export target challenges-निर्यात लक्ष्य की चुनौतियां

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अर्थव्यवस्था में निर्यात की भूमिका को प्रभावी बनाने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा।

जयंतीलाल भंडारी

अर्थव्यवस्था में निर्यात की भूमिका को प्रभावी बनाने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा। उद्योगों के लिए बिजली की लागत में कमी और श्रम कानूनों सहित अन्य बाधाएं दूर करने की जरूरत है। यह भी जरूरी है कि सरकार यूरोपीय संघ, आॅस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात आदि देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत को जल्द अंतिम रूप दे।

पिछले कुछ समय में निर्यात बढ़ने के संकेत मिले हैं। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिहाज से यह राहत की बात है। लेकिन निर्यात के मोर्चे पर दो बड़ी चुनौतियां कायम हैं। पहली तो यही कि वित्त वर्ष 2021-22 में चार सौ अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्य हासिल करना और दूसरी, वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना। गौरतलब है कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक निर्यात में भारत की स्थिति अभी कमजोर बनी हुई है। कुल वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी दो फीसद से भी कम है।

निर्यात से संबंधित वैश्विक रिपोर्टंों में बार-बार कहा जा रहा है कि भारत के निर्यात परिदृश्य पर गुणवत्तापूर्ण और वैश्विक स्तर के घरेलू विनिर्माण की कमी बनी हुई है। परिवहन और आपूर्ति संबंधी समस्याएं भी बनी हुई हैं। केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा निर्यातकों के लिए समन्वित रूप से काम करने का अभाव है। भारतीय उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के विस्तार की समस्या है। आपात ऋण सुविधा गारंटी योजना और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के कारगर क्रियान्वयन की कमी है। निर्यात के नए व आधुनिक उत्पादों की पहचान का भी संकट बना हुआ है। इन विभिन्न निर्यात चुनौतियों के बीच देश से निर्यात को गतिशील करने की अहम जरूरत दिखाई दे रही है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल अगस्त में भारत से उत्पादों का निर्यात 33.14 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल (2020) की समान अवधि की तुलना में 45.17 फीसद अधिक है। चालू वित्त वर्ष (2021-22) में अप्रैल-अगस्त के दौरान भारत का निर्यात 163.67 अरब डॉलर रहा, जो एक साल पहले की समान अवधि की तुलना में 66.92 फीसद अधिक है और 2019 की समान अवधि की तुलना में 22.93 फीसद अधिक है। लगातार पांच महीने से निर्यात में बढ़ोतरी न सिर्फ बेहतर अर्थव्यवस्था का संकेत दे रही है, अपितु यह निर्यात में स्थिरता का भी प्रतीक हैं। पेट्रोलियम उत्पादों, इंजीनियरिंग सामान, दवा और रत्न व आभूषण क्षेत्र में मांग ज्यादा होने की वजह से निर्यात में बड़ी तेजी आई है।

गौरतलब है कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना से निर्यात में बढ़ोतरी होने लगी है। उदाहरण के लिए एक साल पहले देश आठ अरब डॉलर मूल्य के मोबाइल फोन का आयात करता था। अब तीन अरब डॉलर के मोबाइल फोन का निर्यात कर रहा है। यदि वर्तमान निर्यात परिदृश्य पर नजर डालें तो पाते हैं कि अमेरिका, यूरोप, संयुक्त अरब अमीरात सहित दुनिया के विभिन्न विकसित और विकासशील देशों को निर्यात तेजी बढ़ रहे हैं।

यह भी कोई छोटी बात नहीं है कि कोरोनाकाल में जब दुनिया के कई खाद्य निर्यातक देश महामारी के व्यवधान के कारण कृषि पदार्थों का निर्यात करने में पिछड़ गए, तब भारत ने इस अवसर का दोहन करके कृषि निर्यात बढ़ा लिया। इसमें कोई दो मत नहीं कि कोरोनाकाल में दुनिया के विभिन्न देशों में दिए गए प्रोत्साहन पैकेजों और दुनिया में बाजारों के तेजी से पटरी पर आने से विभिन्न उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं बढ़ रही हैं। अमेरिका में दिए गए विभिन्न प्रोत्साहन पैकेज उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सत्ताईस फीसद के बराबर हो गए हैं। विश्व बैंक का अनुमान है कि वर्ष 2021 में विश्व अर्थव्यवस्था 5.6 फीसद की दर से बढ़ेगी। मॉर्गन स्टेनले के मुताबिक विश्व अर्थव्यवस्था 6.4 फीसद अमेरिकी अर्थव्यवस्था 5.9 फीसद, यूरो अर्थव्यवस्था पांच फीसद और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था 5.3 फीसद की दर से बढ़ सकती है। इससे भारत से होने वाले निर्यात की गति भी बढ़ेगी।

भारत से निर्यात में तेजी आने के कई और कारण भी हैं। संक्रमण की दूसरी लहर के बीच विनिर्माण क्षेत्र को पूर्णबंदी से बाहर रखने के कारण उत्पादन में गतिरोध नहीं आया। देश में कॉरपोरेट कर की दरों को घटाया गया है। कई अहम क्षेत्रों में पीएलआइ योजनाओं ने पहली बार कच्चे माल के बजाय उत्पादन को बढ़ावा दिया है। श्रम कानूनों को सरल किया गया है। एमएसएमई की परिभाषा को सुधारा गया है ताकि कई मध्यम आकार की इकाइयों को भी एमएसएमई का लाभ मिले। इन कदमों से घरेलू उद्योग का आकार बढ़ाने में मदद मिली और निर्यात भी बढ़े। विदेशी कंपनियों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) से जुड़े नियमों को उदार बनाने से उन्हें भारत में परिचालन शुरू करने और यहां से दूसरे देशों में निर्यात बढ़ाने में मदद मिली। ढांचागत व्यवस्था में किए गए सुधार से भारत को वैश्विक मूल्य शृंखला से जुड़ने में मदद मिली और भारत में सामान बनाने वाले निर्यातकों के लिए सस्ते श्रम की तलाश में देश के दूरदराज के भागों तक पहुंचने में सरलता हुई। इससे दुनियाभर में यह धारणा भी मजबूत बनी कि भारत उत्पाद निर्यात के लिहाज से एक बढ़िया ठिकाना है।

अर्थव्यवस्था में निर्यात की भूमिका को प्रभावी बनाने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा। उद्योगों के लिए बिजली की लागत में कमी और श्रम कानूनों सहित अन्य बाधाएं दूर करने की जरूरत है। यह भी जरूरी है कि सरकार यूरोपीय संघ, आॅस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात आदि देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की बातचीत को जल्द अंतिम रूप दे। इससे देश के निर्यात में तेजी से वृद्धि होगी। यह भी जरूरी है कि निर्यात प्रतिस्पर्धा के लिए देश में नियामकीय और कारोबारी माहौल में सुधार किया जाए। जीएसटी रिफंड की गति तेज की जाए। जीएसटी का दायरा बढ़ाया जाए। साथ ही कर व्यवस्था को भी सरल व एकीकृत किया जाए। जिस तरह उत्पादों के निर्यात के लिए नई योजनाएं लागू की जा रही हैं, उसी तरह सेवा के निर्यात के लिए भी नई योजना लाई जाए जिसमें सेवा निर्यात से संबंधित वापस न किए गए करों व शुल्कों को वापस किया जाना सुनिश्चित करना हो। ऐसी योजना से देश के सेवा निर्यातकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, सेवा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे।

यह भी जरूरी है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज), निर्यातोन्मुखी इकाइयों (ईओयू), औद्योगिक नगर और ग्रामीण इलाकों में काम कर रही निर्यात इकाइयों से निर्यात बढ़ाने के विशेष प्रयत्न किए जाएं। निर्यातकों को सस्ती दरों और समय पर कर्ज दिलाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। सरकार द्वारा अन्य देशों की गैर-शुल्कीय बाधाएं, मुद्रा का उतार-चढ़ाव, सीमा शुल्क अधिकारियों से निपटने में मुश्किल और सेवा कर जैसे निर्यात वाली मुश्किलों से रणनीति पूर्वक निपटा जाना होगा। यह भी जरूरी है कि निर्यात प्रतिस्पर्धा के लिए देश में नियामकीय और कारोबारी माहौल में सुधार किया जाए। जीएसटी रिफंड की गति तेज की जाए। जीएसटी का दायरा बढ़ाया जाए। साथ ही कर व्यवस्था को भी सरल तथा एकीकृत किया जाए।

हाल में सरकार ने निर्यातकों को प्रोत्साहन देने के लिए जो दो महत्त्वपूर्ण योजनाएं घोषित की हैं, उन पर तेजी से अमल निर्यात को ऊंचाई दे सकता है। इनमें से एक योजना निर्यात की संभावना रखने वाले सूक्ष्म, छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को प्रोत्साहन देने के लिए ‘उभरते सितारे’ योजना है और दूसरी योजना रेमिशन आॅफ डयूटीज एंड टैक्सेस आॅन एक्सपोर्ट प्रोडक्टस (आरओडीटीईपी) स्कीम है। इसके तहत सरकार द्वारा आगामी तीन वर्ष तक साढ़े आठ हजार उत्पादों को तैयार करने वाले निर्यातकों को केंद्र, राज्य सरकार व स्थानीय निकायों को दिए गए कर का रिफंड दिया जाएगा। खास बात यह है कि आरओडीटीईपी के तहत जो कर छूट दी गई हैं, वे विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप हैं और इन पर कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकेगी।

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