Child rights continue to be ignored, governments are silent on this, law and security are incomplete – राजनीति: बाल अधिकारों की अनदेखी

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बिभा त्रिपाठी

कहा जाता है कि बालक देश का भविष्य हैं। बालक की व्याख्या दो प्रकार से की गई है। एक तरफ कहा जाता है कि वे हमारी राष्ट्रीय संपत्ति हैं और दूसरी तरफ कहा जाता है कि बालक से एक ऐसा व्यक्ति है, जो स्वयं अपनी देखभाल नहीं कर सकता। हमें बालक के सर्वोत्तम हित को सदा ध्यान में रखना चाहिए। बालक के अधिकारों को सुरक्षित और संरक्षित करने की आवश्यकता सदा महसूस की गई है। क्योंकि बच्चा कमजोर होता है, समझ की कमी, परिपक्वता की कमी, क्षमता की कमी आदि के चलते उसके हितों की न सिर्फ अनदेखी होती, बल्कि उससे बलात श्रम कराया जाता है, उसका लैंगिक शोषण भी किया जाता है।

बाल मजदूरी, बाल तस्करी, बाल अपहरण, शारीरिक और मानसिक शोषण की समस्याओं की गंभीरता को समझते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक कानून बनाए गए हैं, जिनकी समुचित जानकारी प्राप्त कर न सिर्फ हम उनके अधिकारों को संरक्षित कर सकते हैं, बल्कि बच्चों, उनके माता-पिता, आस-पड़ोस और फिर पूरे समाज को जागरूक भी कर सकते हैं।

1923 में सेव द चिल्ड्रन इंटरनेशनल यूनियन द्वारा बालकों के अधिकारों को नामांकित किया गया, जिसे 1924 में जिनेवा घोषणा-पत्र कहा गया, जिसमें बालक के सामान्य, भौतिक और आध्यात्मिक विकास की बात कही गई और बताया गया कि जो बालक भूखा है, उसे भोजन दिया जाए, जो बीमार है उसका उपचार किया जाए और जो भटका है उसका सुधार किया जाए। 1959 में संयुक्त राष्ट्र की साधारण महासभा द्वारा बालकों के अधिकारों का घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया, जिसमें बालकों के सर्वोत्तम हित की बात कही गई है।

पर कोई भी घोषणा-पत्र राज्य पक्षकारों के ऊपर बाध्यकारी नहीं होता, इसीलिए 1989 में बाल अधिकारों की रूपरेखा बनी और संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों ने, अमेरिका को छोड़ कर, उसे स्वीकार किया। इसमें मूल रूप से चार प्रकार के अधिकारों की बात कही गई है, जो उसके जीवन, अस्तित्व, विकास और सुरक्षा से संबंधित हैं।
इन अधिकारों की पृष्ठभूमि में अगर भारतीय विधियों की चर्चा करें तो सबसे पहले ‘पीसीपीएनडीटी एक्ट’ आता है, जो भ्रूण हत्या को अपराध बना कर एक बच्ची के जन्म को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। उसके बाद नवजात शिशु से लेकर दो वर्ष तक के बच्चे के लिए ‘आइएमएस एक्ट’ में बच्चे को माता द्वारा स्तनपान कराने का अधिकार सुनिश्चित किया गया है।

सात वर्ष तक की उम्र के बालक को भारतीय दंड संहिता में पूरी तरह अपराध के दंड से मुक्त रखा गया है। फिर सात वर्ष से ऊपर और बारह वर्ष से नीचे के बालक को सीमित छूट प्रदान की गई है, जो इस आधार पर निर्भर करती है कि बालक में अपराध करने की समझ विकसित थी या नहीं।

अगर वह दोषी पाया जाता है तो उसे किशोर न्याय देखभाल एवं संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों का लाभ मिलता है। निर्भया कांड के बाद इस अधिनियम में संशोधन किया गया। अगर बालक की उम्र सोलह वर्ष से ऊपर और अठारह वर्ष से नीचे होती है, तो फिर उसकी समझ की परिपक्वता प्रभावी होती है।

आगे के कानूनों में महत्त्वपूर्ण है- सबके लिए शिक्षा, जिसमें छह से चौदह वर्ष तक के बालकों की मुफ्त शिक्षा का प्रबंध किया गया है। इन्हें लैंगिक उत्पीड़न से बचाने के लिए ‘पॉक्सो एक्ट’ है, तो तस्करी से बचाने के लिए ‘अनैतिक तस्करी निवारण अधिनियम’। बाल श्रम से बचाने के लिए ‘बाल श्रम निवारण एवं विनियमन अधिनियम’ है। बाल विवाह रोकने के लिए ‘बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम’ है। इन सबके बावजूद अपराध बढ़ रहे हैं, बालकों द्वारा भी और बालकों के विरुद्ध भी।

नए संशोधन के अंतर्गत धारा 2 (14) के तहत बारह श्रेणियों के बालकों को देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता बताई गई है। हर अठारह वर्ष से नीचे के बालक को देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता है। इसमें आवश्यकतानुसार नई श्रेणियों को भी शामिल किया जा सकता है।

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में ‘एक्सप्लॉइटेशन आफ चिल्ड्रेन इन आर्फनेज इन द स्टेट आफ तमिलनाडु बनाम भारत संघ’ के मामले में न्यायाधीश मदन बी लोकुर एवं न्यायधीश दीपक गुप्ता ने कहा कि धारा 2(14) की परिभाषा अंतिम नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक बच्चे को बाल सुधार गृह में ही नहीं रखना चाहिए। बल्कि उनके दत्तक ग्रहण और देखभाल की व्यवस्था पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देना चाहिए। जरूरी चीज है अभिभावकों द्वारा की जाने वाली देखभाल और पारिवारिक वातावरण।

जेजे एक्ट में धारा 2(14) (2) में भिक्षावृत्ति शब्द का प्रयोग किया गया है और कहा गया है कि जो कोई भीख मांगता हुआ पाया जाता है या सड़कों पर रहता है, उसे भी सीएनसीपी माना जाएगा। पर 11 अगस्त, 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने भिक्षावृत्ति को अपराध के दायरे से बाहर निकाल दिया और कहा कि यह उसकी गरिमा है कि वह चोरी नहीं कर रहा है। यानी अब जो बच्चा सड़क पर पाया जाएगा उसे ही सीएनसीपी कहा जाएगा।

अब ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक बच्चा जो सड़क पर ही जन्म लेता है और सड़क पर ही रहता है, उसकी जिम्मेदारी उठाने वाले कहां तक इनका ख्याल कर पाते हैं, क्योंकि ये वे बच्चे हैं, जो अल्बर्ट के. कोहेन की भाषा में ‘अपचारी’ बन जाएंगे और प्रास्थितिक नैराश्य के कारण प्रतिक्रियावादी हो जाएंगे।

अब जबकि ट्रांसजेंडर समुदाय को थर्ड जेंडर की संज्ञा दे दी गई है, तो ऐसे ट्रांसजेंडर बच्चों को भी सीएनसीपी की परिभाषा में शामिल करना चाहिए। ऐसी अवयस्क बच्चियां, जो यौन उत्पीड़न का शिकार होने के कारण गर्भवती हो जाती हैं और न चाहते हुए भी उन्हें बच्चे को जन्म देना पड़ता है, ऐसे बच्चों को दोहरे सीएनसीपी की संज्ञा दी जानी चाहिए।

अभी जेलों में बंद महिलाओं के साथ रह रहे छह वर्ष की उम्र तक के बालक के संबंध में भी विधि निश्चित नहीं हो पाई है। एक तरफ तो हम अठारह वर्ष से नीचे के बालक का वयस्क व्यक्ति के साथ संयुक्त विचारण भी नहीं करते और दूसरी ओर छह वर्ष के बालक बिना किसी अपराध के अपनी माताओं के साथ जेल के वातावरण में रहने को बाध्य होते हैं। यहां जेल मैनुअल में संशोधन की आवश्यकता है।

‘खुशबू जैन बनाम रेल मंत्रालय’ के मामले में सीएनसीपी बच्चों की देखभाल की बहुत महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी रेल मंत्रालय को सौंपी गई है। मगर इसके साथ ही आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों से संबंधित सारे मामले केवल महिला एवं गृह मंत्रालय तक सीमित नहीं रहने चाहिए। अन्य मंत्रालयों को एक साथ मिल कर सामूहिक नीति बना कर कार्य करना चाहिए। मसलन, यातायात, सामाजिक न्याय, श्रम, शिक्षा तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को प्रमुख रूप से संयुक्त प्रयास करना चाहिए।

इन सभी मंत्रालयों द्वारा बाल सहायता समूहों का गठन किया जाना चाहिए और मुक्तांगन की संकल्पना के आधार पर उनके आवास की व्यवस्था करनी चाहिए। बाल कल्याण समितियों की संख्या भी प्रत्येक जिले की जनसंख्या के अनुपात में बढ़ाई जानी चाहिए, बाल कल्याण संस्थाओं की संख्या बढ़ानी चाहिए और बाल सुधार इकाइयों के बढ़ते दायित्व को बांटने के लिए कुछ अन्य सहयोगी विभागों का सृजन करना चाहिए।

इन सबके अलावा पूरे समाज को यह समझना पड़ेगा कि अगर एक भी बच्चा विधि विवादित होता है, तो उसका दंश पूरे समाज को झेलना पड़ता है, इसलिए सामूहिक अभिभावकत्व की संकल्पना का जितना अधिक विकास होगा, जितना ही प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत क्षमता में और प्रत्येक संस्था अपनी संस्थागत क्षमता में बच्चों की देखरेख और संरक्षण कर पाएगी उतना ही वह देश समृद्ध, समर्थ और संतुष्ट हो पाएगा।

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