गन्ना किस्मों व कृषि तकनीकी के विकास को लेकर की समूह बैठक

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भास्कर न्यूज

लखनऊ।भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान में गन्ना पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना की वार्षिक समूह बैठक का उद्घाटन गुरूवार किया गया।जलवायु स्मार्ट गन्ना किस्मों परिवर्तित जलवायु और परिवर्तनशील संसाधन के कुशल उपयोग के लिए गन्ना खेती प्रौद्योगिकियों, मित्रवत पादप सुरक्षा तकनीकों के विकास जैसे शोधयोग्य के मुद्दो पर विचार-विमर्श करने के लिए इस बैठक की गयी।

 

जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए डॉ.तिलक राज शर्मा उप महानिदेशक (फसल विज्ञान), भाकृअनुप, नई दिल्ली ने वैज्ञानिकों से वैश्विक जलवायु परिवर्तन,गिरते मृदा स्वास्थ्य,उष्णकटिबंधीय भारत में सूखे और उपोष्ण भारत में जलभराव के मुद्दों का समाधान करने और प्री-ब्रीडिंग का प्रयोग करके

 

गन्ने की यांत्रिक खेती के उपयुक्त शीघ्र परिपक्व होने वाली किस्मों को विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने वैज्ञानिकों को आक्रामक कीटों पर नजर रखने की सलाह दी ताकि भविष्य में वे किसी महामारी का कारण न बने। डॉ.शर्मा ने इस बात पर प्रकाश डाला कि गन्ने का उत्पादन बढ़ाना न केवल घरेलू मिठास की मांग को पूरा करने के लिए आवश्यक है,

 

बल्कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में चीनी का निर्यात भी करना है। उन्होंने किसानों की आय दोगुनी करने के लिए अंतःफसल और फसल विविधीकरण पर जोर दिया। डॉ.शर्मा ने कीटनाशकों के उपयोग में सालाना 10 प्रतिशत की कमी के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने के लिए जैव कीटनाशकों को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान तेज करने की सलाह दी।

बैठक सत्र की अध्यक्षता करते हुए सम्मानित अतिथि डॉ.सुशील सोलोमन, पूर्व कुलपति,चन्द्र शेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय,कानपुर ने बताया कि गन्ना चीनी का एकमात्र स्रोत नहीं है,बल्कि गुड़ और खांडसारी,सह-उत्पादन,बायोइथेनॉल,जैव-प्लास्टिक और कई विभिन्न जैव उत्पादों का भी एक उत्तम स्रोत है।

 

उन्होंने को0238 और को86032 किस्मों,कृषि प्रौद्योगिकियों,गन्ना आधारित फसल प्रणाली, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, डाइग्नोस्टिक किट और आणविक संसूचक,एकीकृत कीट प्रबंधन, मशीनीकरण के साथ-साथ उन्नत किस्मों के विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता के साथ प्रमुख कीटों और रोगों का सर्वेक्षण और

 

निगरानी पर प्रकाश डाला। पिछले पांच दशकों के दौरान अखिल भारतीय समन्वित गन्ना अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत की गई उपलब्धियों पर बधाई देते हुए डॉ. आरके सिंह सहायक महानिदेशक (वाणिज्यिक फसलें) ने बताया कि परियोजना की शुरुआत के बाद से गन्ना क्षेत्र,उत्पादन,गन्ने की उपज चीनी उत्पादन और

 

चीनी की वसूली में 2.03, 3.6, 6.7, 8.0 और 1.2 गुना वृद्धि हुई है। प्रारंभ में बैठक में उपस्थित सभी प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए डॉ.एडी पाठक निदेशक एवं परियोजना समन्वयक, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान ने परियोजना समन्वयक की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए गन्ने की सात नई चिन्हित किस्मों (वीएसआई 12121, को 13013, एमएस 13081 को 15023, कोलख 14204, कोपब 14185 और कोसे 11453 के बारे में बताया।

 

उन्होंने कहा कि गन्ने की तीन किस्में वीएसआई 12121 (मध्य-देर से) प्रायद्वीपीय क्षेत्र के लिए को 13013 (मध्य-देर से) और उत्तर पश्चिम क्षेत्र के लिए को 15023 (अगेती) को भी वाणिज्यिक खेती के लिए सीवीआरसी द्वारा जारी और अधिसूचित किया गया है।

 

डॉ.हेमप्रभा निदेशक गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर ने दी लोकप्रिय किस्मों को 0238 तथा को 86023 के योगदान पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये दोनों किस्मे राष्ट्रीय क्षेत्र के आधे से अधिक अंश को आच्छादित करती हैं। गन्ना क्षेत्र के समग्र विकास में गन्ना किस्मों के महत्व पर सभी वक्ताओं ने जोर दिया।

 

दुनिया में गन्ना क्षेत्र का 80 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रफल केवल दस किस्मों के अंतर्गत है। जिसमें दो भारतीय किस्में, को0238 और को86032 सम्मिलित हैं। बैठक में देश के विभिन्न भागों से लगभग 150 गन्ना वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का समापन डॉ. एसएन सुशील प्रभारी समन्वय प्रकोष्ठ एवं संचालन डॉ.श्वेता सिंह वैज्ञानिक (पादप रोगविज्ञान) द्वारा किया गया।