Enforcement Directorate: Money Laundering Act: ED se aakhir rajneta itna darte kyon hain : ईडी से आखिर राजनेता इतना डरते क्यों हैं?

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हाइलाइट्स:

  • केंद्रीय जांच एजेंसी को अन्य एजेंसियों की अपेक्षा विशेष अधिकार मिले हैं
  • पूर्व मंत्री एकनाथ खडसे को ACB को क्लीन चिट, पर ED की पूछताछ
  • पुणे के चर्चित जमीन घोटाले में एसीपी ने खडसे को दी थी क्लीन चिट
  • ईडी को केस की जांच के लिए कोर्ट के आदेश की जरूरत नहीं पड़ती है

मुंबई
पुणे के चर्चित जमीन घोटाले में ऐंटि करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री एकनाथ खडसे को क्लीन चिट दी थी। खडसे के अलावा उनकी पत्नी मंदाकिनी, दामाद गिरीश चौधरी और कुछ अन्य को 2018 में ही क्लीन चिट मिली थी। वह केस कोर्ट में अर्जी देकर क्लोज कर दिया गया था। लेकिन उसी केस में ईडी ने खडसे के दामाद गिरीश चौधरी को पिछले सप्ताह गिरफ्तार किया। यही नहीं खुद खडसे से भी 9 घंटे से ज्यादा पूछताछ की। आखिर ईडी को ऐसे कौन से अधिकार मिले हुए हैं, जिसमें वह दूसरी जांच एजेंसी की क्लोजर रिपोर्ट को भी अहमियत नहीं देती। ईडी के विशेष अधिकारों पर एनबीटी को एक भरोसेमंद अधिकारी ने विस्तार से समझाया।

ईडी को जांच में कैसे मिले हैं विशेष अधिकार?
इस अधिकारी के अनुसार, जहां सीबीआई जैसी जांच एजेंसी को भी किसी केस की जांच के लिए संबंधित राज्य सरकार या कोर्ट के आदेश की जरूरत पड़ती है, पर ईडी को नहीं। इस अधिकारी का कहना है कि ईडी की जांच का दायरा मूल रूप से दो खास चीजों पर केंद्रित है। पहला, फेमा कानून के तहत केस की जांच। इसमें यदि विदेशी मुद्रा भारत में आई हो, लेकिन जिसके अकाउंट में यह रकम गई, उसने इनकम टैक्स या इसी तरह के किसी सरकार विभाग को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी हो। बॉलिवुड की एक नामचीन अभिनेत्री को इसीलिए कुछ दिनों पहले ईडी ने फेमा के तहत समन भेजा था।

मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट में जांच का अधिकार
दूसरा है प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट। एकनाथ खडसे के केस की जांच ईडी मनी लॉन्ड्रिंग के तहत ही कर रही है। मनी लॉन्ड्रिंग के तहत जांच के लिए ईडी को किसी से आदेश की जरूरत नहीं पड़ती। पुलिस या किसी भी एजेंसी ने यदि आईपीसी के सेक्शन 420 के तहत भी एफआईआर दर्ज कराई हो, तो ईडी उस एफआईआर को मंगवाकर उस आधार पर अपनी समानांतर जांच शुरू कर सकती है।

सुशांत सिंह राजपूत का केस मिसाल
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का केस सभी को पता है। पिछले साल पटना में जब सुशांत सिंह के पिता ने एफआईआर दर्ज की थी और रिया चक्रवर्ती व कुछ अन्य लोगों पर कई करोड़ रुपये के गबन का आरोप भी लगाया था, तो ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के तहत केस का इनवेस्टिगेशन शुरू कर दिया था। यह बात और है कि न तो सीबीआई उस केस की गुत्थी अभी तक सुलझा पाई और न ही ईडी को भी गबन से जुड़े आरोपों में कोई ऐविडेंस मिले। हां, ईडी की जांच का एक असर जरूर हुआ। उसकी जांच में कुछ वॉट्सऐप चैट्स सामने आए, जिनका लिंक ड्रग्स से जुड़ रहा था। ईडी ने ड्रग्स वाले वॉट्सऐप एनसीबी को ट्रांसफर कर दिए। रिया चक्रवर्ती और कई अन्य लोगों की गिरफ्तारी बाद में ड्रग्स केस में हुई।

क्या है ईडी की ECIR
एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, एनसीबी और ऐंटि नार्कोटिक्स सेल को एनडीपीएस ऐक्ट में कुछ विशेष अधिकार मिले हुए हैं, जिसमें यदि कोई अपने स्टेटमेंट में किसी और का नाम ले ले ले, तो ड्रग्स केस की जांच से जुड़ी एजेंसियां जिसका नाम लिया गया है, उसे आरोपी बना सकती हैं। इसी तरह के विशेष अधिकार ईडी के पास भी हैं। ईडी ECIR दर्ज कर सकती है। ECIR एक तरह की एफआईआर होती है, जिसका पूरा मतलब होता है कि इनफोर्समेंट केस इनफॉर्मेशन रिपोर्ट।

कई बार यह सवाल उठा कि जब किसी केस में दूसरी जांच एजेंसी ने एफआईआर में दर्ज नामों वाले लोगों को क्लीन चिट दे दी, तब उसी केस में ईडी ऐसे लोगों को आरोपी कैसे बना सकती है। एक अधिकारी ने इस संबंध में एक नामी एयरलाइंस के मालिक के केस का उदाहरण दिया। उसके खिलाफ एमआरए पुलिस स्टेशन में कई साल पहले एफआईआर दर्ज हुई। बाद में एमआरए पुलिस ने उस एयरलाइंस मालिक को उस केस में क्लीन चिट दे दी। जब ईडी ने उस मालिक को मनी लॉन्ड्रिंग में अपने यहां आरोपी बनाया, तो उसने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी कि जब पुलिस ने उसे क्लीन चिट दे दी, तो ईडी आरोपी बना ही नहीं सकती। लेकिन हाईकोर्ट ने ईडी के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा क्लीन चिट के बाद भी ईडी किसी को आरोपी बना सकती है, यदि ईडी के पास पर्याप्त ऐविडेंस हैं।

ईडी के पास किसी केस के इनवेस्टिगेशन के इतने अधिकार हैं, जो सीबीआई और एनआईए को भी नहीं है। एनआईए उन्हीं केसों का इनवेस्टिगेशन कर सकती है, जिसमें टेरर लिंक हो। हां, ऐसे केसों के इनवेस्टिगेशन के लिए उसे राज्य सरकारों से किसी परमिशन की जरूरत नहीं। जैसे मुकेश अंबानी की एंटीलिया बिल्डिंग के बाहर स्कॉर्पियो कार वाला केस एनआईए ने इसलिए अपने हाथ में लिया, क्योंकि इसमें जिलेटिन मिला था और एक्सप्लोसिव एक्ट की अलग-अलग धाराएं लगाई गई थीं।

सीबीआई, एनआईए को भी इतने अधिकार नहीं
सीबीआई केस तभी अपने हाथ ले सकती है, जब राज्य सरकार या सुप्रीम कोर्ट आदेश दे। जैसे सुशांत सिंह राजपूत वाला केस सीबीआई को देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया, लेकिन टीआरपी वाला केस सीबीआई के पास नहीं गया, क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने आदेश निकाला कि उसकी परमिशन के बिना कोई भी केस का इनवेस्टिगेशन सीबीआई नहीं कर सकती। लेकिन ईडी के सामने इस तरह के किसी भी केस के इनवेस्टिगेशन के लिए कोर्ट या राज्य सरकारों की कोई बंदिश नहीं है। इसलिए महाराष्ट्र में एकनाथ खडसे से लेकर अजित पवार सभी राजनेता ईडी की जांच के घेरे में इन दिनों हैं।

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