जरूरी है अन्न का संरक्षण-Food conservation is essential

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अतुल कनक

दुनिया में कुल बर्बाद किए जाने वाले भोजन में इकसठ फीसद मात्रा घरेलू भोजन की है। इतना ही नहीं, हर साल करीब साठ लाख गिलास दूध तक बेकार बहा दिया जाता है। यह चिंता की बात इसलिए है कि अगले चार दशकों में दुनिया में चालीस करोड़ लोग भुखमरी के संकट का सामना कर रहे होंगे।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में खाद्यान्न संकट तेजी से गहराता जा रहा है। यही हाल रहा तो सन 2050 तक दुनिया भर में अन्न के लिए संघर्ष की स्थिति आ जाएगी। यदि रोटी को मनुष्य की एक बुनियादी जरूरत मानी गई है तो खाद्यान्न उस जरूरत को पूरा करने वाला अनिवार्य अवयव है। ऐसे में मनुष्यता को बचाने के लिए खाद्यान्न की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धि सुनिश्चित करना जरूरी हो जाता है। लेकिन हाल में संयुक्त राष्ट्र ने इस बात पर चिंता जता दी है कि मौजूदा हालात में दुनिया के पास केवल सत्तर दिन का अन्न भंडारण बचा है।

निश्चित रूप से यूक्रेन पर रूस के हमले ने हालात भयावह बना डाले हैं। रूस और यूक्रेन मिल कर दुनिया को एक चौथाई अनाज की आपूर्ति करते हैं। लेकिन रूस के हमले ने यूक्रेन की व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर डाला है। यह वही यूक्रेन है, जिसे उसकी खाद्यान्न उत्पादन क्षमताओं के कारण यूरोप की रोटी की टोकरी कहा जाता है। पिछले मौसम में रूस में गेहंू की अच्छी पैदावार हुई है, जबकि प्राकृतिक प्रकोपों के कारण अमेरिका और यूरोप के देशों में अन्न कम हुआ है। इस स्थिति ने दुनिया की रूस पर निर्भरता बढ़ा दी है। उधर, भारत द्वारा गेहूं के निर्यात पर रोक लगाने के कारण उन देशों के चेहरे मायूस हैं जो ऐसी स्थिति में भारत से अतिरिक्त मदद की उम्मीद लगाए थे।

हालांकि गेहूं निर्यात पर रोक लगाने के भारत के अपने कारण हैं। किसी भी देश की लोकतांत्रिक सरकार का पहला कर्तव्य यह होता है कि वह अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करे। पड़ोसी देश श्रीलंका में पैदा हुए खाद्यान्न संकट और दुनिया में खाद्यान्न की बढ़ती किल्लत को देखते हुए भारत सरकार को यह आवश्यक लगा कि पहले देश की खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। ऐसे में गेहंू के निर्यात पर रोक लगाना ही एक विकल्प था। खाद्यान्न संकट किसी भी समाज को किस तरह त्रस्त और पस्त कर सकता है, श्रीलंका का उदाहरण इसका प्रमाण है, जहां भोजन की कमी से जूझ रहे लोगों को हिंसक प्रदर्शनों के लिए मजबूर होना पड़ गया।

दुनिया में जब आबादी का बड़ा हिस्सा जरूरत भर अन्न की चिंता में जीवन गुजार देता हो, तब ऐसे में अन्न की बर्बादी चिंता का विषय बन जाती है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में बनाए जाने वाले कुल भोजन का एक तिहाई हिस्सा अभी भी बर्बाद ही जाता है। यह बर्बादी या तो थाली में जूठन छोड़ दिए जाने के कारण होती है, या बचा हुआ भोजन फेंक देने या उसके खराब हो जाने के कारण होती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जितना भोजन इस तरह खराब होता है, उससे दो अरब लोगों का पेट भरा जा सकता है। भारतीय समाज में भोजन या अन्न की बर्बादी को शुभ नहीं माना जाता, लेकिन अध्ययन में सामने आया है कि भारत में इतनी बड़ी मात्रा में प्रतिवर्ष अनाज, सब्जियां और अन्य खाद्य पदार्थ बर्बाद कर दिए जाते हैं कि उतनी मात्रा से बिहार जैसे राज्य की आबादी की साल भर की जरूरत पूरी की जा सकती है।

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय की फसल अनुसंधान इकाई सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग (सीफैट) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल करीब सड़सठ लाख टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है। इस बर्बाद हुए भोजन की कीमत बानवे हजार करोड़ रुपए बैठती है। महत्त्वपूर्ण यह है कि जितना खाद्य पदार्थ भारत में बर्बाद हो जाता है, उतनी तो ब्रिटेन की कुल उत्पादन क्षमता है। यही कारण है कि दुनिया में चीन के बाद दूसरे नंबर का सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादन देश होने के बावजूद भारत में अन्न वितरण की स्थिति कई बार बहुत सुखद प्रतीत नहीं होती। बची हुई भोजन सामग्री के अलावा फल, सब्जियों और अन्न के बर्बाद होने के पीछे उन्हें संग्रहित करने की सुचारू और पर्याप्त व्यवस्था का अभाव भी है। शीत गृहों की कमी के कारण भी हर साल बाईस प्रतिशत फल और सब्जियां खराब होने पर फेंक दी जाती हैं। गोदामों में भरा गेहंू सड़ने की तस्वीरें तो अखबारों में अक्सर छपती रहती हैं।

निश्चित रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी देशों में खाद्यान्न आपूर्ति चरमरा गई है, लेकिन सच तो यह है कि इस युद्ध ने केवल उस भयावहता की एक झलक दिखाई है जिसका सामना आने वाले वर्षों में दुनिया को करना पड़ सकता है। दरअसल, दुनिया में तेजी से बढ़ती आबादी के कारण रिहायशी मकानों और अन्य निर्माणों की जरूरत बढ़ती जा रही है। आमतौर पर विकास की हर योजना संबंधित क्षेत्र की कृषि भूमि का एक महत्त्वपूर्ण हिस्से का गला घोंटती है।

योजना चाहे नवीन राजमार्गों के निर्माण की हो अथवा शहर के बाहर किसी औद्योगिक इकाई की स्थापना की या फिर किसी नई आवासीय योजना की। परिणाम यह हो रहा है कि जहां खाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं कृषि योग्य भूमि का रकबा लगातार घटता जा रहा है। एक मोटे अनुमान के अनुसार साल 2050 तक दुनिया की आबादी एक हजार करोड़ से ज्यादा हो जाएगी। यानी साल 2017 के आंकड़ों से तुलना करें तो साल 2050 में सत्तर प्रतिशत अधिक भोजन की आवश्यकता होगी। जबकि पृथ्वी से हर साल सात सौ पचास करोड़ टन उपजाऊ मिट्टी खत्म हो रही है। जाहिर है, जल्दी ही सार्थक विकल्प नहीं खोजे गए तो संपूर्ण आबादी के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उत्पादन का बड़ा संकट खड़ा होगा।

जब आबादी का बड़ा हिस्सा कचरे के ढेर से भी भोजन की तलाश के लिए विवश हो, तब अन्न के एक कण की बर्बादी भी संपूर्ण मानवता के प्रति बड़ा अपराध प्रतीत होता है। लेकिन जाने-अनजाने हम सब यह अपराध कर रहे हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा बर्बाद होने वाला खाना रेस्टोरेंट या होटलों का नहीं, बल्कि घरों में बनने वाला होता है। दुनिया में कुल बर्बाद किए जाने वाले भोजन में इकसठ फीसद मात्रा घरेलू भोजन की है। इतना ही नहीं, हर साल करीब साठ लाख गिलास दूध तक बेकार बहा दिया जाता है। यह चिंता की बात इसलिए है कि अगले चार दशकों में दुनिया में चालीस करोड़ लोग भुखमरी के संकट का सामना कर रहे होंगे।

संयुक्त राष्ट्र खाद्यान्न और कृषि संस्था का कहना है कि दुनिया में अन्न और दूसरे खाद्यान्न की लगातार कमी होती जा रही है। एक तो जनसंख्या दबाव के कारण कृषि योग्य भूमि कम होती जा रही है, ऊपर से खेती के बदले हुए तरीकों और रासायनिक उर्वरकों ने ही नहीं, जलवायु संकट ने भी कृषि भूमि की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। इसीलिए अब वैज्ञानिक यह चेतावनी देते दिखने लगे हैं कि समय रहते यदि दूसरे ग्रहों पर पानी, जीवन और कृषि संभावनाओं की खोज नहीं की गई तो आने वाला समय बहुत परेशानियों का समय होगा, क्योंकि आबादी बढ़ेगी तो अन्न की मांग बढ़ेगी और यदि धरती से लोगों की मांग के अनुसार अन्न उत्पादित नहीं किया जा सका तो खाद्यान्न के कारण परस्पर संघर्ष बढ़ेंगे और ये संघर्ष जीवन में सद्भाव और शांति को सर्वत्र भंग करेंगे। ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम अन्न के प्रत्येक कण का महत्त्व समझें।

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