धर्म नगरी में हिंदुओं का कब्रिस्तान, सैकड़ों सालों से है शवों को दफनाने की परंपरा-varanasi news hindu graveyard where dalis and kabir followers buried bodies upat

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वाराणसी में सैकड़ों सालों से हिंदू दफनाते आ रहे हैं शव

Hindu Graveyard in Varanasi: न्यूज़ 18 की टीम वाराणसी के लहरतारा स्थित एक कब्रिस्तान पहुंची, जहां के शिलापट्ट पर नाम पढ़कर अचंभित हो गए. इन पत्थरों पर नाम सभी हिन्दू सम्प्रदाय से जुड़े हुए थे.

वाराणसी. हिन्दुओं की कब्रगाह! ये सुनकर आप चौक गए होंगे, लेकिन यह सच है. धर्मनगरी वाराणसी (Varanasi) में एक ऐसा कब्रिस्तान (Graveyard) है जहां, सैकड़ों सालों से हिंदू शवों को दफनाते आ रहे हैं. दरअसल, प्रयागराज और उन्नाव में धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ कोरोना काल मे शवों को दफनाने के मुद्दे पर विपक्ष लगातार हमलावर है. हिंदुओं को दफनाने की ये तस्वीर कोई नई परम्परा नहींं है और ना ही कोई मजबूरी. इस बात की तस्दीक करती है धर्म और मोक्ष की नगरी के लहरतारा स्थित कब्रिस्तान जिसे हिंदुओं का कब्रगाह कहा जाता है.

जब प्रयागराज के गंगा नदी के किनारे रामनामी से ढके हुए कब्रों की तस्वीर सोशल मीडिया के बाद मुख्य धारा की मीडिया में भी दिखने लगी तो सभी के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर क्या ये सभी कब्र इसी कोरोना काल की है और अगर हां तो इनका संस्कार हिंदू धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से दाह संस्कार के जरिए क्यों नहीं किया गया.

लहरतारा में है कब्रिस्तान

ऐसे में न्यूज़ 18 की टीम वाराणसी के लहरतारा स्थित एक कब्रिस्तान पहुंची. जहां के शिलापट्ट पर नाम पढ़ के हम भी अचंभित हो गए. इन पत्थरों पर नाम सभी हिन्दू सम्प्रदाय से जुड़े हुए थे. जब इस कब्रिस्तान के बारे में पता किया तो जो तस्वीर सामने आई उससे कम से कम ये बात तय है कि हिन्दू धर्म में शवों को दफनाने की प्रक्रिया कोई नई नहीं बल्कि सैकड़ों साल पुरानी है. कब्रिस्तान के बाहर ही चाय की दुकान चलाने वाले बबन यादव ने बताया कि उनकी उम्र 45 साल है और तब से ऐसा देख रहा हूं. जबकि मेरे दादा के समय से यहां हिन्दू अपने परिजन के शवों को दफनाते हैं. उनका कहना है कि यहां अनुसूचित जाति और कबीर पंथी समाज के लोग अपने मृत परिजनों के शव को दफनाते हैं.सैकड़ों वर्ष पुराना है कब्रिस्तान

दरअसल ये कब्रिस्तान सैकड़ों साल पुराना है. इस इलाके से सटे आसपास के क्षेत्रों से भी यहां हिन्दू धर्म के लोग आकर अपने मृत परिजनों को दफनाया करते हैं. कई कब्र पक्के भी बनाये गए हैं, जिनमें बाकायदा मरने वाले का नाम, जन्मतिथि, मृत्यु की तारीख लिखी गयी है. इस मुद्दे पर जब हमने धर्माचार्य और अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रनंद से पूछ तो उन्होंने बताया कि अलग-अलग स्थान पर अंत्येष्टि कई प्रकार से की जाती है. भू समाधि, जल समाधि, अग्नि समाधि, कई जगहों पर बर्फ में दफनाने की भी प्रथा है. हिन्दू धर्म में भी बौद्ध धर्म अपनाने वाले महायान पन्थ और कबीर पंथियों के बीच भू-समाधि लिए जाने की परंपरा है. साथ ही हिन्दू समाज के आर्थिक रूप से विपन्न शुद्र वर्ण के लोग जो बौद्ध या कबीरपंथ को मानते हैं उनके बीच अपने परिजनों को भू -समाधि कराये जाने की परम्परा रही है. इस पर व्यर्थ में ही राजनीति हो रही है.







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