neglected attitude of government in agriculture sector severely damaged economy of the country – राजनीति: आत्मनिर्भर कृषि का संकट

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सरोज कुमार

भारत की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि क्षेत्र लंबे समय से असहाय और उपेक्षित रहा है। कृषि और किसानों की स्थिति सुधारने की बातें और घोषणाएं तो खूब होती रहीं, लेकिन इन पर इच्छाशक्ति से अमल नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि कृषि क्षेत्र लगातार कमजोर होता गया और अर्थव्यवस्था में इसका योगदान भी घटता गया।

किसान खेती छोड़ कर शहरों में दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर होने लगे। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 1951 में अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान इक्यावन फीसद था, जो 2011 में घट कर उन्नीस फीसद रह गया। आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार 2019-20 में यह योगदान घट कर 16.5 फीसद पर आ गया। यही नहीं, 1951 में जहां देश में कृषि पर सत्तर फीसद श्रमिक निर्भर थे, वहीं 2011 में यह आंकड़ा घट कर पचपन फीसद रह गया। गिरावट का यह सिलसिला जारी रहा और वर्ष 2019 में यह आंकड़ा लुढ़क कर 42.39 फीसद पर पहुंच गया। कृषि प्रधान कहे जाने वाले किसी देश के लिए ये आंकड़े किसी दु:स्वप्न से कम नहीं हैं।

कृषि क्षेत्र में गिरावट के इन आकड़ों से एक बात स्पष्ट है कि इस क्षेत्र के विकास के लिए अब तक जो भी कोशिशें की गईं, वे या तो नाकाफी रही हैं, या फिर नकारात्मक रहीं, जिनका कोई सकारात्मक असर नहीं हुआ। जाहिर तौर पर हमारी सरकारों ने कृषि के बदले उद्योगों को अधिक महत्त्व दिया है।

एक विश्लेषण के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय का कुल व्यय एक लाख छियालीस हजार तीन अठासी करोड़ रुपए था। जबकि इसी अवधि के दौरान कारपोरेट और कारोबारी संगठनों को दिए गए कर लाभ के अनुमान दो लाख तीन हजार नौ सौ तिरासी करोड़ चौहत्तर लाख रुपए थे।

पिछले साल सरकार ने सुस्त अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कारपोरेट कर में दस फीसद की कटौती की थी, जिससे उद्योग जगत को 1.45 लाख करोड़ रुपए का लाभ हुआ। जबकि 2019 में उद्योग क्षेत्र में मात्र 25.58 फीसद श्रमशक्ति रोजगाररत थी और कृषि क्षेत्र में बुरी हालत के बावजूद 42.39 फीसद श्रमशक्ति को रोजगार मिला हुआ था। बाकी 32.04 फीसद श्रमशक्ति सेवा क्षेत्र में संलग्न थी। कोरोना महामारी के बाद तो उद्योग और सेवा क्षेत्र की स्थिति और खराब हुई है।

कृषि के बदले उद्योगों को महत्त्व देने का सिलसिला आजादी के बाद से ही जारी है। अंग्रेजों को पता था कि यदि भारत में आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था बची रह गई, तो उनका भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए भारत से जाते-जाते वे यहां के खेतों में गुलामी के बीज बो गए। आजादी के बाद दूसरी पंचवर्षीय योजना के साथ हमने अपना सारा ध्यान औद्योगीकरण और शहरीकरण पर केंद्रित किया।

नतीजा यह हुआ कि खेती पीछे छूटती गई। इसके साथ ही गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ता गया। खेती की तरफ ध्यान तब गया जब पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी। खिसकी जमीन को वापस हासिल करने हमने 1965 में जल्दबाजी में अमेरिकी कृषि विज्ञानी नॉरमन बोरलॉग के ‘ग्रीन रिवॉल्यूशन’ के ‘हरित क्रांति’ संस्करण को भारतीय कृषि विज्ञानी एमएस स्वामीनाथन के नेतृत्व में अपना लिया।

बेशक हरित क्रांति ने अपना असर दिखाया और अन्न उत्पादन में खिसकी जमीन वापस हासिल करने में मदद की, लेकिन वह जमीन बाजारू बीज, रासायनिक खाद और खचीर्ले उपकरणों से बनी हुई थी। उसके अपने नकारात्मक पक्ष थे। खेती महंगी होती गई और उपज के उचित मूल्य नहीं मिले। ऊपर से जमीन और पानी भी जहरीला होता गया।

कृषि का पारिस्थितिकीय तंत्र गड़बड़ा गया। किसान कर्ज और मर्ज के बोझ तले दबते गए। रही-सही कसर तत्कालीन गैट (जनरल एग्रीमेंट आन टैरिफ्स एंड ट्रेड) निदेशक आर्थर डंकल के प्रस्ताव ने पूरी कर दी। भारत ने दुनिया के एक सौ तेईस देशों के साथ इस प्रस्ताव को 15 अप्रैल, 1994 को स्वीकृति दे दी और पहली जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) अस्तित्व में आ गया। दुनिया के देशों की सीमाएं अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खुल गईं। फिर क्या, यूरोप और अमेरिका को भारत सहित विकासशील देशों की बबार्दी का जैसे लाइसेंस मिल गया और यूरोपीय देश अपने सस्ते कृषि उपज भारत और अन्य विकासशील देशों में पाटने लगे।

विकसित देश अपने किसानों को भारी सहायता देते थे और अभी भी देते हैं, जबकि डब्ल्यूटीओ समझौते के तहत उन्हें व्यापार में समानता के सिद्धांत के आधार पर यह सहायता घटानी थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वहां के किसान अपनी उपज घाटे में बेच कर भी फायदे में थे। आयात शुल्क के अवरोध के बावजूद उनके उत्पाद भारत में सस्ते पड़ते थे। इस कठिन प्रतिस्पर्धा में महंगे भारतीय कृषि उत्पाद दुनिया के बाजारों से गायब होते गए और खेती छोड़ शहरों में दिहाड़ी मजदूर बन गए। कृषि पर निर्भर भारत की सत्तर फीसद आबादी सीधे तौर पर डब्ल्यूटीओ के इस दुष्चक्र में फंस गई। इसका परिणाम यह हुआ कि अर्थव्यवस्था का आधार खेती टूटती गई, और दूसरी ओर आयात बिल बढ़ने लगा।

भारत में आत्मनिर्भर खेती को हमेशा से उत्तम पेशा माना जाता रहा है। कहावत भी है- उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान। यानी पेशे में खेती का स्थान सबसे ऊपर था। उसके बाद व्यापार, तीसरे स्थान पर नौकरी और अंतिम पायदान पर भिक्षाटन। लेकिन खेती इस कदर कमजोर हुई कि पेशे के पिरामिड में यह चौथे पायदान पर खिसक गई और समाज में शर्म का पेशा बनती गई।

नौकरी, जिसे गुलामी माना जाता था, वह पिरामिड में शीर्ष पर पहुंच गई। खेती पर निर्भर श्रमिकों के आंकड़ों में लगातार गिरावट इसका स्पष्ट प्रमाण है। लेकिन पेशे का यह आधुनिक पिरामिड कोरोना महामारी के कारण आज जब ध्वस्त हुआ तो खेती ने ही उम्मीद की किरण जगाई। वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर जहां शून्य से 24 फीसद नीचे लुढ़क गई, वहीं कृषि क्षेत्र में 3.4 फीसद की वृद्धि देखी गई। यह खेती की अपनी प्राकृतिक ताकत है जो तमाम झंझावातों के बावजूद बची हुई है। अब सरकार से लेकर बाजार तक की नजरें खेती पर टिकी हैं। लेकिन यहां यह भी देखने की जरूरत है कि ये नजरें कितनी सकारात्मक हैं और ये खेती को खड़ा करने में कितनी सहायक बनेंगी।

ऐसे समय में जब आज खेती की दशा सुधारने और किसानों की आय दोगुनी करने की कवायद चल रही है, तब कोई कदम बढ़ाने से पहले खेती के मौजूदा ढांचे पर विचार कर लेना जरूरी है। क्या यह ढांचा हमारे लक्षित लक्ष्य की पूर्ति में सक्षम है? जवाब होगा नहीं। कृषि सुधार और आय दोगुनी करने का कोई सिद्ध सूत्र अभी तक सामने नहीं आया है।

हम अपने किसानों को विकसित देशों जितनी सहायता नहीं दे रहे हैं, और शायद हम उस स्थिति में हैं भी नहीं। अमेरिका में कोई किसान साल में 7,253 डॉलर की सरकारी मदद पाता है, यूरोपीय संघ के किसान को 1,068 डॉलर की सहायता मिलती है, लेकिन भारतीय किसान की किस्मत में साल में मात्र 49 डॉलर ही मदद मल पाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि हम विकसित देशों की खेती का मॉडल क्यों अपनाएं? भारतीय किसान खेती के लिए आज बाजार पर निर्भर है, लेकिन वह अपनी उपज का मूल्य लागत के आधार पर निर्धारित नहीं कर पाता है, यहां तक कि उसे सरकार द्वारा निर्धारित एमएसपी भी नहीं मिल पाता है।

कृषि का मौजूदा मॉडल किसानों के लिए आत्मघाती बन चुका है। इसलिए हमें खेती की लागत घटाने के समयसिद्ध सूत्र पर लौटना चाहिए। महात्मा गांधी का मानना था कि आत्मनिर्भर खेती के बगैर ग्राम स्वराज संभव नहीं है और ग्राम स्वराज के बगैर स्वतंत्रता का अर्थ नहीं है।

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