भोजपुरी विशेष: गांव के गंवइपन कहीं हेरा ना जाव | ayodhya – News in Hindi

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लेखक: आशुतोष कुमार सिंह

हे खातिर त भारत गांवन के देश कहल जाला. का सांचों में ई बात सांच रह गइल बा. हमरा त नइखे बुझात कि अब गांव, गांव रह गइल बा. अपना रोजी-रोटी खातिर आपन बोरा-झोड़ा लेके भोजपुरिया प्रदेश के लोग पहिले त कलकत्ता गइल, जब कलकत्ता के चटकल के कारखाना सब बंद होखे लगली स, त लोग दिल्ली, सूरत आ लुधियाना के ओर भागल. कहे के मतलब ई बा कि भोजपुरिया श्रम पूरब से पश्चिम के ओर पलायन कइलस.

1990-2000 तक के 10 बरिस, भोजपुरिया क्षेत्र के सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक ताना-बाना के तहस-नहस क के रख देले रहे. जान-माल, इज्जत-आबरू के सुरक्षा एगो बड़हन प्रश्न बनके उभरल रहे? एह प्रश्न के जवाब ओ बेरा के राजनीतिक मठाधीशन से ना मिलत देख, उहो लोग गांव छोड़े प मजबूर भइल, जे आराम से गांवे रह सकत रहे. धीरे-धीरे भोजपुरिया माटी में जन्मल बरियार जांगर के लोग भारत के कोना-कोना में फइल गइल. भोजपुरिया श्रम के एगो खास बात ई होला कि ऊ जब अपना गांव से निकल के दोसरा प्रदेश में जाला, त ओकर काम करे के क्षमता निखर जाला, बहुते उत्पादक हो जाला. एकर उदाहरण ऊ लोग बा जे गांव से बहरी गइल आ ओहिजा के माटी के अपना खून-पसीना से सींच के हरिहरा देहलस.

हमरा आजो इयाद बा, जवना बेरा हम पढ़े खातिर बहरी जात रहनी ओह बेरा हमरा साथे गुल्ली डंडा खेले वाला संघतिया लोग आपन पेटी-बक्सा लेके कमाए खातिर सूरत-लुधियाना के ओर आपन डेग बढ़ा देले रहे. पिछला 20 बरिस में ऊ लोग जहां गइल ओहिजा एक तड़े से बसिए गइल. गांव से शादी-बियाह क के अपना मेहरारूओ के अपना संगही ले गइल. कहे के मतलब ई बा कि इलोग आपन घर गृहस्थी शहर के आगोस में बसा लिहल. शहर दुत्करबो कइलस आ पुचकरबो कइलस. दुधिया रौशनी में नहाइल शहर के चमक-दमक में ई लोग अइसन अझूराइल कि गांव के गंवईपन के, शहर अजगर नियन निगल लेलस. गांव से दूर शहर के चकाचौंध में चौंधिआइल एह लोग के जिनगी असंगठित क्षेत्र के भट्टी में जरे-मरे वाला रहल बा. बाकिर शहर में रहे के लालसा आ गांव के अभाव के प्रभाव के कारण ई लोग गांवे ठीक से कबो ना लौट पावल.भोजपुरी स्पेशल- गायक बन गइले नायक, भोजपुरी सिनेमा अपना समाजे से कटि गइल

कोरोना जब आइल
एही बीच में कोरोना के दौर शुरू भइल. गांव-घर छोड़ के शहर में आइल गंवई लोग अब शहर छोड़ के गांव के ओर भागल. जिनगी से बड़ कवनो चीज थोड़ही नू होला. जिनगी बाची त खेती-बारी क के जिनगी चला लिहल जाई. इहे सोच लेके लाखन लोग अपना माटी के ओर लौटे प मजबूर भइल. शहर में उहे लोग रूकल जेकर आमदनी 25 हजार रुपिया महीना के ऊपर रहे. बाकिर 10-25 हजार कमाए वाला लोग कोरोना के बंदी में शहर खातिर भार बन गइल रहन. एह से एह लोगन के भगावे खातिर कहीं कहीं त सरकारों सक्रिय दिखल. खैर, मजबूरी के नाम महात्मा गांधी जपत लोग अपना-अपना पुरान ठिहा की ओर लौट चलले….

सांच कहल जाव त जेकर मन शहर हो गइल बा, ऊ जब गांव में लौटी त, ओकरा आ गांव के बीच अंतर के खाई बहुत गहिर लउकी. अउर इहे अंतर अब विवाद के कारण बनत जा रहल बा. जब ले शहर में रह के 15-20 हजार रुपिया कमाए के मिलत रहे, तब ले ना त केहू के गांव इयाद आइल अउर ना ही गांव के दू कमरा वाला घर. जवन भाई गांवे में रह गइल, ओकरा ओर जादातर शहरी बाबू लोग फूटियो आंखि से ना देखल. बाकिर अब जब कोरोना भगवले बा त गांव के ओही दू गो कमरा वाला बड़का घर, बाल बच्चा खातिर टाट बनल बा. दूसर ओर इहो सांच बा कि घर में संख्या बढ़ला के बाद बर्तन से बर्तन टकराइल शुरू हो गइल बा

बिहार-यूपी के सरकार चाहे लाख कह लेवे कि ऊ गांवे आवे वालन खातिर रोजगार के व्यवस्था कइले बिया, बाकिर सांच ई बा कि गांव में जा के लोग आपन धूर-डरार के फेर में फंस गइल बा. भाई-देयाद एक दूसरा के मारे-पीटे पर उतारू हो गइल बा. कहे के मतलब ई बा कि गांव-घर में झगड़ा बढ रहल बा. पहिले जवन झगड़ा पंच-परमेश्वर सलटा देत रहे लोग, ऊ झगड़ा अब कोर्ट-कोतवाली ले पहुंच रहल बा.

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गांव में एह घड़ी एगो ट्रेड तेजी से फइल रहल बा. अइसन नइखे की इ ट्रेड नया ह बाकिर एह घड़ी ई डिमांड में बा. एह ट्रेंड के हम ‘घर-फोड़वा’  कहेनी. गांव में कुछ लोग के मनोरंजन के साधन बन गइल बा ‘घर-फोड़वा ट्रेंड’. जेकरा घर में बहरी से लोग आइल बा ओह घर पर गांव के गिद्ध प्रजाति के लोगन के नज़र टीकल गइल बा. अइसन लोग एह फिराक में रहत बा कि कइसे एह घड़ में झगड़ा लगा दीं आ फेर झगड़ा फरियावे खातिर मेठ बन के आपन रोब झारी. एह प्रजाति के लोग अमूमन सब गांव में मिल जालन बाकिर कोरोना काल में एह लोगन के सक्रियता तनी ढेर बढ़ गइल बा. अइसे में एह प्रजाति के लोगन से बचल कोरोना से बचे से भी जादा जरूरी बा. जे लोग गांव के दांव-पेंच के नइखे जानत ऊ एह गिद्धन के शिकार जल्दी हो् जाला. एह से भोजपुरिया गांव के ताना-बाना के बचावे खातिर जरूरी बा कि एह तरह के गिद्धन से बचल-बचावल जाव.

कोरोना-काल आइल बा. काल्ह चलि जाई बाकिर ई जवन घाव देके जात बा ऊ जल्दी ना भरी. एह से एह समय में गांव में रहे वाला लोगिन के आ शहर से गांवे पहुंचल लोगन के आपन-आपन डफली बजावल छोड़ के सबसे पहिले अपना सेहत पर धेयान देबे के चाहीं. संगे-संगे गांव में फड़फड़ात गिद्धनों से बच के रहे के चाहीं. सब भोजपुरिया लोगन से हमार निहोरा बा कि अभी समय के मांग सेहतमंद रहे् खातिर जतन करे के बा. एह से सब केहू सेहतमंद रहे के उपाय त करबे करे संगे-संगे आपन भाई-देआद सहित गांव के सभ जन के स्वस्थ रखे के दिसो में काम करो. गांव में जब शांति रही,गांव में जब सनेह रही, गांव में जब भाइचारा रही, गांव में जब मिठास रही त निश्चित रूप से गांव खुशहाल रही, गांव बरियार रही अउर सबसे बड़ बात ई कि गांव, गांव रही.



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