Allahabad High Court reserved verdict

26

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों का बयान सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया.

हाईकोर्ट में कई तारीखों पर दोनों पक्षों की चली लंबी बहस पूरी होने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस प्रकाश पाडिया के एकल पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया है.

प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने वाराणसी (Varanasi) स्थित ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Mosque) और काशी विश्वेश्वरनाथ मंदिर (Kashi Vishveshwarnath) विवाद में दोनों पक्षों की बहस पूरी होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में मंदिर ट्रस्ट की ओर से वाराणसी जिला कोर्ट में दायर सिविल वाद (Civil suit) की पोषणीयता को चुनौती दी गई है. मस्जिद की ओर से अंजुमन इंतजामिया मस्जिद वाराणसी ने याचिका दाखिल कर जिला कोर्ट वाराणसी में दायर सिविल वाद को खारिज करने की मांग की है.

हाईकोर्ट में कई तारीखों पर दोनों पक्षों की चली लंबी बहस पूरी होने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस प्रकाश पाडिया के एकल पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. हाईकोर्ट में मंदिर पक्ष ने बहस के दौरान दलील दी कि काशी विश्वेश्वरनाथ मंदिर के खंडहरों पर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई है. अदालत में कहा गया कि 1664 में मुस्लिम शासक औरंगजेब ने मंदिर नष्ट कर मस्जिद बनवाई थी. अभी भी तहखाने सहित चारों ओर की जमीन पर हिन्दुओं का ही वैधानिक कब्जा है. मस्जिद के पीछे शुरू से ही शृंगार गौरी की पूजा होती चली आ रही है. इसके साथ ही विवादित स्थल के पीछे जमीन पर कथा भी आयोजित होती रही है. नंदी का मुख भी मस्जिद की ओर होने से यह साफ है की मंदिर तोड़कर मस्जिद का रूप दिया गया है. परिसर में मुक्ति कूप के पास अभी भी नंदी विराजमान हैं. तहखाने के गेट पर हिन्दुओं व प्रशासन का ताला भी लगा हुआ है. मस्जिद के पीछे ध्वंसावशेषों में मंदिर का ढांचा साफ तौर पर दिखाई देता है. विवादित ढांचे में तहखाने की छत पर मुस्लिम नमाज पढ़ते हैं. मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि इस्लाम में विवादित स्थल पर पढ़ी गई नमाज कबूल नहीं है. इसलिए इसे हिन्दुओं को सौंप देना चाहिए.

इस मामले में जिला कोर्ट वाराणसी में वर्ष 1991 में मंदिर ट्रस्ट ने मुकदमा दायर किया है. जिस पर अपर सत्र न्यायधीश वाराणसी मुकदमे की सुनवाई कर रहे हैं. हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी वाराणसी ने वाराणसी जिला कोर्ट में चल रहे सिविल वाद को खारिज करने की मांग की है. अंजुमन इंतजामिया कमेटी का कहना है कि अवैध कब्जे के खिलाफ दाखिल सिविल वाद पोषणीय नहीं है. क्योंकि कानून के तहत 1947 के किसी भी मस्जिद-मन्दिर की स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता है. मस्जिद पक्ष की दलील है कि यथास्थिति बनाए रखने के लिए कानून सिविल मुकदमों पर रोक लगाता है. इस आधार पर स्थिति बदलने की मांग को लेकर वाराणसी में मंदिर ट्रस्ट की ओर से दाखिल याचिका पोषणीय नहीं है. जबकि मंदिर पक्ष ने इसके जवाब में कोर्ट में कहा है कि यह विवाद आजादी से पहले का है. इसलिए बाद में पारित कानून से विधिक अधिकार नहीं छीना जा सकता है. मंदिर को तोड़कर मस्जिद का रूप दिया गया, जो कानूनन अवैध है. कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है. हाईकोर्ट से कभी भी इस मामले में फैसला आ सकता है.






Source link