Americas new bet-अमेरिका का नया दांव

11

दोहा वार्ताओं को तालिबान के पक्ष में दिखाने के लिए अमेरिका ने अफगान सरकार पर हजारों तालिबानी कैदियों को रिहा करने का दबाव बनाया, जिसे लेकर गनी सरकार तैयार नहीं थी।

ब्रह्मदीप अलूने

दोहा वार्ताओं को तालिबान के पक्ष में दिखाने के लिए अमेरिका ने अफगान सरकार पर हजारों तालिबानी कैदियों को रिहा करने का दबाव बनाया, जिसे लेकर गनी सरकार तैयार नहीं थी। जाहिर है, अमेरिका भीतर ही भीतर तालिबान के साथ सौदेबाजी में लगा था।

अमेरिका ने काबुल में अपना दूतावास बंद कर इसे कतर की राजधानी दोहा में स्थानांतरित कर दिया है। सभी अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान छोड़ चुके हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन ने इसे अफगानिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्तों का एक नया अध्याय बताया है, जिसमें सैनिक अभियान के समाप्त होने और नए कूटनीतिक मिशन के शुरू होने की बात कही गई है।

दरअसल अफगानिस्तान से आतंक समाप्त करने का अमेरिकी लक्ष्य भले पूरा न हुआ हो, लेकिन उसके वैश्विक हित और उद्देश्य अवश्य बदल गए हैं। अमेरिका को लेकर यह धारणा रही है कि यह एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी नीतियां वहां की राजनीतिक पार्टियां या राष्ट्रपति तय नहीं करते, बल्कि तय वही होता है जो अमेरिकी हित में हो, चाहे सत्ता में कोई भी रहे। अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी अप्रत्याशित नहीं होकर कूटनीति का ऐसा दांव माना जा रहा है जिससे मध्यपूर्व, दक्षिण एशिया, चीन, रूस सहित कई मोर्चों पर अमेरिका को निर्णायक बढ़त मिल सकती है।

ऐसा लगता है कि अमेरिका और तालिबान ने आपसी गठजोड़ करके न केवल अपने हितों को सुरक्षित कर लिया, बल्कि भविष्य में आपसी सहयोग की व्यूह रचना भी तैयार कर दी। इसकी शुरूआत ट्रंप के कार्यकाल में ही हो गई थी जब अमेरिका और तालिबान के बीच वार्ताओं का दौर शुरू हुआ था। इसलिए अगर यह कहा जाए कि तालिबान का अफगानिस्तान में कब्जा इसी योजना का हिस्सा है जिसे बाइडेन ने अंजाम तक पहुंचा दिया है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार अमेरिका और तालिबान के बीच होने वाली वार्ताओं को लेकर लगातार आशंकित रही और उन्होंने वार्ताओं का विरोध भी किया। लेकिन अमेरिका ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के विरोध को नजरअंदाज कर तालिबान की वे शर्तें भी मानीं जिसमें अशरफ गनी को वार्ता से दूर रखने की बात कही गई थी। जब ट्रंप ने वार्ता को सफल बताया था तब भी अशरफ गनी ने इसकी आलोचना करते हुए इसे अमेरिका द्वारा तालिबान की शक्ति को मान्यता देने जैसा बताया था।

दरअसल गनी अमेरिका और तालिबान के बीच पनपती साझेदारी को बहुत पहले भांप गए थे। उन्होंने फरवरी 2018 में तालिबान को एक वैध राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने की पेशकश के साथ बिना शर्त शांति वार्ता के लिए आमंत्रित भी किया था। पर तब भी तालिबान अफगान सरकार के साथ बातचीत के लिए राजी नहीं हुआ। अमेरिका और तालिबान के बीच कतर में शांति वार्ता की शुरूआत 12 अक्तूबर 2018 को हुई थी और यहीं से अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी की संभावनाएं प्रबल हो गई थीं। इस बीच ट्रंप प्रशासन ने अफगानिस्तान में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अफगान मूल के जलील खलीलजाद को अपना वार्ताकार बना कर एक और दांव खेला था, जिन्होंने अक्तूबर 2019 में पाकिस्तान पहुंच कर तालिबान के सह संस्थापक और मुख्य शांति वातार्कार मुल्ला अब्दुल गनी बरादर की अगुवाई वाले तालिबान प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक करके भविष्य की कार्ययोजना तय कर दी थी।

तालिबान के प्रति अमेरिका की नीति को बहुआयामी दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। अमेरिका ने 2001 में न्यूयार्क और पेंटागन पर आतंकी हमले के लिए अलकायदा को जिम्मेदार ठहराया था। इसके बाद अलकायदा का समर्थन करने के आरोप में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और तालिबान को सत्ता से बेदखल कर वहां नई सरकार बनाने के रास्ते तैयार किए। लेकिन दो दशकों तक अफगानिस्तान की सत्ता को संचालित करने और अरबों डॉलर फूंकने वाले अमेरिका के लिए स्थितियां अनुकूल कभी नहीं पाईं। इससे अमेरिका को यह अनुभव हो गया कि कबीलों से संचालित होने वाले इस देश में सर्वप्रिय, समन्वयकारी और वैधानिक सरकार की स्थापना नामुमकिन है। अफगानिस्तान का इतिहास इसका गवाह भी है।

अमेरिका और तालिबान के बीच वार्ता पिछले साल मार्च में दोहा में शुरू हुई थी। वार्ता शुरू होने से पहले तालिबान ने कहा था कि वह केवल अमेरिका के साथ सीधी बातचीत करेगा, न कि काबुल सरकार के साथ जिसे उसने कभी मान्यता नहीं दी। अमेरिका ने वार्ता प्रक्रिया से अफगान सरकार को अलग रखते हुए इस मांग को प्रभावी ढंग से स्वीकार कर लिया और विद्रोहियों के साथ सीधी बातचीत शुरू की। दोहा वातार्ओं को तालिबान के पक्ष में दिखाने के लिए अमेरिका ने अफगान सरकार पर हजारों तालिबानी कैदियों को रिहा करने का दबाव बनाया, जिसे लेकर गनी सरकार तैयार नहीं थी। जाहिर है, अमेरिका भीतर ही भीतर तालिबान के साथ सौदेबाजी में लगा था।

अब अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के लिए अमेरिका की चौतरफा आलोचना हो रही है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन तालिबान का लगातार बचाव कर रहा है। हाल में सुरक्षा परिषद ने तालिबान को आतंकी संगठन बताने से परहेज किया। काबुल हवाई अड्डे पर आतंकी हमले के लिए इस्लामिक स्टेट को जिम्मेदार ठहराकर तालिबान की छवि को बचाने की कोशिश की। अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआइए के प्रमुख विलियम बर्न्स ने काबुल में तालिबान के नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के साथ गोपनीय मुलाकात कर तालिबान अमेरिकी साझेदारी के बढने के संकेत दिए हैं।

आज अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता चीन की विस्तारवादी नीतियों को लेकर है। अब अमेरिका तालिबान की मदद लेकर ड्रैगन को झटका देने की रणनीति पर काम कर सकता है। जबकि चीन अफगानिस्तान को आर्थिक गलियारे में शामिल करने के संकेत दे चुका है। चीन अफगानिस्तान के पहाड़ी इलाके वाखान गलियारे के पास सैन्य अड्डा भी बनाना चाहता है। अब तालिबान-अमेरिका गठजोड़ के चलते चीन की आर्थिक और सामरिक समस्या बढ़ सकती है। तालिबान को लेकर अमेरिका का पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी रूस भी आशंकित है। वह तालिबान से मजबूत संबंध रख कर इस्लामिक स्टेट को इस क्षेत्र से दूर रखना चाहता है। उसकी चिंता चेचन्या को लेकर है।

रूस इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि दक्षिण और मध्य एशियाई देशों में सक्रिय आइएस से इस क्षेत्र में सहानुभूति रखने वाले कट्टरपंथी मौजूद हैं। अमेरिका अफगानिस्तान से लगने वाले देश ईरान को भी नियंत्रित करने के मौके की ताक में रहा है। तालिबान और ईरान के संबंध असहज ही रहे हैं। ईरान के कथित गोपनीय परमाणु कार्यक्रम- अमाद को लेकर अलग-अलग कारणों से अमेरिका, सऊदी अरब और इजराइल दहशत में हैं। ईरान वैश्विक प्रतिबंधों से जूझ रहा है और उसके लिए विदेशों में जमा विदेशी मुद्रा भंडार को इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया है। ईरान की सीमा से लगा अफगान शहर हेरात नकदी के स्रोत की अहम भूमिका निभाता है, जहां अनुकूल दरों पर अमेरिकी डॉलर का लेनदेन होता है और इस्लामिक रिपब्लिक नकदी के अपने सबसे नजदीकी और प्रमुख स्रोतों में से एक तक पहुंच खोना नहीं चाहेगा। अब अमेरिका सुन्नी कट्टरपंथी संगठन तालिबान पर दबाव डाल कर न केवल ईरान की अफगानिस्तान से लगती सीमा को असुरक्षित कर सकता है, बल्कि उसे आर्थिक नुकसान भी पहुंचा सकता है।

बाइडन ने तालिबान के लिए अफगानिस्तान की सत्ता का मार्ग खोल कर कई कूटनीतिक मोर्चों पर बढ़त हासिल कर ली है। इस्लामिक स्टेट का प्रभाव अफगानिस्तान के हेलमंद, जाबुल, फराह, लोगार और नंगरहार जैसे प्रांतों में देखने को मिल रहा है। इस्लामिक स्टेट और तालिबान लड़ाकों का संघर्ष आने वाले समय में बढ़ सकता है। इससे तालिबान पर दबाव बढ़ेगा। तालिबान के लिए अमेरिका से सामरिक और आर्थिक सहयोग मिलता रहना बेहद जरुरी है और यह उसकी प्राथमिकता भी होगी। अमेरिका की नजर मध्यपूर्व से लेकर ईरान, रूस और चीन तक है और ऐसे में तालिबान और दोहा उसके लक्ष्यों को पूरा करने का माध्यम बन सकता है।

Source link