सच्चे मन से मां के दर्शनमात्र से ही भक्तों की पूरी होती हैं सभी मनोकामनाएं!

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– नवरात्र पर चंद्रिका देवी मंदिर में उमड़ती है,लाखों श्रद्धालुओं की भीड़
– लखनऊ के बख्शी का तालाब में स्थित है मां चंद्रिका देवी का मंदिर
– लक्ष्मण जी के पुत्र चंद्रकेश ने बनवाया था मां चंद्रिका देवी का मंदिर
भास्कर न्यूज़
लखनऊ।राजधानी के बख़्शी का तालाब में स्थित सिद्धपीठ मां चंद्रिका देवी मंदिर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में प्रसिद्ध है। राज्य के कोने-कोने से यहां श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है, कि सच्चे मन से मां के दर्शनमात्र से ही भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

खासकर हर अमावस्या और नवरात्र पर यहां आने वाले भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। मनोकामना पूरी करने के लिए भक्त मां के दरबार में चुनरी की गांठ बांधते हैं। मनोकामना पूरी होने पर भक्त मां को चुनरी व सूखे मेवे का प्रसाद चढ़ाकर मंदिर परिसर में घंटा बांधते हैं। अमीर हो या गरीब।

अगड़ा हो या पिछड़ा, मां चंद्रिका देवी के दरबार में सभी को समान अधिकार है। मां के मंदिर में पूजा-अर्चना पिछड़ा वर्ग के मालियों द्वारा तथा पछुआ देव के स्थान (भैरवनाथ) पर आराधना अनुसूचित जाति के लोगों द्वारा की जाती है। पूजा का ऐसा उदाहरण दूसरी जगह मिलना मुश्किल है।

राजधानी लखनऊ से करीब 30 किलोमीटर दूर बख्शी का तालाब तहसील के ग्राम पंचायत कठवारा में मां चंद्रिका देवी का मंदिर स्थित है। घने जंगलों के बीच बना मां का यह मंदिर तीन तरफ से गोमती नदी से घिरा होने के कारण एक टापू जैसा प्रतीत होता है। जनश्रुति के मुताबिक, त्रेता युग में भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेश ने इस मंदिर को स्थापित किया था,

जिसके कारण इस मंदिर का नाम चंद्रिका देवी पड़ा। कहा जाता है कि एक बार राजकुमार चंद्रकेश सेना के साथ इस स्थल से गुजर रहे थे। चलते-चलते रात हो गई। घने जंगल में दूर-दूर तक इंसान का नामोनिशान तक नहीं था। चारों ओर अंधकार से घबराकर राजकुमार ने मां की आराधना की तो पल भर में ही वहां चांदनी फैल गई और उन्हें मां के दर्शन हुए। इसके बाद चंद्रकेश ने यहां मंदिर की स्थापना की।चन्द्रिका देवी मंदिर के पास ही महीसागर तीर्थ है।

जनश्रुति है कि अश्वमेध यज्ञ के समय यज्ञ का घोड़ा छोड़ा था, जिसे क्षेत्र के तत्कालीन राजा हंशध्वज ने रोक लिया था। इसके बाद उन्हें युधिष्ठिर की सेना से युद्ध करना पड़ा। हंशध्वज ने घोषणा की थी, सभी को युद्ध में भाग लेना होगा, लेकिन खुद उनका पुत्र सुधवना मंदिर में पूजा करता रहा, जिसके कारण उसे खौलते तेल में डाल दिया गया,

लेकिन मां चंद्रिका देवी की कृपा से उसके शरीर पर कोई आंच नहीं आई थी। स्कंद पुराण के अनुसार, इस तीर्थ में घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने तप किया था। आज भी करोड़ों भक्त यहां महारथी बर्बरीक की पूजा-आराधना करते हैं। यह तीर्थ मनोकामना पूर्ति व पापों को नाश करने वाला माना जाता है।

दर्शनीय स्थल
सिद्धपीठ चंद्रिका देवी मंदिर में मां की पिंडियों के बाईं ओर दुर्गा जी हनुमान जी एवं सरस्वती जी के विग्रहों की स्थापना है। देवी धाम में एक विशाल हवन कुंड, यज्ञशाला, चन्द्रिका देवी दरबार, बर्बरीक द्वार, सुधनवा कुण्ड, महीसागर संगम तीर्थ के घाट आदि दर्शनीय स्थल हैं। चंद्रिका देवी मंदिर देश-प्रदेश के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है।
खूबसूरती में खो जाएंगे
पर्यटन के लिहाज से चंद्रिका देवी का अपना अलग महत्व है। यह स्थान तीन तरफ से गोमती नदी से घिरा और जंगल के बीचोबीच बसे होने के कारण यहां की खूबसूरती आपके मन को मोह लेगी। शहर के शोर-शराबे से दूर मां के इस मंदिर परिसर में शांति का वातावरण आपको बार-बार यहां आने के लिए प्रेरित करेगा।
प्रस्तुति:-अजय सिंह चौहान