In most countries water shortage crisis is at its peak today Recently the United Nations has raised concerns about the safety of old dams in the world-पुराने पड़ते बांधों के जोखिम

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सुविज्ञा जैन

ज्यादातर देशों में पानी की कमी का संकट आज चरम पर है। हाल में संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया में पुराने पड़ चुके बांधों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। दरअसल एक सर्वेक्षण में पता चला है कि दुनिया में हजारों बड़े बांधों की उम्र पूरी हो चुकी है। आमतौर पर बांधों को पचास से सौ साल के लिए बनाया जाता है। इस समय बहुत से बांध ऐसे हैं जो तय जीवन अवधि के मापदंड तक या तो पहुंच रहे हैं या फिर उसे पार कर चुके हैं।

भारत भी उन देशों में शामिल हैं जहां बूढ़े हो चुके बांधों की संख्या कम नहीं है। जर्जर होते बांधों पर संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट का नाम है- ‘एजिंग वाटर इंफ्रास्ट्रक्चर: एन इमर्जिंग ग्लोबल रिस्क’। यानी इस रिपोर्ट की चिंता बांधों की सुरक्षा को लेकर है। लेकिन गौर करने की बात यह है कि अगर इन बांधों को खत्म करना पड़ा तो जल प्रबंधन के मोर्चे पर भी एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

बहरहाल, इंस्टीट्यूट फॉर वाटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ के जरिए जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2050 तक ज्यादातर वैश्विक आबादी बड़े बांधों के निचले इलाकों में रह रही होगी। इनमें से ज्यादातर बड़े बांध अपनी तय उम्र पूरी कर चुके हैं। जाहिर है, इन बांधों से हादसे के अंदेशे सिर पर सवार हैं। मामला सिर्फ सौ-पचास बांधों का नहीं है। पूरी दुनिया में बने कुल अट्ठावन हजार सात सौ बड़े बंधों में से ज्यादातर बांध सन 1930 से 1970 के बीच बने हैं।

बनाए जाते समय इनकी उम्र पचास से सौ साल तक ही रखी गई थी। पचास साल बाद कंक्रीट का बना बड़ा बांध जीर्ण होना शुरू हो जाता है। आज दुनिया के कुल बांधों के पचपन फीसद बांध सिर्फ चार एशियाई देशों में ही हैं। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया में बने इन बांधों में ज्यादातर बांध पचास साल पूरे करने के करीब पहुंच चुके हैं। अकेले चीन में ही इस समय तेईस हजार आठ सौ इकतालीस बड़े बांध हैं जो पूरी दुनिया में बने बांधों के चालीस फीसद हैं।

कालातीत होते बांधों पर संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट भारत के लिए ज्यादा महत्त्व रखती है, क्योंकि हम अपनी जरूरत के मुताबिक जल भंडारण की व्यवस्था अभी तक बना नहीं पाए हैं। हमारी मौजूदा स्थिति यह है कि हर साल वर्षा और हिमपात के जरिए प्रकृति से मिलने वाले चार हजार अरब घनमीटर पानी में से हम सिर्फ दो सौ सत्तावन अरब घनमीटर ही भंडारित कर पाते हैं और इस सीमित जल को जिन बांधों में भंडारित किया जा रहा है, वे ज्यादातर बांध या तो अपनी उम्र पार कर चुके हैं या जल्द ही पार करने वाले हैं। यानी हमारे ऊपर बांधों की सुरक्षा का जो खतरा तो है ही, उससे भी बड़ा संकट अपनी एक सौ अड़तीस करोड़ की आबादी के लिए पानी का इंतजाम करने का भी है।

रिपोर्ट में चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि भारत में इस समय चार हजार चार सौ सात बड़े बांधों में एक हजार एक सौ पंद्रह बांध 2025 तक पचास साल की उम्र पार कर चुके होंगे। इनमें से कुछ तो सौ साल की उम्र भी पार कर रहे होंगे। इसी के साथ 2050 तक चार हजार दो सौ पचास बड़े बांध पचास साल का आंकड़ा छू रहे होंगे। इन बांधों की मरम्मत की ओर इशारा करते हुए रिपोर्ट में ऐसे सभी बांधों की जांच और निरीक्षण का सुझाव भी दिया गया है। बांधों की आयु पूरी होने पर खतरों का बढ़ना स्वाभाविक है। वक्त के साथ हर संरचना कमजोर होती ही है।

जैसे-जैसे समय गुजरता है, उनकी देखरेख का काम और खर्च दोनों बढ़ने लगते हैं। इसी के साथ बांधों की उपयोग क्षमता में भी कमी आती है। मसलन हर बांध में एक निश्चित मात्रा में जल हमेशा भरा ही रहता है, जिसे कि डेड स्टोरेज कहते हैं। इसका इस्तेमाल सिंचाई के लिए नहीं हो सकता। बांध बनाते समय इसे इसलिए बनाया जाता है क्योंकि वक्त के साथ बांध में गाद मिट्टी जमा होती जाती है। यह गाद बांध की क्षमता को घटा न सके और उसे जल्द बेकार न बना सके। इसीलिए एक समय के बाद ऐसे उम्रदराज बांधों के नियमित निरीक्षण, मरम्मत और गाद मिट्टी निकालने का काम बेहद खर्चीला बन जाता है। इन आर्थिक कारणों से ही कई बार बांध प्रबंधन के कामों में कोताही हो जाती है। सन 2010 में हुए एक शोध सर्वेक्षण के मुताबिक दुनिया में ज्यादातर बांध हादसे ऐसे हुए जिन्हें नियमित निगरानी और प्रबंधन से रोका जा सकता था।

पिछले कुछ दशकों में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने उम्रदराज बांधों पर नया संकट खड़ा कर दिया है। मौसम की बेतरतीब चाल की वजह से भारत को हर साल भीषण बाढ़ की तबाही झेलनी पड़ती है। इसीलिए कुछ सालों से बांध प्रबंधन पर सवाल भी खड़े होने लगे हैं। कई बार मौसम विभाग के अनुमान गड़बड़ाने से बांधों में पानी का नियमन करने में भी मुश्किल आती है। देखा यह भी जाता है कि बारिश का ज्यादा पानी जमा करने के लालच में सही समय पर पानी निकालने से प्रबंधक चूक जाते हैं और फिर एकदम से ज्यादा बारिश होने से बांध अचानक खतरे के निशान तक भर जाते हैं और बाढ़ आ जाती है।

इस तरह की बाढ़ पुराने पड़ रहे बांधों के लिए बेहद खतरनाक मानी जाती है। प्रकृति के इन प्रहारों से बांधों को होने वाले नुकसान साल दर साल बढते जा रहे हैं। इन्हीं कुछ कारणों से संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में अपनी समयावधि पूरी कर चुके बांधों को खत्म करने का सुझाव भी दिया गया है। हालांकि किसी बांध को खत्म करना खासा बड़ा काम है। पूरे विश्व में इक्का-दुक्का मामला छोड़ दें तो बड़े बांधों को खत्म करने के ज्यादा उदाहरण हैं नहीं। दरअसल यह काम इतना जटिल है कि छोटे बांध तक को खत्म करने में कई-कई साल लग जाते हैं। बांध को खत्म करने में विशेषज्ञों का निरंतर निर्देशन और आमजन की भागीदारी बेहद जरूरी मानी जाती है। फिर यह काम खासा खर्चीला भी है। लेकिन जर्जर हो रहे बांधों को इस्तेमाल करते रहना खतरनाक तो है ही, साथ ही घाटे का सौदा भी है।

पुराने बांधों को खत्म करने के खिलाफ एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अगर इन बांधों को हटाया गया तो फौरन ही नए बांधों की जरुरत पड़ेगी। इस बात को इस तरह से भी कहा जा सकता है कि पहले नए बांध बना लिए जाएं, तभी पुराने हटाए जाएं। लेकिन रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे विश्व में पिछले चार दशकों में नए बांध बनने की रफ्तार में भारी कमी आई है। भारत की ही बात करें तो बांध निर्माण बेहद खचीर्ला काम होने की वजह से कोई सरकार इस ओर ज्यादा जोर नहीं लगाती। जहां तक नए बांधों की परियोजनाओं की बात है तो दो साल पुरानी एक रिपोर्ट बताती है कि करीब साढ़े चार सौ बांध ऐसे हैं जिनका निर्माण पिछले एक दशक में शुरू हुआ था, लेकिन इनकी आज की स्थिति की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

बहरहाल बांधों के मामले में कितनी भी झंझटें हों, लेकिन यह सबसे पहली जरूरत पानी से जुड़ा मामला है। लिहाजा इसका कोई विकल्प है नहीं। वैसे भी आजादी के बाद से अब तक पानी के मामले में निश्चिंत रहने की गुंजाइश इन्हीं बांधों से बनी रही है। अगर ये बांध अपनी उम्र गुजार चुके हैं तो अब नए बांधों के अलावा कोई विकल्प सामने है नहीं।



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