If parents are depressed after pregnancy and childbirth, then children are at higher risk of mental problems when they are young. | गर्भावस्था और प्रसव के बाद माता-पिता अवसाद में हैं तो बच्चों के युवा होने पर उन्हें मानसिक परेशानियों का जोखिम ज्यादा

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लंदन29 मिनट पहले

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ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने कहा- माता-पिता अपनी मानसिक सेहत पर पर्याप्त ध्यान दें।

जो महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अवसाद में रहती हैं, उनके बच्चों की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है। बड़े होने पर इन बच्चों में अवसाद का जोखिम उनके समकक्षों की तुलना में ज्यादा होता है। ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने एक स्टडी के आधार पर ये दावा किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रसव के बाद महिला को अवसाद होता है तो बच्चों में यह जोखिम और भी बढ़ जाता है। स्टडी के जरिए यह बताने की कोशिश की गई है कि गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के बाद भी माता-पिता को अपनी मानसिक सेहत पर ध्यान देना कितना जरूरी है।

14 साल तक चली इस स्टडी के दौरान 5 हजार से ज्यादा बच्चों की उम्र 24 साल होने तक मानसिक सेहत की नियमित ट्रैकिंग की गई। इससे पता चला कि जिन बच्चों की मांओं को प्रसव के बाद अवसाद का सामना करना पड़ा, किशोरावस्था में उनके बच्चों के अवसाद की स्थिति और बदतर हुई। इसकी तुलना में जिन महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान मानसिक परेशानियां हुईं, उनके बच्चों में अवसाद का स्तर औसत था।

जिन बच्चों की मांओं में दोनों तरह के अवसाद थे, उन्हें सबसे ज्यादा मानसिक परेशानियां हुईं। मेडिकल जर्नल बीजे साइक ओपन में प्रकाशित नतीजों के मुताबिक लड़कियों पर इसका असर ज्यादा होता है। स्टडी की लेखक डॉ. प्रिया राज्यगुरु के मुताबिक पिता के अवसाद में होने का असर भी बच्चों पर होता है। लेकिन यह सिर्फ एक तरह का अवसाद है, तो बच्चों पर जोखिम कम होता है।

उन्होंने कहा कि किशोरावस्था में बच्चों की मानसिक सेहत अच्छी रहे, इसलिए माता-पिता को बच्चे के जन्म से पहले से कोशिशें करनी होंगी। रॉयल कॉलेज ऑफ साइकियाट्रिस्ट के डॉ. जोआन ब्लैक कहते हैं कि माता-पिता प्रभावित हैं तो बच्चों को भी भविष्य में मानसिक समस्याओं से जूझना होगा।

अच्छी बात यह है कि इसका उपचार संभव है, बस जरूरत जल्द मदद देने की है। रॉयल कॉलेज के ताजा अनुमान के मुताबिक कोरोना काल में 16 हजार से ज्यादा महिलाओं को प्रसव के बाद जरूरी मदद नहीं मिल पाई। उन्हें अवसाद झेलना पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है, ऐसे में यह स्टडी महत्वपूर्ण है। एनएएचएस को इससे प्राथमिकता तय करने में मदद मिलेगी।

रोजाना 2000 से ज्यादा किशोर एनएचएस मेंटल हेल्थ की मदद ले रहे

किशोरों की मानसिक सेहत किस कदर बिगड़ी है, इस बात का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि रोजाना 2 हजार से ज्यादा किशोर एनएचएस (नेशनल हेल्थ सर्विस) की मेंटल हेल्थ सर्विस की मदद ले रहे हैं। एनएचएस के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ अप्रैल से जून के बीच ही 18 साल से कम उम्र के 1.9 लाख किशोरों को एनएचएस मेंटल हेल्थ के लिए रेफर किया गया। रॉयल कॉलेज के विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरों पर पहले से ही दबाव था, कोरोना ने इसमें और बढ़ोतरी कर दी है।

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