बनारसी की ‘बर्फी’ ने भी लड़ी आजादी की लड़ाई, हिला गई थी अंग्रेजी हुकूमत | varanasi – News in Hindi

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बनारसी की ‘बर्फी’ ने भी लड़ी आजादी की लड़ाई

वाराणसी के चौखम्भा इलाके में स्थित ‘श्री राम भंडार’ ने इस बर्फी की शुरुआत 1947 में की थी. आज भी लोग 15 अगस्त (Independence Day) के दिन इसको खरीदारी करते हैं.

वाराणसी. देश को आजाद कराने के लिए बनारस (Varanasi) के लोगों का विशेष योगदान दिया है. जिसमें कई कहानियां शामिल है. बनारस की रंग बिरंगी मिठाइयों का कोई जवाब नहीं है. देश-विदेश में मशहूर ‘राम भंडार’ में पहली बार तिरंगे के रंग वाली तिरंगी बर्फी बनी तो अंग्रेजों के होश उड़ गए थे. तिरंगे पर रोक के दौर में लोग तिरंगी बर्फी हाथों में लिए घूमते रहे. इसके बाद बनारस से ही जवाहर लड्डू, गांधी गौरव, मदन मोहन, वल्‍लभ संदेश, नेहरू बर्फी के रूप में राष्‍ट्रीय मिठाइयों की श्रृंखला सामने आई. तिरंगी बर्फी और तिरंगे जवाहर लड्डू में आज की तरह रंग का उपयोग नहीं हुआ था. हरे रंग के लिए पिस्‍ता, सफेद के लिए बादाम और केसरिया के लिए केसर का प्रयोग कर तिरंगे का रूप दिया गया था.

वाराणसी के चौखम्भा इलाके में रहने वाले अशोक बताते हैं कि इस बर्फी की कहानी 1947 से भी पुरानी है .इस बर्फी को स्वतंत्रा के लड़ाई में संदेश पहुचाने के लिए बनाया गया था. तब से इसका नाम तिरंगा बर्फी पड़ा. यही कारण है कि आज भी लोग 15 अगस्त के दिन इसको खरीदारी करते हैं. वाराणसी के चौखम्भा इलाके में स्थित ‘श्री राम भंडार’ ने इस बर्फी की शुरुआत 1947 में की थी. इस बर्फी की शुरआत आज़ादी के लड़ाई में लड़ने वाले लोगों के लिए संदेश के लिए किया गया था.

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दुकान के मालिक बताते हैं कि इनकी मिठाई की दुकान 150 वर्ष पुरानी है और आज भी ये उसी तरह चल रही है. जब देश आजाद हुआ तब आम जनमानस तक इस तिरंगे बर्फी का स्वाद पहुंचां, चूंकि देश के आज़ादी का जश्न था, तो इसका रंग भी तिरंगे के रंग में दिया गया. इस तिरंगे बर्फी के साथ ही आज़ादी के वक्त के कई नाम दिए गए थे. उस दौर में पहली बार बनारस में ही तिरंगा बर्फी बनी जो राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रंग की थी.



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