ध्यान गंभीर होने से, इंद्रिय हो जाती है निष्क्रिय-स्वामी मुक्तिनाथानन्द

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भास्कर न्यूज
लखनऊ।मन जब एकाग्र हो जाता हैं एवं ध्यान गंभीर हो जाता हैं तब हमारे इंद्रिय काम नहीं करते हैं, वो निश्चल हो जाते हैं। श्री रामकृष्ण यह बात अपनी अनुभूति के बल पर उनके भक्तगणों को शुक्रवार को राम कृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने सत्प्रसंग में सुनाया। उन्होंने कहा कि “ध्यान में इस तरह की एकाग्रता होती है, उस समय और कुछ भी नहीं दिख पड़ता न कुछ सुन पड़ता है। कोई छू भी ले तो समझ में नहीं आता। देह पर से साँप चला जाता है और कुछ पता नहीं चल पाता। जो ध्यान करता है न वो समझ सकता है और न साँप।” यह एक विचित्र अनुभूति है क्योंकि

जब हमारे शरीर में पंच इंद्रियाँ विद्यमान है अर्थात चक्षु, कर्ण,नासिका,जिव्हा व त्वचा। तब प्रत्येक इन्द्रिय उनके विषय के साथ जुड़े रहते हैं। चक्षु का विषय है रुप, कर्ण का विषय है शब्द, नासिका का विषय है गंध, जिव्हा का विषय है रस एवं त्वचा का विषय है स्पर्श लेकिन जब ध्यान गंभीर हो जाता है तब मानों बाहरी दुनिया से भीतरी की दुनिया के बीच एक व्यवधान हो जाता है।यह बात श्री रामकृष्ण अपने भक्तगण को सुनाया। उन्होंने कहा, “ध्यान के गहरे होने पर इंद्रियों के कुल काम बंद हो जाते हैं। मन बहिर्मुख नहीं रहता,जैसे घर का बाहरी दरवाजा बंद हो जाए। इंद्रियों के विषय पाँच है- रूप, रस, गंध,स्पर्श,शब्द- ये बाहर पड़े रहते हैं।”

अर्थात उस ध्यानावस्था में यद्यपि बहिर्विषय का ज्ञान नहीं रहता है लेकिन हमारे अंदर में जो चेतना है, जो विषय विद्यमान है उसके बारे में हमारी अनुभूति होती रहती हैं। अर्थात मन चेतन भूमि छोड़कर अतिचेतन भूमि में उन्नत हो जाता है। बाहर की रोशनी बंद होने पर भी भीतर में अंधकार नहीं रहता है। स्वामी ने कहा कि भीतर मेँ आत्म ज्योति की चमक से सब कुछ उजियारा रहता है। उपनिषद में भी कहा गया है कि भीतर में जो परमात्मा है, उनकी दिव्य ज्योति से सब कुछ आलोकित होता है और वो आलोक से हम भीतर में छिपे हुए ईश्वर को दर्शन कर सकते हैं।

स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने बताया यद्यपि ईश्वर दर्शन करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है, वह अवस्था प्राप्त करने के लिए हमारा ध्यान गंभीर होना चाहिए और ध्यान को गंभीर करने के लिए बाह्य विषय से मन हटाकर भीतर में ईश्वर के चरणों में मन एकाग्र करना पड़ेगा और जब बहिर्विषय से मन हट जाएगा तब हमारी इन्द्रियाँ बहिर्विषय से युक्त होकर हमारे मन को चंचल करने में समर्थ नहीं होंगे। तब मन की वह शांत अवस्था में हम ईश्वर दर्शन करते हुए जीवन सफल कर पाएंगे।