा वह इन पक्षों का मूल्यांकन नहीं कर सकता। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऐसा करके मनुष्य के भीतर विद्यमान तुलनात्मक कौशल समाप्त हो रहा है। इसे मनुष्यत्व को समाप्त करने की घातक कोशिशों के रूप में देखना गलत नहीं होगा।

भारतीय चिंतन परंपरा में सम्मिलित जैन और बौद्ध धर्म में दुख की जो विस्तृत व्याख्या की गई है, वही इस दर्शन का सार है और अब हम तकनीक के माध्यम से सुख-दुख के तुलनात्मक पक्षों को समाप्त करके समूची चिंतन परंपरा, दर्शन, मानविकी और समाज विज्ञान को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। यह मनुष्य बनाम मशीन की बहस नहीं है, बल्कि प्रौद्योगिकी बनाम समाज की बहस है। अगर प्रौद्योगिकी की यही भूमिका है तो समाज के सभी पक्षों के समक्ष गंभीर खतरे में पड़ जाएंगे। फिर कोई आंदोलन क्यों करेगा? लोकतंत्र व अधिनायकतंत्र के बीच अंतर ही नहीं कर सकेगा।

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि संसार के हर पक्ष में या हर वस्तु में द्वंद्वात्मकता (प्रत्येक अवधारणा की विपरीत या विरोधी अवधारणा अवश्य होती है) होना स्वाभाविक है। जैसे दिन के साथ रात, काले के साथ गोरा, अच्छे के साथ बुरा जुड़ा है, वैसे ही सुख के साथ दुख का होना जीवन में द्वंद्वात्मकता का परिचायक है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे खत्म नहीं किया जा सकता।

वैज्ञानिकों का यह दावा करना कि दिमाग से बुरी यादों को मिटाया जा सकता है और अच्छी यादों को बढ़ाया जा सकता है, भावनाओं को नियंत्रित किया जा सकता है, इस बात को स्थापित करने की कोशिश है कि मनुष्य रोबोट बनने की ओर अग्रसर है या प्रौद्योगिकीय विस्तार ने मनुष्य को रोबोट में परिवर्तित करने की तैयारी कर ली है।

जिस तरह से रोबोट पर रोबोट बनाने वाली कंपनी का नियंत्रण होता है, उसी तरह चिप निमार्ता और विक्रेता मनुष्य को नियंत्रित करने लगेंगे। हमारी भावनाओं को या सुख की व्याख्या करने का आधार कुछ हाथों तक विशेष रूप से उद्योगपतियों के हाथों में सीमित हो जाएगा। यह पूंजीवाद का एक नया चेहरा होगा जिसके कारण लोग शोषण को भी सहज ही स्वीकार कर लेंगे। यह भी एक तथ्य है कि इससे अपराध, विचार, सत्कर्म इत्यादि की व्याख्या बदल जाएगी। जब रोबोट ही मानव समाज को नियंत्रित करने लगेंगे तो फिर मानव समाज की मूल अवधारणा पर सवाल खड़ा हो जाएगा।

विज्ञान और तकनीक के अविष्कार मानव कल्याण के बोध के साथ होने चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि आज तार्किक मानव (रेशनल मैन) को प्रौद्योगिकीय मानव (टेक्नोलॉजिकल मैन) में बदलने की तैयारी की जा रही है। इसे शोध ज्ञान की समाप्ति के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है, क्योंकि अगर मशीन ज्ञान पर नियंत्रण करेगी तो यह ज्ञान के युग की समाप्ति होगी और फिर प्रौद्योगिकी के विकास के लिए कौन-सा ज्ञान सहायक होगा? प्रौद्योगिकी के विकास के लिए भी तो ज्ञान की जरूरत होती है। ज्ञान तभी बढ़ता है जब अंतर्विरोध होते हैं।

यह एक विरोधाभास ही है कि हम मनुष्य के मस्तिष्क को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, पर बाढ़, सूखा, हिमनदों के टूटने, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं को नहीं रोक पा रहे हैं। अतिसूक्ष्म विषाणु के प्रकोप को भी रोक पाने में समर्थ नहीं हैं। इसलिए मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्राकृतिक आपदाओं के समय विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्यों काम नहीं आती। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग मानवता की समाप्ति के लिए करने के बजाय उसे बचाने या विकसित करने के लिए किया जाए तो ज्ञान का सही उपयोग संभव होगा।



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