history of mankind there have been periods after every thousand years when only one third of population is lost- खतरे में मानव जाति

19

कोरोना महामारी से दुनिया भर में मचे हाहाकार के बीच यह सवाल एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है कि क्या कभी ऐसा भी हो सकता है कि धरती से इंसानों का अस्तित्व ही खत्म हो जाए? इतिहास के पन्नों में ऐसा बहुत कुछ है जिससे इस आशंका को बल मिलता है। हालांकि अतीत में ऐसा कभी नहीं हुआ है कि धरती पर से संपूर्ण मानव जाति का खात्मा हो गया हो। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में ऐसा नहीं हो सकता। दुनिया के मशहूर वैज्ञानिक स्टीफेन हॉकिंग तो यह भविष्यवाणी कर चुके थे कि अगले सौ दो सौ वर्षों में पृथ्वी पर ऐसी घटना घट सकती है जिससे संपूर्ण मानव जाति का नामोनिशान ही मिट जाए। उनका यह भी कहना था कि मानव जाति को बचाने के लिए एक ही तरीका है कि हम जल्द से जल्द चंद्रमा और अन्य ग्रहों पर बस्तियां बसाने के प्रयास तेज करें।

आज से लगभग छब्बीस करोड़ साल पहले धरती को सामूहिक विनाश झेलना पड़ा था। इस दौरान पूरी पृथ्वी से जीव-जंतु मिट गए थे। इसी के साथ ही भूगर्भिक और बाह्य कारणों से धरती में अब तक सामूहिक विनाश की घटनाएं बढ़ कर छह हो गई हैं। अमेरिका में न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मिशेल रेम्पिनो का कहना है कि सामूहिक विनाश के कारणों की जांच के बाद ही हम यह जान पाने में कामयाब हुए हैं कि अब तक कितनी बार पृथ्वी में सामूहिक विनाश की घटनाएं हो चुकी हैं। पूर्व में हुए अध्ययनों से पता चलता है कि सामूहिक विनाश की सभी घटनाएं पर्यावरणीय उथल-पुथल का नतीजा थीं। इस दौरान बड़े पैमाने पर बाढ़ और ज्वालामुखी फटने की घटनाएं हुई। इससे लाखों किलोमीटर तक धरती में लावा फैल गया था और धरती जीव-जंतुओं से विहीन हो गई थी।

क्या सचमुच इस सदी के खत्म होते-होते इंसान का अस्तित्व इस धरती से मिट जाएगा? अब यह सवाल मानव जाति के लिए चिंता का विषय बन गया है। क्या कोई महामारी, परमाणु युद्ध, जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बौद्धिकता, जैव-इंजीनियरिंग, जनसंख्या विस्फोट अथवा कोई बड़ा आतंकी हमला पृथ्वी पर प्राणी जीवन को संकट में डाल देगा? मानव जाति के इतिहास में हर हजार साल के बाद ऐसे दौर आते रहे हैं जब एक तिहाई आबादी ही खत्म हो जाती है। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि संपूर्ण मानव जाति लुप्त हो गई हो। एक हजार साल पहले पूरी दुनिया में प्लेग की वजह से करोड़ों लोगों की मौत हो गई थी। छिहत्तर हजार साल पहले नब्बे फीसद मानव जाति ही खत्म हो गई थी। आनुवंशिकी प्रमाणों से पता चलता है कि एक समय ऐसा भी आ गया था जब धरती पर दस हजार के आसपास ही लोग बचे थे।

आज हमारे सामने सबसे बड़ा खतरा परमाणु युद्ध का है। पिछली सदी के चौथे दशक में तो अमेरिका और सोवियत संघ एक दूसरे को खत्म करने पर आमादा हो गए थे। पर तब किसी तरह से यह खतरा टल गया था। परमाणु युद्ध बिना किसी योजना के भी शुरू हो सकता है। खतरे की एक घंटी भी परमाणु युद्ध का कारण बन सकती है। 1995 में अमेरिका ने उत्तरी क्षेत्र में आकस्मिक प्रकाश के अध्ययन के लिए एक राकेट छोड़ा था। तब रूस के लोगों ने राष्ट्रपति से कहा था कि यह परमाणु युद्ध है। लेकिन रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि यह परमाणु युद्ध नहीं है। पर आज फिर दुनिया परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। दक्षिणी प्रशांत महासागर में अमेरिका और चीन की सेनाएं आमने-सामने हैं। उत्तरी कोरिया के राष्ट्रपति किम बार-बार अमेरिका को परमाणु युद्ध की धमकी देते रहते हैं। ईरान अमेरिका के बीच तनाव चरम पर चल ही रहा है।

पाकिस्तान भी भारत को बार-बार अपने परमाणु बमों की धमकी देता रहता है। अफगानिस्तान में तालिबान फिर से सत्ता कब्जाने में लगे हैं। यह भी हो सकता है कि आतंकी परमाणु हथियारों पर कब्जा कर लें और फिर दुनिया में परमाणु युद्ध शुरू हो जाए। हालांकि परमाणु युद्ध से पूरी मानव जाति को खतरा नहीं है। पर दुनिया के कई शहर नेस्तनाबूद हो सकते हैं। लेकिन इस जंग से पूरी दुनिया में धूल के विशाल गुबार बनेंगे और पर्यावरण बदल जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार धूल के ये गुबार दशकों तक बने रह सकते हैं। इससे सूरज की रोशनी धरती पर आनी बंद हो जाएगी। तब फसलें भी पैदा नहीं होंगी। मानव जाति के साथ-साथ अन्य जीव-जंतुओं का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। ऐसे में दुनिया की बहुत बड़ी आबादी खत्म हो सकती है।

लंदन विश्वविद्यालय में किए गए एक अध्ययन के अनुसार मानव जाति के सामने एक बड़ा संकट जनसंख्या विस्फोट का है। बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन संयोग नहीं है। हम दुनिया की मौजूदा आबादी का ही पेट नहीं भर पा रहे हैं। बढ़ती आबादी की वजह से भोजन का संकट खड़ा होने लगा है। खेती की जमीन सिकुड़ती जा रही है और वह बंजर जमीन में बदल रही है। ऐसे में सबके लिए खाद्यान्न कहां से आएगा, यह कोई नहीं सोच रहा। बढ़ती आबादी के साथ-साथ संसाधनों की कमी आज सबसे बड़ा संकट है।

आॅस्ट्रेलिया में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि कैसे जलवायु परिवर्तन के चलते अगले तीन दशकों में मानव सभ्यता खत्म हो सकती है। सुनने में ऐसा लगता है कि यह बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है, लेकिन इसके सच होने की संभावना कल्पना से ज्यादा भी हो सकती है। इस विचार समूह ने चेतावनी दी है कि मानव सभ्यता अगले तीन दशकों से ज्यादा नहीं बच पाएगी। इस वर्ष 2050 तक पृथ्वी का औसतन तापमान तीन डिग्री तक बढ़ जाएगा। इस शोध को समझाते हुए आॅस्ट्रेलियाई रक्षा बल के प्रमुख और रॉयल आॅस्ट्रेलियाई नेवी के एडमिरल क्रिस बैरी बताते हैं कि यह रिपोर्ट इंसान और पृथ्वी की निराशाजनक स्तिथि को दशार्ती है। यह बताती है कि मानव जीवन अब भयंकर रूप से विलुप्त होने की कगार पर है और इसकी वजह है जलवायु संकट।

जलवायु में तेजी से हो रहा बदलाव मानव अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है। ऐसा खतरा जो अब बेकाबू है। धरती पर परमाणु युद्ध के बाद मानव जीवन को दूसरा बड़ा खतरा बढ़ते वैश्विक तापमान से है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में भी चेतावनी दी गई थी कि हमारे पास धरती को बचाने के लिए बहुत ही कम समय रह गया है। अगर हमने कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए सही कदम नही उठाए तो 2050 तक इंसान भी विलुप्ति के कगार पर आ जाएंगे। हमारे पास ज्यादा वक्त नही है। सभी देशों की सरकारों को अब मिल कर इसके लिए काम करना होगा।

इस शोध से जुड़े शोधकतार्ओं ने मौजूदा स्थिति को देखते हुए अगले तीन दशक तक का एक परिदृश्य तैयार किया है। इसके मुताबिक अगले तीन दशकों में दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी और धरती के पैंतीस फीसद हिस्से को साल में बीस दिन जानलेवा गर्मी का सामना करना पड़ेगा। कृषि उत्पाद के पांचवे हिस्से में कटौती होगी। अमेजन का पारिस्थितिकीय तंत्र नष्ट हो चुका होगा। आर्कटिक जोन गर्मियों में बर्फ मुक्त हो जाया करेगा। समुद्र का जलस्तर आधे मीटर से भी ज्यादा बढ़ जाएगा। एशिया की सभी बड़ी नदियों का पानी अधिक मात्रा में सूख जाएगा। एक अरब से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ कर दूसरी जगह बसने को मजबूर हो जाएंगे। और पृथ्वी का एक तिहाई हिस्सा रेगिस्तान में तबदील हो सकता है। मानव अस्तित्व के लिए ये बड़ी चुनौतियां हैं।



सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई


Source link