डायबिटीज़ के टाइप 1 और 2 में क्या है फर्क, जानें किसको है इन्सुलिन लेने की ज़रूरत

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शरीर में शुगर लेवल कम हो जाना हाइपोग्लाइसीमिया कहलाता है.

अगर किसी डायबिटीज़ (Diabetes) के पेशेंट को दवाएं असर नहीं कर रही हैं और डॉक्टर उनको इन्सुलिन (Insulin) लेने की सलाह देते हैं, तो उनको डरना नहीं चाहिए और इन्सुलिन ले लेना चाहिए.

(मीनल टिंगल)

डायबिटीज़ क्या है, लोग ये तो जानते हैं लेकिन टाइप 1 और टाइप 2 में फर्क नहीं समझ पाते. कुछ लोग ब्लड में शुगर के बढ़ने को टाइप 1 और शुगर कम होने को टाइप 2 डायबिटीज़ समझ लेते हैं. जबकि ऐसा नहीं है. वहीं इन्सुलिन को लेकर भी कुछ लोगों के मन में डर और भ्रम की स्थिति बनी रहती है और इन्सुलिन लेने के नाम पर वो घबरा जाते हैं. अगर आपके साथ भी ऐसा है, तो यहां जानिए अपने सवालों के जवाब, जो दे रहे हैं किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ के मेडिसिन डिपार्टमेंट के प्रोफेसर, डॉक्टर क़ौसर उस्मान.

टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज़ में ये होता है फर्क

डायबिटीज़ दो तरह की होती हैं. टाइप 1 और टाइप 2. डायबिटीज़ से जूझ रहे मरीज़ों में 5 फीसदी लोग ही टाइप 1 में आते हैं. बाकी 95 फीसदी लोगों को टाइप 2 की डायबिटीज़ होती है. दोनों टाइप के मरीज़ों में फर्क ये होता है कि टाइप 1 के मरीज़ों के शरीर में इन्सुलिन बनता ही नहीं है. इनको पूरी ज़िंदगी बाहरी इन्सुलिन पर निर्भर रहना पड़ता है. जबकि टाइप 2 के मरीज़ों में ये बनता तो है लेकिन शरीर इसका उपयोग सही तरह से नहीं कर पाता है. ऐसे लोगों की बीमारी दवाओं के ज़रिये कंट्रोल हो जाती है लेकिन बीमारी के लगभग 10-15 साल बाद इनके शरीर में भी इन्सुलिन कम होने लगता है और दवाएं काम करना बंद कर देती हैं, तो इनको भी इन्सुलिन दिया जाता है. वहीं शरीर में शुगर लेवल कम हो जाना हाइपोग्लाइसीमिया कहलाता है.ये भी पढ़ें: व्हीट ग्रास जूस से दूर होगी सूजन, हाजमा होगा दुरुस्‍त, जान लें इसके अन्‍य फायदे

इन्सुलिन लेने से डरने की ज़रूरत नहीं

अगर किसी डायबिटीज़ के पेशेंट को दवाएं असर नहीं कर रही हैं और डॉक्टर उनको इन्सुलिन लेने की सलाह देते हैं, तो उनको डरना नहीं चाहिए और इन्सुलिन ले लेना चाहिए. इन्सुलिन सबसे नेचुरल ट्रीटमेंट है. बस फर्क ये है की ये इंजेक्शन फॉर्म में है. जिनको इंजेक्शन से डर है तो वो इन्सुलिन पेन का इस्तेमाल कर सकते हैं. ये होता तो इंजेक्शन ही है लेकिन इसमें सुई बेहद महीन होती है और दर्द भी बिल्कुल न के बराबर ही होता है. अगर उनको इस बात का डर है कि इससे शुगर लो हो जाएगी तो अब ऐसी इन्सुलिन आ गयी है जिसमें ऐसा अब शायद ही किसी केस में होता हो.

लेकिन अगर कभी ऐसा हो तो आपके आसपास जो भी मीठा मौजूद हो उसको तुरंत खा लेना चाहिए. साथ ही लोग इसलिए भी डरते हैं कि उनको लगता है, एक बार इन्सुलिन लेने के बाद ज़िंदगी भर इसे लेना होगा. तो टाइप 2 के पेशेंट के लिए ऐसा बिल्कुल नहीं है. ज़रूरत होने पर ही इसको लेने की सलाह दी जाती है. मुझे नहीं लगता कि इसको लेने से किसी तरह का साइड इफेक्ट होता है बस ओवर डोज़ नहीं लें इसका ध्यान रखें. न ही हार्ट पर इसका बुरा असर होता है बल्कि इसके न लेने से शुगर अनकंट्रोल हो सकती है जिसकी वजह से किडनी, हार्ट और ब्रेन कुछ भी डैमेज हो सकता है.

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इन्सुलिन इस तरह रखें और ऐसे करें इस्तेमाल

कुछ समय पहले तक ऐसी इन्सुलिन आ रही थी जिसको खाने से पहले लेना ज़रूरी था लेकिन अब ऐसी इन्सुलिन आ गयी हैं जिनका खाने से कोई सम्बन्ध नहीं है. इसको दिन में एक बार इस्तेमाल करने से 24 घंटे उसका असर रहता है. साथ ही हाइपोग्लाइसीमिया के चांस भी कम होते हैं. बस इसको रखने और इस्तेमाल करने के लिए थोड़ा ध्यान रखने की ज़रूरत होती है. इन्सुलिन को हमेशा फ्रिज के दरवाजे में बनी दराज़ में रखना चाहिए. अगर इन्सुलिन पेन का इस्तेमाल कर रहे हैं तो सुई निकाल कर रखें, जिससे बुलबुला न बने. ठंडी इन्सुलिन न लगाएं बल्कि इस्तेमाल करने से लगभग आधा घंटे पहले फ्रिज से निकाल कर रूम टेम्परेचर पर इसे रखें. सुई या सीरिंज को एक बार से ज्यादा इस्तेमाल न करें. अगर पेन का इस्तेमाल कर रहे हैं तो किसी और के साथ इसको शेयर न करें. इन्सुलिन का जितना डोज लेने की सलाह डॉक्टर ने दी है उसका हमेशा ख्याल रखें.






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